Maghfirat Ki Dua In Hindi | अपनी और मय्यत (मरहूम) की बख़्शिश की दुआ

By Rokaiya

maghfirat ki dua main

Quick Summary

Dua Name

Maghfirat Ki Dua

Arabic Text

اللَّهُمَّ أَنْتَ رَبِّي لَا إِلَٰهَ إِلَّا أَنْتَ، خَلَقْتَنِي وَأَنَا عَبْدُكَ، وَأَنَا عَلَىٰ عَهْدِكَ وَوَعْدِكَ مَا اسْتَطَعْتُ، أَعُوذُ بِكَ مِنْ شَرِّ مَا صَنَعْتُ، أَبُوءُ لَكَ بِنِعْمَتِكَ عَلَيَّ، وَأَبُوءُ بِذَنْبِي فَاغْفِرْ لِي فَإِنَّهُ لَا يَغْفِرُ الذُّنُوبَ إِلَّا أَنْتَ

Hindi Transliteration

अल्लाहुम्मा अंता रब्बी ला इलाहा इल्ला अंता, ख़लक़्तनी व अना अबदुका, व अना अला अहदिका व वअदिका मस-ततअ-तु, अऊज़ु बिका मिन शर्रि मा सनअ-तु, अबू-उ लका बिनिअ-मतिका 'अलैया, व अबू-उ बिजन्बी फ़ग़फ़िर ली फ़इन्नहू ला यग़फ़िरुज़-ज़ुनूबा इल्ला अंता।

English Transliteration

Allahumma anta rabbi la ilaha illa anta, khlaqtani w ana abaduka, w ana ala ahadika w wadika mas-tata-tu, auzu bika min sharri ma sana-tu, abu-u laka binia-matika 'alaiya, w abu-u bijanbi fghfir li finnahu la yaghfiruz-zunuba illa anta.

Source

सहीह बुखारी (हदीस 6306)

इंसान होने के नाते हमसे ख़ताएं (ग़लतियाँ) हो जाती हैं, और ज़िंदगी के सफ़र में कई बार हमारे अपने हमसे बिछड़ कर इस दुनिया से रुख़सत हो जाते हैं। इस्लाम में ‘मग़फ़िरत’ (माफ़ी और बख़्शिश) का तसव्वुर बहुत वसीह (बड़ा) है। अल्लाह ताला न सिर्फ़ हमारे गुनाह माफ़ फ़रमाता है, बल्कि हमें अपने गुज़रे हुए प्यारों के लिए भी बख़्शिश मांगने का हुक्म देता है।

अगर आप इंटरनेट पर Maghfirat ki dua तलाश कर रहे हैं, तो यहाँ हमने अहादीस से साबित मग़फ़िरत की सबसे अफ़ज़ल दुआएं पेश की हैं—चाहे वह आपके अपने गुनाहों की तौबा के लिए हो, या किसी मरहूम (मय्यत) के हक़ में दुआ-ए-मग़फ़िरत हो।


1. अपनी मग़फ़िरत के लिए दुआएं (Personal Forgiveness)

कभी-कभी दिल पर गुनाहों का बोझ इतना बढ़ जाता है कि एक अजीब सी बेचैनी होने लगती है। दिल में पैदा होने वाली यह नदामत (शर्मिंदगी) ही इस बात की दलील है कि अल्लाह ताला आपको फिर से अपनी रहमत की तरफ़ बुला रहा है।

Sayyidul Istighfar | सय्यिदुल इस्तिग़फ़ार (तौबा की सबसे अफ़ज़ल दुआ)

हदीस शरीफ़ के मुताबिक़, Sayyidul Istighfar तौबा और मग़फ़िरत की सबसे अफ़ज़ल और मुकम्मल दुआ है। नबी-ए-करीम (ﷺ) ने फ़रमाया कि जो शख़्स यक़ीन के साथ सुब्ह के वक़्त इसे पढ़ेगा और शाम से पहले इंतक़ाल कर गया, तो वह जन्नती है:

Arabic:

اللَّهُمَّ أَنْتَ رَبِّي لَا إِلَٰهَ إِلَّا أَنْتَ، خَلَقْتَنِي وَأَنَا عَبْدُكَ، وَأَنَا عَلَىٰ عَهْدِكَ وَوَعْدِكَ مَا اسْتَطَعْتُ، أَعُوذُ بِكَ مِنْ شَرِّ مَا صَنَعْتُ، أَبُوءُ لَكَ بِنِعْمَتِكَ عَلَيَّ، وَأَبُوءُ بِذَنْبِي فَاغْفِرْ لِي فَإِنَّهُ لَا يَغْفِرُ الذُّنُوبَ إِلَّا أَنْتَ

