Dil ka sukoon: Ek halki si dastak | दिल का सुकून: एक हल्की सी दस्तक

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मुख़्तसर रहनुमाई

दिल के सुकून की दुआ

اللَّهُمَّ إِنِّي أَعُوذُ بِكَ مِنَ الْهَمِّ وَالْحَزَنِ، وَالْعَجْزِ وَالْكَسَلِ، وَالْبُخْلِ وَالْجُبْنِ، وَضَلَعِ الدَّيْنِ، وَغَلَبَةِ الرِّجَالِ
तलफ़्फ़ुज़:
अल्लाहुम्मा इन्नी अऊज़ु बिका मिनल-हम्मी वल-हज़न, वल-अज्ज़ि वल-कसल, वल-बुखलि वल-जुब्न, व ज़ल-इद्-दैनी व ग़लबतिर-रिजाल।
तर्जुमा:
ऐ अल्लाह, मैं तेरी पनाह माँगता हूँ फ़िक्र और ग़म से, कमज़ोरी और सुस्ती से, कंजूसी और बुज़दिली से, कर्ज़ के बोझ से और लोगों के दबाव से।
मसदर: 
सहीह बुखारी (हदीस नंबर: 2893)
dil ki sukoon ki dua

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कभी-कभी शाम ढलते ही सीने में एक अजीब सी भारीपन महसूस होने लगती है। ऐसा लगता है जैसे रूह थक गई है, पर ज़हन भागना बंद नहीं कर रहा। न कोई बड़ी वजह होती है, न कोई बड़ी चोट, बस एक बेनाम सी बेचैनी होती है जो चुपके से घेर लेती है। हम भीड़ में हों या अकेले, वह अधूरापन साए की तरह साथ रहता है। हम अक्सर सुकून को बाहर की चीज़ों में तलाश करते हैं, जबकि वह तो अंदर के उस शोर को खामोश करने का नाम है जो हमें सोने नहीं देता।

इस्लाम में सुकून का मतलब सिर्फ मुश्किलों का खत्म होना नहीं है, बल्कि मुश्किलों के दरमियान दिल का अल्लाह की याद में टिक जाना है। यह एहसास कि कोई है जो हमारी धड़कनों की रफ़्तार को जानता है, हमारी बेकली को देखता है और जिसके पास हमारी हर उलझन का सिरा मौजूद है। सुकून एक तोहफा है जो सिर्फ उसी की तरफ से अता होता है।

Dil ki sukoon ki dua | दिल के सुकून की दुआ

जब ख्यालात का हुजूम बहुत बढ़ जाए और दिल काबू में न रहे, तो इन अल्फाज़ को ज़ुबान पर लाना रूह को ठंडक देता है। यह दुआ नबी-ए-करीम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने हमें सिखाई है:

اللَّهُمَّ إِنِّي أَعُوذُ بِكَ مِنَ الْهَمِّ وَالْحَزَنِ، وَالْعَجْزِ وَالْكَسَلِ، وَالْبُخْلِ وَالْجُبْنِ، وَضَلَعِ الدَّيْنِ، وَغَلَبَةِ الرِّجَالِ

तलफ़्फ़ुज़ (Transliteration):

Allahumma inni a’udhu bika minal-hammi wal-hazan, wal-‘ajzi wal-kasal, wal-bukhli wal-jubn, wa dala’id-daini wa ghalabatir-rijal.

(अल्लाहुम्मा इन्नी अऊज़ु बिका मिनल-हम्मी वल-हज़न, वल-अज्ज़ि वल-कसल, वल-बुखलि वल-जुब्न, व ज़ल-इद्-दैनी व ग़लबतिर-रिजाल।)

तर्जुमा:

“ऐ अल्लाह, मैं तेरी पनाह माँगता हूँ फ़िक्र और ग़म से, कमज़ोरी और सुस्ती से, कंजूसी और बुज़दिली से, कर्ज़ के बोझ से और लोगों के दबाव से।”

फ़ज़ीलत और ज़रिया:

यह दुआ सहीह बुखारी (हदीस नंबर: 2893) से ली गई है। नबी-ए-करीम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) अक्सर इस दुआ के ज़रिए अल्लाह की पनाह माँगा करते थे।


सुकून की ज़रूरत कब सबसे ज़्यादा होती है?

  • जब रात के सन्नाटे में पुराने दुख या आने वाले कल की फिक्र पीछा न छोड़ रही हो।
  • जब इंसान को लगने लगे कि वह जिम्मेदारियों के बोझ तले दब रहा है।
  • जब कोई बात दिल में फाँस की तरह चुभ रही हो और किसी से कही न जा सके।
  • जब बेवजह का डर या ‘वसवसा’ ज़हन को कमज़ोर करने लगे।

सुकून के चंद आदाब

दिल को शांत करने के लिए दुआ के साथ-साथ कुछ सुन्नत तरीके भी मरहम का काम करते हैं:

  1. बा-वज़ू रहना: पानी का बदन से छूना रूहानी तौर पर गुस्से और बेचैनी को कम करता है।
  2. दुरुद शरीफ की कसरत: जब ज़ुबान पर नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) का ज़िक्र होता है, तो दिल की तड़प धीरे-धीरे सिमटने लगती है।
  3. तन्हाई में अल्लाह से गुफ्तगू: अपनी परेशानी को उन्हीं अल्फाज़ में अल्लाह को सुना दें जैसे आप किसी करीबी दोस्त से बात कर रहे हों।

Kuch Zaroori Sawal | कुछ ज़रूरी सवाल

क्या सुकून तुरंत मिलता है?

सुकून एक दवा की तरह है जो धीरे-धीरे असर करती है। जैसे ही आप अल्लाह पर भरोसा (तवक्कुल) करते हैं, बेचैनी का ज़ोर टूटने लगता है। यकीन रखिए, वह सुन रहा है।

क्या इस दुआ को बार-बार पढ़ना ठीक है?

हाँ, इसे सुबह-शाम के अज़कार में शामिल करना बहुत मुफीद है। जितनी बार दिल चाहे, इसे दोहरा सकते हैं।

अगर दिल फिर भी बेचैन रहे तो?

यह इंसान होने की निशानी है। कुरान में है, “बेशक अल्लाह की याद में ही दिलों का सुकून है।” अगर बेचैनी न जाए, तो सजदे को लंबा करें और अपनी कमजोरी को अल्लाह के सामने कुबूल कर लें।


सुकून की तरफ़ एक नरम क़दम | सुकून की तरफ़ एक नरम क़दम

यकीन मानिए, आपकी हर सिसकी और हर वो आंसू जो गिरते-गिरते रह गया, उसका हिसाब अल्लाह के पास है। वह ‘अश-शाफी’ है, दिलों को शिफा देने वाला। आज की रात अपनी फिक्रें उसे सौंप कर एक गहरी सांस लीजिए। सुकून किसी मंज़िल का नाम नहीं, बल्कि अल्लाह की रहमत पर उस भरोसे का नाम है जो कहता है कि “सब ठीक हो जाएगा।”