आख़िरी ज़िम्मेदारी: एक संजीदा अमल
इस्लाम में मय्यत को दफ़न करना महज़ एक रस्म नहीं, बल्कि एक अज़ीम ज़िम्मेदारी और इंसान का आख़िरी हक़ है। यह वह वक़्त होता है जब एक मोमिन को उसकी आख़िरी आरामगाह यानी क़ब्र के सुपुर्द किया जाता है। इस मौक़े पर संजीदगी, ख़ामोशी और इख़लास (सच्ची नियत) की सख़्त ज़रूरत होती है। अल्लाह के रसूल ﷺ की सुन्नत हमें सिखाती है कि इस घड़ी में दुनियावी बातों से बचकर सिर्फ़ आख़िरत की फ़िक्र और मय्यत के लिए दुआ में मसरूफ़ रहना चाहिए।
दफ़न के वक़्त इस्लाम का तरीक़ा
मय्यत को क़ब्र में उतारने और मिट्टी देने का एक मख़सूस सुन्नत तरीक़ा है। जब मय्यत को क़ब्र के अंदर रखा जाए, तो उसे दाहिनी करवट (सीधी तरफ़) लिटाना और चेहरा क़िब्ला की तरफ़ करना सुन्नत है। यह पूरा अमल इंतहाई एहतियात और इज़्ज़त के साथ मुकम्मल किया जाना चाहिए, ताकि मय्यत की हुरमत (इज़्ज़त) बरक़रार रहे।
मसनून दुआएं: मय्यत को क़ब्र में रखते वक़्त और बाद में
शरीअत में दफ़न के मुताल्लिक़ दो अहम मक़ाम पर दुआएं बताई गई हैं:
1. क़ब्र में उतारते वक़्त की दुआ
जब मय्यत को हाथों से उठाकर क़ब्र के अंदर रखा जा रहा हो, तो यह दुआ पढ़नी चाहिए:
بِسْمِ اللَّهِ وَعَلَىٰ سُنَّةِ رَسُولِ اللَّهِ
(कुछ रिवायतों में: وَعَلَىٰ مِلَّةِ رَسُولِ اللَّهِ)
- तलफ़्फ़ुज़: बिस्मिल्लाहि व अला सुन्नति रसूलिल्लाह
- तर्जुमा: अल्लाह के नाम से और रसूलुल्लाह ﷺ की सुन्नत पर।
- मस्दर: सुनन अबू दाऊद, हदीस नंबर 3213 (सहीह)।
2. दफ़न के बाद क़ब्र के पास की दुआ
जब मिट्टी देने का काम मुकम्मल हो जाए, तो वहां ठहरकर मय्यत की साबित-क़दमी के लिए यह दुआ मांगना सुन्नत है:
اللَّهُمَّ اغْفِرْ لَهُ وَارْحَمْهُ وَثَبِّتْهُ
- तलफ़्फ़ुज़: अल्लाहुम्मग़फिर लहु वरहमहु व सब्बितहु
- तर्जुमा: ऐ अल्लाह! इसे माफ़ फ़रमा, इस पर रहम फ़रमा और (सवालों के जवाब के वक़्त) इसे मज़बूत रख।
- मस्दर: सुनन अबू दाऊद, हदीस नंबर 3221 (सहीह)।
दुआ कब और कैसे पढ़ी जाती है
- वक़्त: पहली दुआ उस वक़्त पढ़ें जब मय्यत को क़ब्र की लहद में उतारा जा रहा हो।
- आवाज़: इन दुआओं को बुलंद आवाज़ के बजाय आहिस्ता और संजीदगी से पढ़ना चाहिए।
- मिट्टी देना: मिट्टी देते वक़्त भी दिल में अल्लाह को याद रखें और मय्यत की मग्फ़िरत की नियत रखें।
दफ़न के बाद का अमल
दफ़न मुकम्मल होने के बाद फ़ौरन वहां से चले जाना सुन्नत के ख़िलाफ़ है। नबी-ए-करीम ﷺ दफ़न के बाद क़ब्र के पास कुछ देर ठहरते और फरमाते कि अपने भाई के लिए मग्फ़िरत और ‘तस्बीत’ (सवालों के जवाब में साबित-क़दमी) की दुआ मांगो, क्योंकि इस वक़्त उससे सवाल हो रहे हैं।
आम ग़लतफ़हमियां
- शोर करना: दफ़न के वक़्त ज़ोर-ज़ोर से बातें करना या शोर मचाना आदाब के ख़िलाफ़ है।
- सिर्फ़ रस्म समझना: कई लोग दुआ के बजाय सिर्फ़ मिट्टी डालने को मक़सद समझते हैं, जबकि दुआ मय्यत की असली ज़रूरत है।
- ग़ैर-मसनून तरीक़े: क़ब्र पर ऐसी चीज़ें करना जो सुन्नत से साबित नहीं, उनसे बचना ज़रूरी है।
सवालात और जवाबात
क्या हर शख़्स यह दुआ पढ़ सकता है?
जी हां, जनाज़े में शरीक हर शख़्स और ख़ास तौर पर क़ब्र में उतारने वाले अफ़राद को यह दुआ पढ़नी चाहिए।
अगर अरबी दुआ याद न हो तो क्या करें?
अगर अरबी याद न हो, तो अपनी ज़ुबान में इन दुआओं का तर्जुमा या मफ़हूम दिल में दोहराएं, मगर सुन्नत लफ़्ज़ों को याद करना अफ़ज़ल है।
क्या औरतें यह दुआ पढ़ सकती हैं?
यह दुआ दफ़न के अमल से जुड़ी है, और जो भी शरई हुदूत में रहकर दफ़न के वक़्त मौजूद हो, वह दुआ कर सकता है।
एक आख़िरी अमानत
इंसान का दफ़न उसकी दुनिया की आख़िरी और आख़िरत की पहली मंज़िल है। इस वक़्त की गई दुआ मय्यत के लिए सबसे कीमती तोहफ़ा होती है। अल्लाह तआला हमें सुन्नत के मुताबिक़ आदाब बजा लाने और हमारे तमाम मरहूमीन की मग्फ़िरत फ़रमाने की तौफ़ीक़ दे।

