बीमारी इंसान को कमज़ोर कर देती है, जिस्म ही नहीं दिल भी थक जाता है। ऐसे वक़्त में दवा के साथ दुआ का सहारा लेना ईमान की निशानी है। बीमारी से शिफा की दुआ पढ़ते हुए जब बंदा अल्लाह पर यक़ीन रखता है, तो दिल में सुकून उतरता है और रहमत की उम्मीद मज़बूत होती है।
अल्लाह की रहमत से कभी मायूस न हों। शिफा उसी के हाथ में है।
बीमारी से शिफा की दुआ
नीचे एक मशहूर और साबितशुदा दुआ पेश है, जिसे नबी करीम ﷺ ने बीमारी के वक़्त पढ़ने की तालीम दी।
अरबी दुआ:
اللّٰهُمَّ رَبَّ النَّاسِ أَذْهِبِ الْبَأْسَ، اشْفِ أَنْتَ الشَّافِي، لَا شِفَاءَ إِلَّا شِفَاؤُكَ، شِفَاءً لَا يُغَادِرُ سَقَمًا
हिंदी तल्लफ़ुज़:
अल्लाहुम्मा रब्बन-नास, अज़हिबिल-बअस, इश्फ़ि अन्तश-शाफ़ी, ला शिफ़ा-अ इल्ला शिफ़ाऊक, शिफ़ाअन ला युग़ादिरु सक़मा।
तर्जुमा मतलब:
ऐ लोगों के रब, तकलीफ़ को दूर कर दे। शिफा दे, तू ही शिफा देने वाला है। तेरी शिफा के सिवा कोई शिफा नहीं। ऐसी पूरी शिफा दे, जो किसी बीमारी को बाकी न छोड़े।
हवाला:
सहीह बुख़ारी, हदीस 5675
सहीह मुस्लिम, हदीस 2191
इस दुआ की फ़ज़ीलत और ताक़त
यह दुआ सिर्फ़ अल्फ़ाज़ नहीं, बल्कि अल्लाह की अजमत पर यक़ीन का इज़हार है। नबी ﷺ ने इसे खुद पढ़ा और सहाबा को भी सिखाया। इसमें बंदा सीधे अल्लाह से बात करता है, जो हर दर्द को जानता है।
जब इंसान बीमारी में यह दुआ पढ़ता है, तो दिल की घबराहट कम होती है। अल्लाह की रहमत की उम्मीद दिल में ज़िंदा रहती है। कई उलमा ने लिखा है कि यह दुआ जिस्मानी बीमारी के साथ दिली बेचैनी में भी सुकून देती है।
शिफा कभी फ़ौरन मिलती है, कभी सब्र के साथ। दोनों हालात में बंदे को सवाब मिलता है।
बीमारी से शिफा की दुआ पढ़ने का तरीका
इस दुआ को पढ़ने का तरीका आसान है। इसे रोज़मर्रा की ज़िंदगी में आसानी से शामिल किया जा सकता है।
- वुज़ू में होना बेहतर है, लेकिन मजबूरी में बिना वुज़ू भी पढ़ सकते हैं।
- दाहिना हाथ दर्द वाली जगह पर रखें।
- तीन या सात मर्तबा यह दुआ पढ़ें।
- पढ़ते वक़्त पूरा यक़ीन रखें कि शिफा अल्लाह ही देता है।
- दुआ के बाद अल्लाह का शुक्र अदा करें, चाहे हालात जैसे भी हों।
अगर मरीज़ खुद न पढ़ सके, तो घर वाले उसके लिए पढ़ सकते हैं। यह भी सुन्नत से साबित है।
दुआ के साथ ज़रूरी नसीहत
दुआ के साथ इलाज कराना भी सुन्नत है। नबी ﷺ ने दवा इस्तेमाल करने की तालीम दी है। इसलिए डॉक्टर की सलाह को नज़रअंदाज़ न करें। दुआ और इलाज, दोनों साथ हों तो अल्लाह की बरकत शामिल होती है।
अल्लाह पर भरोसा रखो, मगर कोशिश छोड़ो मत।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
क्या यह दुआ हर बीमारी के लिए है?
जी हां, यह दुआ आम है। छोटी बीमारी हो या बड़ी, अल्लाह से शिफा मांगने में कोई रोक नहीं।
कितनी बार पढ़ना बेहतर है?
तीन या सात बार पढ़ना बेहतर माना गया है। लेकिन तय गिनती ज़रूरी नहीं, दिल से पढ़ना ज़्यादा अहम है।
क्या यह दुआ किसी और के लिए पढ़ सकते हैं?
बिलकुल, आप अपने घर वालों, बच्चों या किसी भी बीमार शख़्स के लिए यह दुआ पढ़ सकते हैं।
अल्लाह तआला हम सबको कामिल शिफा अता फ़रमाए, हमारे गुनाह माफ़ करे और बीमारी को हमारे लिए सवाब का ज़रिया बनाए। आमीन।