Hindi:

अल्लाहुम्मा अंता रब्बी ला इला-ह इल्ला अंता, ख़लक़्तनी व अना अब्दुका, व अना अला अहदिका व वअदिका मस-ततअ-तु, अऊज़ु बिका मिन शर्रि मा सनअ-तु, अबू-उ लका बि-निअमतिका अलैया, व अबू-उ बि-ज़म्बी फ़ग़फ़िर ली फ़-इन्नहू ला यग़फ़िरुज़-ज़ुनूबा इल्ला अंता।

Roman:

Allahumma anta rabbi la ilaha illa anta, khalaqtani wa ana ‘abduka, wa ana ‘ala ‘ahdika wa wa’dika mastata’tu, a’udhu bika min sharri ma sana’tu, abu’u laka bini’matika ‘alayya, wa abu’u bidhanbi faghfir li fainnahu la yaghfiru adh-dhunuba illa anta.

तर्जुमा / मफ़हूम:

“ऐ अल्लाह! तू ही मेरा रब है, तेरे सिवा कोई इबादत के लायक़ नहीं। तूने ही मुझे पैदा किया और मैं तेरा बंदा हूँ। मैं अपनी ताक़त के मुताबिक़ तेरे अहद और वादे पर क़ायम हूँ। मैं अपने किए हुए कामों के शर (बुराई) से तेरी पनाह मांगता हूँ। मुझ पर जो तेरी नेमतें हैं, मैं उनका इक़रार करता हूँ और अपने गुनाहों का भी एतराफ़ (क़बूल) करता हूँ। पस, तू मुझे माफ़ फ़रमा दे, क्योंकि तेरे सिवा कोई गुनाहों को माफ़ करने वाला नहीं।” (हवाला: सहीह बुख़ारी: 6306)

मग़फ़िरत की एक और जामे दुआ

नमाज़ में तशहहुद के बाद या किसी भी वक़्त अल्लाह ताला से गिड़गिड़ा कर माफ़ी मांगने के लिए यह दुआ निहायत मुफ़ीद है:

Arabic:

اللَّهُمَّ إِنِّي ظَلَمْتُ نَفْسِي ظُلْمًا كَثِيرًا، وَلَا يَغْفِرُ الذُّنُوبَ إِلَّا أَنْتَ، فَاغْفِرْ لِي مَغْفِرَةً مِّنْ عِندِكَ وَارْحَمْنِي، إِنَّكَ أَنْتَ الْغَفُورُ الرَّحِيمُ

Hindi:

अल्लाहुम्मा इन्नी ज़लम-तु नफ़्सी ज़ुलमन कसीरा, व ला यग़फ़िरुज़-ज़ुनूबा इल्ला अंता, फ़ग़फ़िर ली मग़फ़िरतम-मिन इन्दिका वर-हम्नी, इन्नका अंताल ग़फ़ूरुर-रहीम।

तर्जुमा / मफ़हूम:

“ऐ अल्लाह! मैंने अपनी जान (नफ़्स) पर बहुत ज़्यादा ज़ुल्म किया है और तेरे सिवा कोई गुनाहों को माफ़ नहीं कर सकता। पस, तू ख़ास अपनी तरफ़ से मेरी मग़फ़िरत फ़रमा दे और मुझ पर रहम फ़रमा। बेशक तू ही बहुत माफ़ करने वाला और निहायत रहम करने वाला है।” (हवाला: सहीह बुख़ारी: 834)


2. मय्यत (मरहूम) के लिए मग़फ़िरत की दुआएं

जब कोई अपना इस दुनिया से चला जाता है, तो पीछे सिर्फ़ ख़ामोशी और यादें रह जाती हैं। हमारा दीन सिखाता है कि मौत ख़ात्मा नहीं, बल्कि एक सफ़र का नया पड़ाव है। मय्यत के लिए Maghfirat ki dua करना, उनके लिए रहमत मांगना और दर्जात की बुलंदी की उम्मीद रखना—यह सब उन तक तोहफ़े की तरह पहुँचता है।

