कभी-कभी एक पल का ग़ुस्सा बरसों के ताल्लुक़ात को राख कर देता है। आपने भी महसूस किया होगा कि जब ग़ुस्सा आता है, तो अक़्ल पर पर्दा पड़ जाता है। हम वह कह जाते हैं जो हमें नहीं कहना चाहिए, और फिर बाद में अकेले में बैठकर पछताते हैं कि “काश! उस वक़्त मैं चुप रह जाता।” चाहे घर में बीवी-बच्चों पर चिल्लाना हो या दफ़्तर में किसी बात पर आपा खो देना, यह ग़ुस्सा सिर्फ दूसरों को नहीं, बल्कि हमारे अपने सुकून और ईमान को भी नुकसान पहुँचाता है।
इस्लाम हमें जज्बातों को दबाने के लिए नहीं, बल्कि उन्हें काबू (Control) करने का सलीका सिखाता है। नबी-ए-करीम ﷺ ने फ़रमाया कि असली बहादुर वह नहीं जो पहलवानी में जीत जाए, बल्कि बहादुर वह है जो ग़ुस्से के वक़्त खुद पर काबू रखे।
ग़ुस्सा कम करने की मसनून दुआ
जब भी आपको महसूस हो कि पारा चढ़ रहा है और ज़ुबान से कड़वे अलफ़ाज़ निकलने वाले हैं, तो फौरन यह दुआ पढ़ें। यह शैतान के शर से बचने का सबसे मज़बूत ज़रिया है।
أَعُوذُ بِاللَّهِ مِنَ الشَّيْطَانِ الرَّجِيمِ
तलफ़्फ़ुज़ (Hinglish): A’uzu Billahi Minash Shaitanir Rajeem
तलफ़्फ़ुज़ (Hindi): अऊज़ु बिल्लाहि मिनश शैतानिर रजीम
तर्जुमा: मैं अल्लाह की पनाह माँगता हूँ शैतान मर्दूद से।
सियाक-ओ-सबक़ (Reference):
यह दुआ बुखारी शरीफ़ (Hadith No. 6115) और मुस्लिम शरीफ़ से साबित है। जब दो लोग नबी ﷺ के सामने लड़ रहे थे और एक का चेहरा ग़ुस्से से लाल हो गया था, तब आपने यह दुआ पढ़ने की हिदायत दी थी।
ग़ुस्से की आग बुझाने के इस्लामी आदाब
सिर्फ दुआ ही नहीं, अल्लाह के रसूल ﷺ ने हमें कुछ अमली (Practical) तरीके भी बताए हैं जो ग़ुस्से की आग को फौरन ठंडा कर देते हैं:
- ख़ामोशी इख्तियार करें: अगर ग़ुस्सा आए तो चुप हो जाएँ। अक्सर बहस को लंबा करने से बात बिगड़ती है।
- जगह बदलें या अपनी हालत बदलें: अगर आप खड़े हैं तो बैठ जाएँ, और अगर बैठे हैं तो लेट जाएँ। यह जिस्मानी हरकत आपके जज्बात को धीमा कर देती है।
- ताज़ा वूज़ू करें: ग़ुस्सा शैतान की तरफ से है और शैतान आग से बना है। आग को पानी बुझाता है, इसलिए वूज़ू करने से दिल और दिमाग को फ़ौरन ठंडक मिलती है।
- ज़मीन की तरफ तवज्जो दें: अपनी अना (Ego) को कम करने के लिए खुद को याद दिलाएँ कि हम मिट्टी से बने हैं।
ग़लतफ़हमियां और हक़ीक़त
अक्सर लोग सोचते हैं कि ग़ुस्सा करना मर्दानगी की निशानी है या “तेज़ मिज़ाज” होना फख़्र की बात है। हक़ीक़त इसके उलट है। दीन की समझ रखने वाला इंसान वह है जो नर्म-मिज़ाज हो। कुछ लोग समझते हैं कि ग़ुस्से में दी गई बददुआ या कहे गए अलफ़ाज़ माने नहीं रखते, जबकि वाक़ई यह आपके आमालनामे पर असर डालते हैं।
सवाल-जवाब (Aam Sawalat)
सवाल: क्या ग़ुस्से की हालत में की गई दुआ कुबूल होती है?
जवाब: अल्लाह तआला रहम करने वाला है, लेकिन ग़ुस्से में इंसान अक्सर होश खो देता है और गलत बातें कह जाता है। कोशिश करें कि पहले खुद को शांत करें, फिर पूरी तवज्जो के साथ दुआ माँगें।
सवाल: बच्चों को बहुत ग़ुस्सा आए तो क्या करें?
जवाब: बच्चों को डांटने के बजाय उन्हें प्यार से ‘अऊज़ु बिल्लाह’ पढ़ने की आदत डालें। उनके सामने खुद अपने ग़ुस्से पर काबू रखकर मिसाल पेश करें।
दिल को सुकून देने वाली आख़िरी बात
याद रखें, ग़ुस्सा एक आग है जो सबसे पहले उसी को जलाती है जिसके अंदर वह भड़क रही होती है। जब आप अल्लाह की रज़ा के लिए अपना ग़ुस्सा पी जाते हैं, तो अल्लाह आपके दिल को ईमान और इत्मीनान से भर देता है। अगली बार जब आपका जी चाहे कि किसी को बुरा-भला कहें, तो बस एक लम्हे के लिए रुकें और सोचें कि अल्लाह की ज़ात हमारे साथ कितनी नर्मी बरतती है। क्या हम उसके बंदों के साथ थोड़े नर्म नहीं हो सकते?
सब्र का फल कड़वा ज़रूर महसूस होता है, लेकिन उसका नतीजा बहुत मीठा होता है।


