इंसान अपनी फ़ितरत में कमज़ोर है, और इस ज़िंदगी के सफ़र में हमसे जाने-अनजाने में ग़लतियां हो जाना एक फ़ितरी अमल है। इस्लाम हमें यह नहीं सिखाता कि हम अपनी ग़लतियों के बोझ तले दबकर मायूस हो जाएं, बल्कि अल्लाह की रहमत हमें पुकारती है कि हम वापस लौट आएं। Dua e istighfar सिर्फ़ एक लफ़्ज़ नहीं है, बल्कि यह अल्लाह की बे-पनाह रहमत और बंदे की आज़ज़ी के बीच एक मज़बूत पुल है।
Insaan Aur Ghalti Ka Talluq
इंसान होने का मतलब ही यही है कि हम कामिल नहीं हैं। अल्लाह तआला हमारी रग-रग से वाक़िफ़ है, वह जानता है कि हमारे दिल में क्या है और हमसे कहाँ चूक हुई है। गुनाह या ग़लती के बाद जो दिल में एक बोझ महसूस होता है, वह असल में अल्लाह की तरफ़ से एक इशारा है कि हमारा दिल अभी ज़िंदा है और उसे अपने रब की ज़रूरत है।
इस्तिग़फ़ार का दरवाज़ा कभी बंद नहीं होता। यह अल्लाह की वह रहमत है जो हर वक़्त हमारे लिए खुली है। यह सोचना कि “मैंने बहुत ज़्यादा ग़लतियां कर दी हैं”, अल्लाह की रहमत को कम समझने के बराबर है। अल्लाह को अपने बंदे का वापस लौट आना बेहद पसंद है।
Istighfar Sirf Lafz Nahi
अक्सर लोग समझते हैं कि सिर्फ़ ज़बान से कुछ कलिमात दोहरा लेना ही इस्तिग़फ़ार है। लेकिन इसकी असल हक़ीक़त दिल के रुजू में छुपी है। जब हम दुआ-ए-इस्तिग़फ़ार पढ़ते हैं, तो हमारे दिल में अपनी ग़लती पर एक नदामत (शर्मिंदगी) होनी चाहिए। यह नदामत हमें अंदर से साफ़ करती है। इस्तिग़फ़ार का मतलब है अपनी इस्लाह की कोशिश करना। यह इस बात का इक़रार है कि हम कल से बेहतर इंसान बनना चाहते हैं।
Masnoon Duas Jo Istighfar Ke Liye Padhi Ja Sakti Hain
अल्लाह से माफ़ी मांगने के लिए ‘सय्यदुल इस्तिग़फ़ार’ को सबसे अफ़ज़ल और आला दुआ माना जाता है। इसके अलावा एक छोटी और जामे दुआ भी है जो आम तौर पर कसरत से पढ़ी जाती है।
Arabic Dua (Sayyidul Istighfar)
اللَّهُمَّ أَنْتَ رَبِّي لَا إِلَهَ إِلَّا أَنْتَ، خَلَقْتَنِي وَأَنَا عَبْدُكَ، وَأَنَا عَلَى عَهْدِكَ وَوَعْدِكَ مَا اسْتَطَعْتُ، أَعُوذُ بِكَ مِنْ شَرِّ مَا صَنَعْتُ، أَبُوءُ لَكَ بِنِعْمَتِكَ عَلَيَّ، وَأَبُوءُ لَكَ بِذَنْبِي فَاغْفِرْ لِي، فَإِنَّهُ لَا يَغْفِرُ الذُّنُوبَ إِلَّا أَنْتَ
तलफ़्फ़ुज़
अल्लाहुम्मा अंता रब्बी ला इलाहा इल्ला अंता, ख़लक़-तनी व अना अ़ब्दुका, व अना अ़ला अ़ह्दिका व वअ़-दिका मस्त-तअ़्तु, अ़ऊज़ु बिका मिन शर्रि मा सनअ़्तु, अबू-उ लका बि-निअ़्म-तिका अ़लय्या, व अबू-उ बि-ज़म्बी फ़ग़-फ़िर ली, फ़-इन्नहू ला यग़-फ़िरुज़-ज़ुनूबा इल्ला अंता।
Roman (Hinglish)
Allahumma Anta Rabbi la ilaha illa Anta, Khalaqtani wa ana ‘abduka, wa ana ‘ala ‘ahdika wa wa’dika mastata’tu, A’udhu bika min sharri ma sana’tu, abu’u Laka bini’matika ‘alayya, wa abu’u bidhanbi faghfirli fa innahu la yaghfiru adhdhunuba illa Anta.