मय्यत के लिए पढ़ी जाने वाली मसनून दुआ

नमाज़-ए-जनाज़ा में और उसके बाद भी मय्यत की बख़्शिश के लिए यह जामे दुआ पढ़ी जाती है:

Arabic:

اللَّهُمَّ اغْفِرْ لَهُ وَارْحَمْهُ، وَعَافِهِ وَاعْفُ عَنْهُ، وَأَكْرِمْ نُزُلَهُ، وَوَسِّعْ مُدْخَلَهُ

Hindi:

अल्लाहुम्मग़-फ़िर लहू वर-हमहू, व ‘आफ़िही वअ’-फ़ु ‘अन्हु, व अकरिम नुज़ुलहू, व वस्सि’अ मुद-ख़लहू। (नोट: अगर मय्यत औरत है, तो ‘लहू’ की जगह ‘लहा’ और ‘अन्हु’ की जगह ‘अन्हा’ पढ़ें)

Roman:

Allahummaghfir lahu warhamhu, wa ‘aafihi wa’fu ‘anhu, wa akrim nuzulahu, wa wassi’ mudkhalahu.

तर्जुमा / मफ़हूम:

“ऐ अल्लाह! इसकी (मरहूम की) मग़फ़िरत फ़रमा, और इस पर रहमत नाज़िल फ़रमा, और इसे आफ़ियत (सुकून) दे, और इसे माफ़ फ़रमा। इसकी मेज़बानी की इज़्ज़त फ़रमा और इसके दाख़िल होने की जगह (क़ब्र) को कुशादा (चौड़ा) कर दे।” (हवाला: सहीह मुस्लिम: 963)

मरहूमीन के लिए क़ुरआनी दुआ (Short Dua)

Arabic:

رَبَّنَا اغْفِرْ لَنَا وَلِإِخْوَانِنَا الَّذِينَ سَبَقُونَا بِالْإِيمَانِ

Hindi:

रब्बनग़-फ़िर लना व लि-इख़्वानिनल्लज़ीना सबक़ूना बिल-ईमान।

तर्जुमा / मफ़हूम:

“ऐ हमारे रब! हमें बख़्श दे और हमारे उन भाइयों को भी जो हमसे पहले ईमान ला चुके हैं।” (हवाला: सूरह अल-हश्र: 10)


अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)

सवाल 1: क्या Sayyidul Istighfar रोज़ाना पढ़ना लाज़िम है?
जवाब: जी हाँ, नबी-ए-करीम (ﷺ) रोज़ाना सत्तर (70) से सौ (100) मर्तबा तक इस्तिग़फ़ार किया करते थे। इसे अपने सुब्ह और शाम के अज़कार में शामिल कर लेने से दिल का ज़ंग दूर होता है।

सवाल 2: क्या हर मुसलमान मय्यत के लिए मग़फ़िरत की दुआ की जा सकती है?
जवाब: जी हाँ, हर वो शख़्स जो ईमान की हालत में दुनिया से गया हो, उसके लिए मग़फ़िरत और रहमत की दुआ करना हमारा हक़ भी है और फ़र्ज़ भी।

सवाल 3: क्या बग़ैर अरबी अल्फ़ाज़ के भी मग़फ़िरत मांग सकते हैं?
जवाब: बिल्कुल। अल्लाह ताला आपके दिल के हाल को और हर ज़बान को जानता है। अगर आपको अरबी नहीं आती, तो आप अपनी मादरी ज़बान (Hindi/Urdu) में भी अपने लिए और अपने मरहूमीन के लिए दुआ कर सकते हैं।


आख़िरी बात: रहमत और बख़्शिश की उम्मीद

अल्लाह की तरफ़ वापसी का सफ़र कभी मुश्किल नहीं होता, बस एक सच्चा क़दम बढ़ाने की ज़रूरत है। चाहे आप अपनी ख़ताओं पर नदामत के आँसू बहा रहे हों, या अपने किसी बिछड़े हुए अज़ीज़ की याद में उनके लिए मग़फ़िरत तलब कर रहे हों—अल्लाह की रहमत से कभी मायूस न हों।

जाने वाले चले जाते हैं, लेकिन दुआ का दरवाज़ा हमेशा खुला रहता है। अल्लाह ताला हम सबके सगीरा और कबीरा गुनाहों की मग़फ़िरत फ़रमाए और हमारे तमाम मरहूमीन की पूरी-पूरी बख़्शिश फ़रमाए। आमीन।