Bhook Aur Insaan Ki Fitrat
इंसान के जिस्म को ताक़त के लिए खाने की ज़रूरत होती है और भूख लगना एक फ़ितरी अमल है। लेकिन कभी-कभी यह भूख ज़रूरत से आगे बढ़कर नफ़्स की ख़ाहिश बन जाती है। जब इंसान को ज़रूरत न होने पर भी बार-बार खाने की तलब हो, या बे-वक़्त की भूख उसे परेशान करने लगे, तो यहाँ से ज़ब्त-ए-नफ़्स यानी ख़ुद पर क़ाबू रखने की आज़माइश शुरू होती है। इस्लाम हमें भूख को पूरी तरह ख़त्म करना नहीं, बल्कि उसे एतदाल (balance) में रखना सिखाता है।
Islam Bhook Ko Khatam Nahi, Qaboo Sikhata Hai
इस्लाम में खाने-पीने के मामले में मियाना-रवी यानी बीच का रास्ता अपनाने की ताकीद की गई है। बे-लगाम भूख दरअसल नफ़्स का एक ग़लबा है जो इंसान को सुस्ती और ज़रूरत से ज़्यादा मसरूफ़ियत की तरफ़ ले जाता है। यहाँ असल मक़सद भूख को मारना नहीं है, बल्कि अपनी नीयत को साफ़ करना और अल्लाह की दी हुई नेमतों का सही इस्तेमाल करना है। जब हम अपनी भूख पर क़ाबू पाने की नीयत करते हैं, तो यह भी एक इबादत बन जाती है क्योंकि हम अपने नफ़्स को अल्लाह की रज़ा के लिए अनुशासित (discipline) कर रहे होते हैं।
Bhook Par Qaboo Ke Liye Padhi Ja Sakti Hai Yeh Duas
इस्लाम में कोई ऐसी मख़सूस दुआ नहीं है जिसे ‘भूख मिटाने वाली दुआ’ का नाम दिया गया हो। हालाँकि, नफ़्स की बुराई से बचने और अपने ऊपर क़ाबू पाने के लिए रसूलुल्लाह ﷺ ने हमें बेहतरीन दुआएँ सिखाई हैं। यह दुआएँ हमारे दिल को मज़बूत करती हैं ताकि हम बे-वक़्त की तलब और ज़्यादती से बच सकें।
Arabic Dua
اللَّهُمَّ إِنِّي أَعُوذُ بِكَ مِنْ نَفْسٍ لاَ تَشْبَعُ
तलफ़्फ़ुज़
Hindi
अल्लाहुम्मा इन्नी अऊज़ु बिका मिन नफ़्सिल ला तश-बअ।
Roman (Hinglish)
Allahumma inni a’udhu bika min nafsin la tashba’.
तर्जुमा
ए अल्लाह, मैं तेरी पनाह माँगता हूँ ऐसे नफ़्स से जो कभी सैर (मुतमइन) नहीं होता।
Masdar
सह़ीह़ मुस्लिम: 2722 (यह दुआ नफ़्स की ज़्यादती और लालच से बचने के लिए निहायत जामे है)।
Dua Ke Saath Apna Andar Sambhalna
दुआ के साथ-साथ इंसान को अपने अंदर सब्र पैदा करना चाहिए। जब बे-वक़्त खाने का दिल करे या ज़बान के जायक़े की वजह से भूख महसूस हो, तो उस वक़्त अपनी नीयत को याद करें। सब्र का मतलब सिर्फ़ इंतज़ार करना नहीं, बल्कि अपनी ख़ाहिशात को लगाम देना है। जब हम अल्लाह से मदद माँगते हैं और साथ में अपनी आदत को बदलने की कोशिश करते हैं, तो अल्लाह की रहमत से नफ़्स पर क़ाबू पाना आसान हो जाता है। यह अहसास कि हम जो खा रहे हैं वह ज़रूरत के लिए है न कि महज़ शौक़ के लिए, हमारे अंदर एक ठहराव पैदा करता है।
Rozmarrah Zindagi Mein Is Dua Ka Ehsaas
हमारी रोज़ाना की ज़िंदगी में अक्सर ऐसा होता है कि रात के वक़्त या खाली बैठे हुए हमें कुछ खाने की शदीद तलब होती है, जबकि जिस्म को उसकी ज़रूरत नहीं होती। ऐसे मौक़ों पर इस दुआ का विर्द करना और अल्लाह से अपने नफ़्स की शरारत से पनाह माँगना दिल को सुकून देता है। जब भी आप महसूस करें कि आपकी भूख आपकी ज़रूरत से ज़्यादा आप पर हावी हो रही है, तो ठहरें, थोड़ा पानी पिएं और अल्लाह से सब्र और किफ़ायत-शारी (moderation) की दुआ करें। यह अमल आपको बे-मक़सद खाने से बचाएगा और आपकी रूहानी ताक़त को बढ़ाएगा।
Short Q&A
क्या भूख न लगने की दुआ पढ़कर खाना छोड़ देना चाहिए?
नहीं, खाना छोड़ना सुन्नत के ख़िलाफ़ है। दुआ का मक़सद सिर्फ़ उस ग़ैर-ज़रूरी भूख और लालच पर क़ाबू पाना है जो इंसान को हद से आगे बढ़ा देती है। जिस्म का हक़ अदा करना और ज़रूरत के मुताबिक़ खाना ज़रूरी है।
क्या अपनी ज़ुबान में अल्लाह से भूख पर क़ाबू की दुआ माँग सकते हैं?
बेशक, अल्लाह हर ज़ुबान समझता है। अगर आपको अरबी दुआ याद न हो, तो आप अपनी मादरी ज़ुबान में अल्लाह से अपने नफ़्स पर क़ाबू, भूख में एतदाल और सब्र की दुआ माँग सकते हैं।
आख़िरी बात
नफ़्स पर क़ाबू पाना एक मुस्तक़िल कोशिश है। भूख पर क़ाबू पाने के लिए मांगी जाने वाली दुआ दरअसल अल्लाह से उसकी मदद की दरख़्वास्त है ताकि हम अपनी ख़ाहिशात के गुलाम न बनें। जब इंसान अपनी नीयत साफ़ रखता है और सुन्नत के मुताबिक़ अपनी ज़िंदगी गुज़ारने की कोशिश करता है, तो अल्लाह उसके दिल को इत्मीनान बख्श देता है और उसे हर तरह की ज़्यादती से महफ़ूज़ रखता है।