तर्जुमा
ऐ अल्लाह, तू ही मेरा रब है, तेरे सिवा कोई माबूद नहीं। तूने ही मुझे पैदा किया और मैं तेरा बंदा हूँ। मैं अपनी ताक़त के मुताबिक़ तेरे अहद और वादे पर क़ायम हूँ। मैं अपने उन कामों की बुराई से तेरी पनाह मांगता हूँ जो मैंने किए। मैं तेरे उन एहसानात का इक़रार करता हूँ जो तूने मुझ पर किए, और मैं अपने गुनाहों का इक़रार करता हूँ। पस, मुझे माफ़ फ़रमा दे, क्योंकि तेरे सिवा कोई गुनाहों को माफ़ नहीं कर सकता।
Masdar
सहीह बुख़ारी (हदीस: 6306)
Arabic Dua (Choti aur Jame Dua)
أَسْتَغْفِرُ اللَّهَ رَبِّي مِنْ كُلِّ ذَنْبٍ وَأَتُوبُ إِلَيْهِ
तलफ़्फ़ुज़
अस्तग़-फ़िरुल्लाह रब्बी मिन कुल्लि ज़म्बिन व अतू-बु इलैह
Roman (Hinglish)
Astaghfirullah Rabbi min kulli dhanbin wa atubu ilayh.
तर्जुमा
मैं अल्लाह से माफ़ी चाहता हूँ जो मेरा रब है, अपने हर गुनाह से, और मैं उसी की तरफ़ तौबा करता हूँ।
Masdar
सहीह हदीसों के मफ़हूम पर मबनी मशहूर और मोतबर दुआ।
Istighfar Ke Saath Dil Ka Safar
जब हम इस्तिग़फ़ार को अपनी ज़िंदगी का हिस्सा बना लेते हैं, तो हमारे अंदर एक ठहराव आता है। यह सफ़र मायूसी का नहीं बल्कि उम्मीद का है। अल्लाह पर कामिल भरोसा ही हमें इस बात का यक़ीन दिलाता है कि वह बहुत माफ़ करने वाला है। इस्तिग़फ़ार करने वाला शख़्स कभी तन्हा नहीं होता, क्योंकि वह हमेशा अपने ख़ालिक़ से राब्ते में रहता है। यह हमारे दिल की सफ़ाई करता है और हमें उस नूर की तरफ़ ले जाता है जो हमें सही और ग़लत के बीच फ़र्क़ करना सिखाता है।
Rozmarrah Zindagi Mein Istighfar Ki Jagah
इस्तिग़फ़ार के लिए कोई ख़ास वक़्त की पाबंदी नहीं है। सुबह घर से निकलते वक़्त, काम के दौरान, या रात को सोने से पहले—ये सब इस्तिग़फ़ार के बेहतरीन मौक़े हैं।
- सय्यदुल इस्तिग़फ़ार: इसे सुबह और शाम को पढ़ना सुन्नत से साबित है और इसकी बहुत बड़ी फ़ज़ीलत है।
- मुख़्तसर दुआ: काम के दौरान या चलते-फिरते जब भी दिल में अल्लाह का ख़याल आए, छोटी दुआ पढ़ी जा सकती है।
छोटी-छोटी ग़लतियां जो हमसे रोज़ाना होती हैं, उनके लिए “अस्तग़फ़िरुल्लाह” कहना रूह को ताज़ा रखता है।
मुख़्तसर सवाल-जवाब
क्या सिर्फ़ ज़बान से इस्तिग़फ़ार करना काफ़ी है?
ज़बान से कहना इक़रार है, लेकिन इसका असल मक़सद दिल में नदामत महसूस करना और आइंदा ग़लती न करने की कोशिश करना है। अल्लाह हमारी नियत और दिल के हाल को देखता है।
क्या बार-बार वही ग़लती हो जाए तो भी इस्तिग़फ़ार जाइज़ है?
हाँ, बिल्कुल। अल्लाह की रहमत बहुत वसी है। जब तक बंदा सच्चे दिल से माफ़ी मांगता रहेगा और बेहतर होने की कोशिश करेगा, अल्लाह का दरवाज़ा खुला है।
आख़िरी बात
इस्तिग़फ़ार का दरवाज़ा अल्लाह ने सिर्फ़ इसलिए खोला है क्योंकि वह हमसे बे-इंतहा मोहब्बत करता है। वह नहीं चाहता कि उसका बंदा गुनाहों के बोझ तले दबा रहे। जब भी आप रूहानी तौर पर थक जाएं या आपको लगे कि आप अपने रब से दूर हो रहे हैं, तो इन दुआओं को अपना सहारा बनाएं। अल्लाह की रहमत हर चीज़ पर ग़ालिब है और उसका दर हमेशा आपके इंतज़ार में खुला है।
