Kamyabi ki dua har kaam mein | हर काम में कामयाबी की दुआ

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मुख़्तसर रहनुमाई

कामयाबी की दुआ

اللَّهُمَّ رَحْمَتَكَ أَرْجُو فَلَا تَكِلْنِي إِلَى نَفْسِي طَرْفَةَ عَيْنٍ وَأَصْلِحْ لِي شَأْنِي كُلَّهُ لَا إِلَهَ إِلَّا أَنْتَ
तलफ़्फ़ुज़:
अल्लाहुम्मा रहमतका अरजू फ़ला तकिलनी इला नफ़्सी तरफ़ता ऐनिन व अस्लिह ली शअनी कुल्लहू ला इलाहा इल्ला अन्ता।
तर्जुमा:
ऐ अल्लाह! मैं तेरी ही रहमत की उम्मीद रखता हूँ, इसलिए मुझे एक पल के लिए भी मेरे अपने नफ़्स (सहारे) पर न छोड़ और मेरे तमाम हालात संवार दे, तेरे सिवा कोई इबादत के लायक़ नहीं।
मसदर: 
सुनन अबू दाऊद: 5090 (सहीह हदीस)
kamyabi ki dua har kaam mein main

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मेहनत है, नतीजा नहीं?

ज़िंदगी में कई बार ऐसा दौर आता है जब इंसान अपनी तरफ़ से पूरी जान लगा देता है। पढ़ाई हो, नौकरी की तलाश हो या नया कारोबार—हम दिन-रात एक कर देते हैं, लेकिन नतीजा वैसा नहीं मिलता जैसा सोचा था। बार-बार की नाकामी और काम का अटक जाना इंसान को थका देता है। ऐसे में दिल में ये सवाल आना कि “क्या मेरी कोशिश में कमी है?” या “क्या ये रास्ता मेरे लिए सही नहीं है?”, बहुत आम बात है।

हमें समझना होगा कि कामयाबी सिर्फ़ हमारी भाग-दौड़ का नाम नहीं है। हम अपना काम पूरी ईमानदारी से करें, लेकिन उस काम में जान और बरकत अल्लाह की तरफ़ से आती है।


इस्लाम में कामयाबी का मतलब

इस्लाम हमें ये सिखाता है कि कामयाबी सिर्फ़ आख़िरी नतीजे (Result) का नाम नहीं है। अगर आपको किसी काम को करने की तौफ़ीक़ मिल रही है और आप सही रास्ते पर डटे हुए हैं (इस्तक़ामत), तो ये भी कामयाबी की एक शक्ल है। कभी-कभी अल्लाह हमें फ़ौरन कामयाबी नहीं देता, क्योंकि वो हमें सब्र और तजुर्बे से गुज़ार कर किसी बड़ी चीज़ के लिए तैयार कर रहा होता है।


हर काम में कामयाबी की मसनून दुआ

जब आप अपनी मेहनत पूरी कर लें, तो अल्लाह के सामने अपनी आज़ज़ी का इज़हार करें। ये दुआ कामयाबी और काम के बिगड़े हुए हालात को संवारने के लिए बहुत जामे (Complete) है।

अरबी दुआ:

اللَّهُمَّ رَحْمَتَكَ أَرْجُو فَلَا تَكِلْنِي إِلَى نَفْسِي طَرْفَةَ عَيْنٍ وَأَصْلِحْ لِي شَأْنِي كُلَّهُ لَا إِلَهَ إِلَّا أَنْتَ

तलफ़्फ़ुज़ (Hinglish):

Allahumma rahmataka arju fala takilni ila nafsi tarfata ‘aynin wa aslih li sha’ni kullahu la ilaha illa Anta.

तलफ़्फ़ुज़ (Devanagari):

अल्लाहुम्मा रहमतका अरजू फ़ला तकिलनी इला नफ़्सी तरफ़ता ऐनिन व अस्लिह ली शअनी कुल्लहू ला इलाहा इल्ला अन्ता।

तर्जुमा:

“ऐ अल्लाह! मैं तेरी ही रहमत की उम्मीद रखता हूँ, इसलिए मुझे एक पल के लिए भी मेरे अपने नफ़्स (सहारे) पर न छोड़ और मेरे तमाम हालात संवार दे, तेरे सिवा कोई इबादत के लायक़ नहीं।”

मस्दर (Source):

सुनन अबू दाऊद: 5090 (सहीह हदीस)


दुआ के साथ काम के आदाब

दुआ कोई जादू नहीं है, बल्कि ये अल्लाह से मांगी गई मदद है। कामयाबी के लिए इन बातों का ख्याल रखना ज़रूरी है:

  • नियत की पाकीज़गी: काम शुरू करने से पहले खुद से पूछें कि क्या ये काम अल्लाह को पसंद आएगा?
  • मेहनत में ईमानदारी: दुआ के साथ-साथ उस काम की पूरी जानकारी और ज़रूरी मेहनत करना सुन्नत है।
  • हलाल रास्ता: गलत तरीके या किसी का हक़ मार कर हासिल की गई कामयाबी में बरकत नहीं होती।
  • नतीजा अल्लाह पर छोड़ना: अपनी तरफ़ से बेहतरीन कोशिश के बाद जो भी नतीजा आए, उसे अल्लाह की मर्ज़ी मानकर कुबूल करें।

जब काम बार-बार अटक जाए

अगर बार-बार कोशिश के बाद भी रुकावटें आ रही हैं, तो मायूस न हों। कई बार अल्लाह हमें किसी गलत रास्ते से बचाने के लिए या हमारे सब्र का इम्तिहान लेने के लिए काम में देरी करता है। दूसरों की तरक़्क़ी देखकर खुद को छोटा न समझें। आपकी मेहनत का एक-एक पल अल्लाह के पास दर्ज है और उसका सिला (Reward) आपको सही वक़्त पर ज़रूर मिलेगा।


ज़रूरी सवालात (FAQ)

1. क्या हर काम से पहले ये दुआ पढ़ सकते हैं?

जी हाँ, चाहे छोटा काम हो या बड़ा, आप इसे अपनी रोज़ाना की आदत बना सकते हैं।

2. अगर काम हलाल हो लेकिन फिर भी कामयाबी न मिले तो?

ऐसी सूरत में ये यकीन रखें कि अल्लाह ने आपके लिए इससे बेहतर कुछ सोच रखा है। कभी-कभी नाकाम होना भी आने वाली बड़ी कामयाबी का रास्ता होता है।

3. दुआ कितनी बार पढ़नी चाहिए?

इसकी कोई गिनती मुक़र्रर नहीं है, लेकिन सुबह और शाम के अज़कार में इसे शामिल करना और काम शुरू करते वक़्त इसे दिल से पढ़ना अफ़ज़ल है।


कोशिश, दुआ और भरोसा

कामयाबी का सफ़र एक हाथ में कोशिश और दूसरे हाथ में दुआ रखने का नाम है। जब आप ये दोनों चीज़ें लेकर चलते हैं, तो दिल में एक सुकून रहता है कि “मैंने अपना फ़र्ज़ निभाया, अब मेरा रब्ब संभालेगा।” यही तवक्कुल एक मोमिन की असल ताक़त है।