वक़्त की रफ़्तार बहुत खामोश होती है। हमारे बचपन की ज़िद पूरी करते-करते और हमारी ज़िंदगी संवारते हुए वालिदैन कब बुढ़ापे की दहलीज़ पर क़दम रख देते हैं, हमें अंदाज़ा भी नहीं होता। वे अक्सर अपनी ज़रूरियात, अपनी तकलीफ़ें और अपनी ख़्वाहिशात का ज़िक्र तक नहीं करते। उनकी तरफ़ से एक खामोश कुर्बानी का सिलसिला मुस्तक़िल जारी रहता है। इस भागदौड़ भरी ज़िंदगी में हम अक्सर उन्हें कीमती तोहफ़े देने की फ़िक्र तो करते हैं, लेकिन सबसे बड़ा तोहफ़ा जो हम उन्हें हर लम्हा दे सकते हैं, वह है उनके हक़ में की जाने वाली एक सच्ची दुआ।
Walidain ka Maqam | वालिदैन का मक़ाम
इस्लाम में वालिदैन का मक़ाम निहायत बुलंद है। अल्लाह सुब्हानहू व तआला ने अपनी इबादत के हुक्म के फ़ौरन बाद वालिदैन के साथ हुस्न-ए-सुलूक (अच्छा बर्ताव) करने की ताकीद फ़रमाई है। यह महज़ एक अख़लाक़ी ज़िम्मेदारी नहीं, बल्कि एक दीनी फ़रीज़ा है। उनकी फ़रमाबरदारी, उनका एहतराम और उनके सामने अपनी आवाज़ और लहजे को धीमा रखना इबादत का दर्जा रखता है। शुक्रगुज़ारी का जो जज़्बा एक मोमिन के दिल में अल्लाह के लिए होता है, उसी का एक अक्स उसके वालिदैन के लिए भी होना चाहिए।
Masnoon Dua for Walidain | वालिदैन के लिए मसनून दुआ
वालिदैन के लिए दुआ करना कोई रस्म नहीं, बल्कि यह एक औलाद की तरफ़ से ता-उम्र निभाने वाला हक़ है। क़ुरआन-ए-करीम ने हमें निहायत जामेअ और ख़ूबसूरत दुआ सिखाई है:
رَّبِّ ارْحَمْهُمَا كَمَا رَبَّيَانِي صَغِيرًا
तलफ़्फ़ुज़ (Talaaffuz):
रब्बिर्-हम-हुमा कमा रब्बयानी सग़ीरा
(Rabbi irhamhuma kama rabbayanee sagheera)
तर्जुमा (Tarjuma):
“ऐ मेरे परवरदिगार! उन दोनों (वालिदैन) पर रहम फ़रमा, जैसा कि उन्होंने बचपन में मेरी परवरिश की।”
मस्दर (Masdar):
सूरह अल-इस्रा (17), आयत 24
Zinda Walidain Aur Is Dua Ka Asar | ज़िंदा वालिदैन और इस दुआ का असर
जब हम वालिदैन की मौजूदगी में उनके लिए यह दुआ करते हैं, तो यह हमारे दिल में उनके लिए नरमी और मुहब्बत पैदा करती है। यह दुआ महज़ अलफ़ाज़ नहीं, बल्कि एक इक़रार है कि हम उनकी उन तमाम रातों की जाग और तकलीफ़ों को भूले नहीं हैं। इस दुआ की बरकत से हमारे अमल में नरमी आती है और वालिदैन की खिदमत करना हमारे लिए आसान हो जाता है।
Agar Walidain Inteqal Kar Chuke Hon | अगर वालिदैन इंतक़ाल कर चुके हों
अगर वालिदैन इस दुनिया से रुख़सत हो चुके हैं, तब भी औलाद का उनके साथ ताल्लुक़ ख़त्म नहीं होता। सहीह हदीस के मुताबिक़, नेक औलाद की दुआ मय्यत के लिए सदक़ा-ए-जारिया है। कब्र के आलम में जब किसी इंसान के दरजात बुलंद किए जाते हैं और वह पूछता है कि यह कैसे हुआ? तो उसे बताया जाता है कि तेरी औलाद ने तेरे लिए इस्तिग़फ़ार (बख़्शिश की दुआ) की है। यह दुआ उनकी रूह के लिए सुकून और राहत का ज़रिया बनती है।
Rozana Adaab Jo Is Dua Ko Mazboot Banate Hain | रोज़ाना आदाब जो इस दुआ को मज़बूत बनाते हैं
- पाबंदी: इस दुआ को अपनी हर नमाज़ के आख़िरी हिस्से (तशहुद) में पढ़ने की आदत डालें।
- इख़लास: दुआ मांगते वक़्त अपने दिल में उनकी उन कुर्बानियों को याद करें जो उन्होंने आपके लिए दीं।
- अमल: दुआ के साथ-साथ उनके सामने “उफ़” तक न कहें और उनकी जायज़ बातों को मुस्कुराकर मानें।
- ताअल्लुक़: वालिदैन के इंतक़ाल के बाद उनके अज़ीज़ों और दोस्तों के साथ अच्छा सुलूक करना भी इस दुआ की रूह को तक़वियत देता है।
Short Respect-Focused Q&A | सवाल और जवाब
क्या यह दुआ नमाज़ के बाद पढ़ सकते हैं?
जी हाँ, नमाज़ के बाद या नमाज़ के अंदर आख़िरी अत-तहियात में दरूद शरीफ़ के बाद यह दुआ पढ़ना निहायत मुफ़ीद और मसनून है।
अगर रिश्ता ठीक न हो तो क्या करें?
रिश्ते में कड़वाहट के बावजूद दुआ करना औलाद की ज़िम्मेदारी है। यह दुआ आपके दिल को भी साफ़ करेगी और अल्लाह के फ़ज़ल से हालात में बेहतरी लाएगी।
क्या बच्चे भी यह दुआ पढ़ सकते हैं?
बिल्कुल, बच्चों को बचपन से ही यह दुआ याद करानी चाहिए ताकि उनके दिल में वालिदैन की अज़मत और दुआ का शौक़ पैदा हो।
Ek Khamosh Magar Qeemti Amal | एक खामोश मगर क़ीमती अमल
वालिदैन के लिए दुआ करना दरअसल अपने आप पर एहसान करना है। यह वह अमल है जो हमें ज़मीन पर रहते हुए भी अर्श वाले से जोड़ देता है। अल्लाह हमें तौफ़ीक़ दे कि हम अपने वालिदैन की आंखों की ठंडक बनें और उनकी ज़िन्दगी में भी और उनके बाद भी मुस्तक़िल उनके लिए दुआ-ए-खैर करते रहें।


