Shab-e-Qadr ki Dua | शब-ए-क़द्र की दुआ

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मुख़्तसर रहनुमाई

शबे क़द्र (Lailatul Qadr)

اللهم إنك عفو تحب العفو فاعف عني
तलफ़्फ़ुज़:
Allahumma innaka ‘afuwwun tuhibbul ‘afwa fa’fu ‘anni
तर्जुमा:
ऐ अल्लाह! तू बहुत माफ़ करने वाला है, माफ़ करना तुझे पसंद है, लिहाजा मुझे माफ़ कर दे।
मसदर: 
सही तिरमिज़ी 3513, सही इब्न माजा 3850
shab e qadr ki dua hindi

Table of Content

Shab-e-Qadr Ka Ehsaas

रात का आखिरी पहर है। चारों तरफ एक अजीब सी खामोश और ठंडी लहर है। परिंदों की चहचहाहट अभी शुरू नहीं हुई और दुनिया की शोर-शराबे वाली आवाज़ें सो चुकी हैं। यह वह वक्त है जब रूह अपने रब से गुफ्तगू करना चाहती है। शब-ए-क़द्र की रातों में एक अलग ही नूर और सुकून महसूस होता है। चिरागों की मद्धम रोशनी, आंखों में हल्की सी नमी और दिल में बस एक ही उम्मीद—कि शायद यही वह रात है जो हज़ारों महीनों से बेहतर है। इस रात में ज़्यादा बोलने की ज़रूरत नहीं होती, क्योंकि अल्लाह दिलों के हाल लफ़्ज़ों से पहले जानता है।

Is Raat Mein Kya Maanga Jata Hai

इस मुक़द्दस रात में इंसान अपने दामन को फैलाकर सिर्फ वही मांगता है जिसकी उसे सबसे ज़्यादा ज़रूरत है: मग़फ़िरत। हम सब खताओं के पुतले हैं, और यह रात उन तमाम गलतियों को धोने का एक ज़रिया है। लोग अपनी सेहत, रिज़्क़ और दुनियावी खुशियों के लिए भी हाथ उठाते हैं, लेकिन सबसे कीमती चीज़ खुदा की रज़ा और उसके अज़ाब से नजात है। जब आसमान से फरिश्ते ज़मीन पर उतरते हैं, तो वह सिर्फ उस दिल को ढूंढते हैं जो अपने गुनाहों पर शर्मिंदा हो और दोबारा लौटकर न जाने का इरादा रखता हो।

Masnoon Shab-e-Qadr ki Dua (Samajh Ke Saath)

इस मुबारक रात में दो खास दुआओं का ज़िक्र मिलता है। पहली दुआ शब-ए-क़द्र की मख़सूस (खास) दुआ है जो गुनाहों की माफ़ी के लिए है। दूसरी दुआ दुनिया और आख़िरत की हर भलाई समेटने के लिए है।

१. मग़फ़िरत और माफ़ी की खास दुआ

यह दुआ उस वक्त पढ़ें जब आप अपने गुनाहों को याद करके अल्लाह से शर्मिंदा हों। इसे पूरी रात उठते-बैठते और सजदों में दोहराना चाहिए।

Arabic Dua

اللَّهُمَّ إِنَّكَ عَفُوٌّ تُحِبُّ الْعَفْوَ فَاعْفُ عَنِّي

तलफ़्फ़ुज़

अल्लाहुम्मा इन्नका अफुव्वुन, तुहिब्बुल अफवा, फअ़्फ़ु अन्नी।

Devanagari

ऐ अल्लाह, बेशक तू माफ करने वाला है, और माफी को पसंद करता है, पस मुझे माफ कर दे।

Roman (Hinglish)

Allahumma innaka ‘afuwwun, tuhibbul ‘afwa, fa’fu ‘anni.

