ज़िंदगी में कभी-कभी ऐसा वक़्त आता है जब इंसान को लगता है कि हर तरफ़ से रास्ते बंद हो चुके हैं। यह परेशानी सिर्फ़ एक मसले तक महदूद नहीं होती; कभी घर की उलझनें दिल का सुकून छीन लेती हैं, तो कभी माली तंगी रातों की नींद उड़ा देती है। सेहत की खराबी हो या ज़ेहन पर छाया हुआ कोई अनजाना सा बोझ, जब मुसीबतें एक के बाद एक आती हैं, तो इंसान अंदर से टूटने लगता है। वह थक जाता है और उसे समझ नहीं आता कि अपनी बात किससे कहे।
आज़माइश और मोमिन का सब्र
इस्लाम हमें सिखाता है कि यह दुनिया एक मुसाफ़िरखाना है और यहाँ आने वाली परेशानियाँ दरअसल अल्लाह की तरफ़ से एक इम्तिहान हैं। परेशानी का आना इस बात की दलील नहीं है कि अल्लाह आपसे नाराज़ है, बल्कि यह वह वक़्त होता है जब बंदा अपने रब के और करीब आ जाता है। जब सब्र की हदें खत्म होने लगें, तो याद रखें कि अल्लाह किसी पर उसकी हैसियत से ज़्यादा बोझ नहीं डालता। उम्मीद का दामन थामे रखना और हर हाल में उसी की तरफ़ रुजू करना ही एक मोमिन की सबसे बड़ी ताक़त है।
नजात और सुकून की ख़ास दुआ
जब दिल घबराने लगे और कोई सहारा नज़र न आए, तो रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की सुझाई हुई यह दुआ हर मुश्किल के लिए एक बेहतरीन सहारा है। यह वह कलमात हैं जो मायूसी के अंधेरों में उम्मीद की रोशनी भर देते हैं।
لَا إِلَهَ إِلَّا أَنْتَ سُبْحَانَكَ إِنِّي كُنْتُ مِنَ الظَّالِمِينَ
तलफ़्फ़ुज़ (Transliteration):
La ilaha illa anta subhanaka inni kuntu minaz-zalimin.
ला इला-ह इल्ला अन्त सुब्हान-क इन्नी कुन्तु मिनज़-ज़ालिमीन।
तर्जुमा (Translation):
“ऐ अल्लाह! तेरे सिवा कोई माबूद नहीं, तू पाक है। बेशक मैं ही ज़्यादती करने वालों में से हूँ।”
मस्दर (Source):
सूरह अल-अम्बिया, आयत 87 (कुरआन मजीद)। हदीस में आता है कि जो मुसलमान इन कलमात के ज़रिए दुआ करता है, अल्लाह उसकी पुकार ज़रूर सुनता है।
हर मुश्किल का एक ही दर
अक्सर हम सोचते हैं कि क्या एक ही दुआ हर तरह की परेशानी को दूर कर सकती है? हक़ीक़त यह है कि चाहे वह दिल की बेचैनी हो, घर के झगड़े हों, या रोज़गार की तंगी—अल्लाह के लिए कुछ भी मुश्किल नहीं। जब हम अपनी कमज़ोरी का एतराफ़ करते हैं और उसकी बड़ाई बयान करते हैं, तो कुदरत के दरवाज़े अपने आप खुलने लगते हैं। यह दुआ सिर्फ़ अल्फाज़ नहीं, बल्कि अपनी आज़िज़ी का इज़हार है जो अर्श को हिला देता है।
दुआ की कुबूलियत के कुछ आदाब
दुआ सिर्फ़ ज़ुबान से मांगना काफ़ी नहीं, इसके कुछ आदाब हैं जो इसे असरदार बनाते हैं:
- मुकम्मल यकीन: इस बात पर पूरा भरोसा रखें कि मेरा रब मेरी पुकार सुन रहा है।
- इस्तिक़ामत: दुआ मांगने में जल्दी न करें और न ही हिम्मत हारें।
- सदक़ा व खैरात: मुश्किल के वक़्त अपनी हैसियत के मुताबिक़ अल्लाह की राह में खर्च करें।
- तौबा व अस्तग़फ़ार: अपने गुनाहों पर शर्मिंदा होकर अल्लाह से माफ़ी मांगते रहें।
अक्सर पूछे जाने वाले सवालात (Q&A)
क्या एक ही दुआ हर मुश्किल के लिए काफ़ी है?
जी हाँ, अल्लाह के कलाम और नबी (सल्ल.) की सुन्नत में बताई गई दुआओं में इतनी बरकत है कि वह हर किस्म की ज़ेहनी, माली और जिस्मानी परेशानी के लिए काफी हैं। असल चीज़ आपका यकीन है।
दुआ कुबूल होने में देर क्यों होती है?
कभी-कभी अल्लाह हमें आज़माता है ताकि हम और ज़्यादा गिड़गिड़ाकर उससे मांगें। वह हमें वह चीज़ उस वक़्त देता है जो हमारे लिए सबसे बेहतर होती है, न कि उस वक़्त जब हम चाहते हैं।
अगर परेशानी कम न हो तो क्या करें?
सब्र का दामन न छोड़ें और नमाज़ की पाबंदी करें। अल्लाह पर भरोसा रखें कि वह जो भी करेगा, उसमें आपकी भलाई ही होगी।
उम्मीद की आख़िरी बात
याद रखें, रात जितनी गहरी और काली होती है, सुबह का उजाला उतना ही करीब होता है। आपकी आँख से निकलने वाला एक आँसू और दिल से निकली एक सच्ची आह अल्लाह के ग़ज़ब को ठंडा कर देती है। अपनी परेशानियों को अल्लाह के सुपुर्द कर दें और यकीन रखें कि जिस रब ने मुसा (अलैहिस्सलाम) के लिए दरिया में रास्ता बनाया, वह आपके लिए भी बंद दरवाज़े ज़रूर खोलेगा।


