Rizq mein izafa ki dua | रिज़्क़ में इज़ाफ़ा की दुआ

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मुख़्तसर रहनुमाई

रिज़्क़ में इज़ाफ़ा की दुआ

اللَّهُمَّ إِنِّي أَسْأَلُكَ عِلْمًا نَافِعًا، وَرِزْقًا طَيِّبًا، وَعَمَلًا مُتَقَبَّلًا
तलफ़्फ़ुज़:
अल्लाहुम्मा इन्नी अस-अलुका इल्मन नाफ़िअन, व रिज़्क़न तय्यिबन, व अमलम मुतक़ब्बलन।
तर्जुमा:
ऐ अल्लाह! बेशक मैं तुझसे नफ़ा देने वाले इल्म, पाकीज़ा (हलाल) रिज़्क़ और क़बूल होने वाले अमल का सवाल करता हूं।
मसदर: 
सुनन इब्ने माजह (हदीस नंबर: 925)
rizq mein izafa ki dua main

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आज के दौर में हर इंसान अपनी और अपने अहल-ओ-अयाल (परिवार) की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए दिन-रात भाग-दौड़ कर रहा है। कभी-कभी तमाम कोशिशों के बावजूद घर में बरकत महसूस नहीं होती और तंगी का अहसास रहता है। एक मुसलमान होने के नाते हमारा यह पुख़्ता यक़ीन है कि रिज़्क़ देने वाली ज़ात सिर्फ अल्लाह रब्बुल आलमीन की है। रिज़्क़ में इज़ाफ़ा सिर्फ मेहनत से नहीं, बल्कि अल्लाह की रहमत और सुन्नत के मुताबिक़ मांगी गई दुआओं से होता है।


Rizq mein barkat aur izafa ki behtareen dua | रिज़्क़ में बरकत और इज़ाफ़ा की बेहतरीन दुआ

रिज़्क़ की तंगी को दूर करने और हलाल कमाई में इज़ाफ़े के लिए नबी-ए-करीम ﷺ ने हमें बहुत ही जामे और ख़ूबसूरत दुआएं सिखाई हैं। इनमें से एक मुअतबर दुआ यह है:

اللَّهُمَّ إِنِّي أَسْأَلُكَ عِلْمًا نَافِعًا، وَرِزْقًا طَيِّبًا، وَعَمَلًا مُتَقَبَّلًا

तलफ़्फ़ुज़ (Pronunciation)

Devanagari: अल्लाहुम्मा इन्नी अस-अलुका इल्मन नाफ़िअन, व रिज़्क़न तय्यिबन, व अमलम मुतक़ब्बलन।

Roman: Allahumma inni as-aluka ‘ilman nafi’an, wa rizqan tayyiban, wa ‘amalan mutaqabbalan.

तर्जुमा (Translation)

“ऐ अल्लाह! बेशक मैं तुझसे नफ़ा देने वाले इल्म, पाकीज़ा (हलाल) रिज़्क़ और क़बूल होने वाले अमल का सवाल करता हूं।”


हवाला (Masdar)

यह दुआ सुन्नत-ए-नबवी से साबित है। इसे सुनन इब्ने माजह (हदीस नंबर: 925) में ज़िक्र किया गया है। अल्लाह के रसूल ﷺ अक्सर इसे फ़ज्र की नमाज़ के बाद पढ़ा करते थे।


दुआ के आदाब और सुन्नत तरीक़ा (Sunnat & Adaab)

सिर्फ दुआ के अलफ़ाज़ दोहराना काफ़ी नहीं है, बल्कि कुछ आदाब का ख़याल रखना भी रिज़्क़ में बरकत का सबब बनता है:

  • वक़्त की पाबंदी: इस दुआ को पढ़ने का सबसे बेहतरीन वक़्त फ़ज्र की नमाज़ के बाद है।
  • हलाल कमाई की फ़िक्र: रिज़्क़ में बरकत के लिए सबसे पहली शर्त यह है कि आपका ज़रिया-ए-माश (कमाई का ज़रिया) पूरी तरह हलाल हो।
  • पुख़्ता यक़ीन: जब आप अल्लाह से मांगें, तो दिल में यह यक़ीन रखें कि वही राज़िक़ है और वही आपकी तंगी को दूर करेगा।
  • इस्तग़फ़ार की कसरत: तौबा और इस्तग़फ़ार करने से अल्लाह तआला आसमान से रिज़्क़ के दरवाज़े खोल देता है।
  • शुक्रगुज़ारी: जो कुछ अल्लाह ने अता किया है उस पर शुक्र अदा करें, क्योंकि शुक्र करने से नेमतें बढ़ा दी जाती हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले सवालात (FAQ)

1. यह दुआ दिन में कितनी बार पढ़नी चाहिए?

यूं तो आप इसे चलते-फिरते कभी भी पढ़ सकते हैं, लेकिन हदीस के मुताबिक़ फ़ज्र की नमाज़ के बाद एक बार पढ़ना सुन्नत है। ज़्यादा बरकत के लिए इसे अपना मामूल बना लें।

2. क्या रिज़्क़ की दुआ के साथ मेहनत करना ज़रूरी है?

बिल्कुल। इस्लाम हमें हाथ पर हाथ रखकर बैठने की इजाज़त नहीं देता। दुआ अल्लाह से मदद मांगने का ज़रिया है, जबकि कोशिश करना इंसान का फ़र्ज़ है।

3. क्या नमाज़ के बाद हाथ उठाकर यह दुआ मांग सकते हैं?

जी हां, फ़र्ज़ नमाज़ों के बाद दुआ की क़बूलियत का वक़्त होता है। आप इन अलफ़ाज़ के साथ रो-रोकर अल्लाह से अपनी तंगदस्ती का ज़िक्र कर सकते हैं।


आख़िरी बात

रिज़्क़ का ताल्लुक़ सिर्फ पैसों की ज़्यादती से नहीं है, बल्कि अस्ल चीज़ ‘बरकत’ है। कभी कम माल में भी अल्लाह इतनी सुकून और बरकत अता कर देता है कि इंसान की हर ज़रूरत पूरी हो जाती है। अपनी मेहनत जारी रखें, पांच वक़्त की नमाज़ का एहतमाम करें और अल्लाह की ज़ात पर कामिल भरोसा रखें। याद रखें, अल्लाह अपने बंदों को उनकी बर्दाश्त से ज़्यादा आज़माइश में नहीं डालता।