तर्जुमा

ऐ अल्लाह, तू बेशक बहुत माफ करने वाला है और माफी को पसंद फरमाता है, लिहाज़ा मेरी खताओं को माफ कर दे।

Masdar

सुनन तिर्मिज़ी (3513), यह दुआ नबी ﷺ ने हज़रत आइशा रज़ियल्लाहु अन्हा को सिखाई थी।


२. दुनिया और आख़िरत की भलाई की दुआ

यह दुआ तब पढ़ें जब आप अपनी ज़िंदगी के सुकून, घर की खुशहाली और जहन्नुम से हिफाज़त चाहते हों। यह हर ज़रूरत को पूरा करने वाली जामे दुआ है।

Arabic Dua

رَبَّنَا آتِنَا فِي الدُّنْيَا حَسَنَةً وَفِي الْآخِرَةِ حَسَنَةً وَقِنَا عَذَابَ النَّارِ

तलफ़्फ़ुज़

रबना आतिना फिद-दुनिया हसनतंव-वफिल आख़िरती हसनतंव-वकिना अज़ाबन-नार।

Devanagari

ऐ हमारे रब, हमें दुनिया में भी भलाई दे और आख़िरत में भी भलाई दे, और हमें आग के अज़ाब से बचा।

Roman (Hinglish)

Rabbana atina fid-dunya hasanatan wa fil-akhirati hasanatan wa qina ‘adhaban-nar.

तर्जुमा

ऐ हमारे मालिक, हमें इस दुनिया में भी सुखरू कर और आख़िरत में भी कामयाबी अता फरमा, और हमें दोज़ख की आग से महफूज़ रख।

Masdar

सूरह बक़रह (आयत 201), यह कुरानी दुआ है जिसे नबी ﷺ सबसे ज़्यादा पढ़ते थे।

Dua Padhne Ka Andaz

दुआ मांगते वक्त लफ़्ज़ों से ज़्यादा कैफियत मायने रखती है। जब आप Shab-e-Qadr ki dua पढ़ें, तो यह महसूस करें कि आप अपने रब के सामने बहुत छोटे और आज़िज़ बनकर खड़े हैं। मुसल्ले पर बैठकर, सर झुकाकर और दिल को दुनिया की बातों से खाली करके जब यह पुकारा जाता है, तो इसकी तासीर बदल जाती है। इन दोनों दुआओं को आप बारी-बारी अपनी नमाज़ों और तन्हाई के ज़िक्र में शामिल करें। आवाज़ में शोर न हो, बस एक धीमी सी पुकार हो जो सीधे अर्श तक जाए।

Agar Yeh Raat Pakki Na Ho

अक्सर जेहन में सवाल आता है कि क्या वाकई आज ही शब-ए-क़द्र है? हकीकत तो यह है कि इसे पोशीदा रखने में भी अल्लाह की बड़ी हिकमत है। वह चाहता है कि उसका बंदा सिर्फ एक रात का मेहमान न बने, बल्कि रमज़ान की तमाम ताक़ रातों में उसे ढूंढे। अगर आप हर ताक़ रात में यह दोनों दुआएं कसरत से मांगते हैं, तो यकीनन आप उस घड़ी को पा लेंगे जिसे पाने के लिए मुकद्दस हस्तियां तरसा करती थीं। यह रात गुम नहीं हुई, यह बस कोशिश करने वालों के लिए एक तौफा है।

Short Q&A

क्या यह दोनों दुआएं एक साथ पढ़ सकते हैं?

बिल्कुल। पहली दुआ माफी के लिए खास है और दूसरी दुनिया व आख़िरत की हर खैर के लिए। इन दोनों को मिलाकर पढ़ना बहुत मुबारक है।

क्या अपनी ज़ुबान में भी दुआ कर सकते हैं?

हाँ, इन मसनून दुआओं के बाद आप अपनी ज़ुबान में अपने दिल की हर बात अल्लाह से कह सकते हैं। वह ज़ुबान के साथ-साथ दिल की धड़कन भी समझता है।

मग़फ़िरत की एक रात

जब शब-ए-क़द्र की यह रात गुज़र रही होती है, तो दिल में एक अजीब सी बेकरारी होती है कि कहीं यह मौका हाथ से न निकल जाए। सूरज निकलने से पहले तक रहमतों के दरवाज़े खुले हैं। बस एक बार सच्चे दिल से कह दीजिए, “ऐ अल्लाह, मैं थक गया हूं अपने गुनाहों से, मुझे अपनी पनाह में ले ले।” आपकी एक सिसकी हज़ारों सालों की इबादत पर भारी पड़ सकती है। यह रात गुज़र जाएगी, लेकिन आपकी वह एक सच्ची दुआ हमेशा के लिए आपकी तक़दीर बदल सकती है।