Khauf Se Bachne Ki Dua | डर और घबराहट के वक़्त की दुआ

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मुख़्तसर रहनुमाई

डर और घबराहट के वक़्त की दुआ

لَا إِلَٰهَ إِلَّا أَنْتَ سُبْحَانَكَ إِنِّي كُنْتُ مِنَ الظَّالِمِينَ
तलफ़्फ़ुज़:
ला इला-ह इल्ला अन्त सुब्हा-न-क इन्नी कुन्तु मि-नज़्ज़ालिमीन
तर्जुमा:
अल्लाह के सिवा कोई माबूद नहीं, तू पाक है, बेशक मैं ही ज़्यादती करने वालों में से हूँ।
मसदर: 
क़ुरान (सूरह अल-अम्बिया, आयत 87)
khauf se bachne ki dua main

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Khauf Insaani Jazba Hai

ज़िंदगी के सफ़र में कभी न कभी हर इंसान के दिल में ख़ौफ़ दस्तक देता है। चाहे वह आने वाले कल का अंदेशा हो, अकेलेपन की घबराहट हो या दिल पर छाया हुआ कोई अनजाना बोझ—ये तमाम कैफ़ियतें इंसानी फ़ितरत का हिस्सा हैं। इस्लाम हमें यह सिखाता है कि डर का महसूस होना न तो कोई गुनाह है और न ही यह किसी की शख़्सियत की कमी है।

अक्सर जब हम घबराहट महसूस करते हैं, तो हमें लगता है कि शायद हम अकेले हैं, लेकिन हक़ीक़त यह है कि बड़े-बड़े पैग़ंबरों और नेक लोगों ने भी अपनी ज़िंदगी के मुश्किल तरीन लम्हों में ख़ौफ़ और बेचैनी को महसूस किया था। इस्लाम हमें इस डर को दबाने के लिए नहीं कहता, बल्कि उस डर के साथ अल्लाह की पनाह में आने का रास्ता दिखाता है।

Islam Khauf Ke Waqt Kya Sikhata Hai

इस्लाम में ख़ौफ़ का इलाज शर्मिंदगी नहीं, बल्कि सुकून की तलाश है। जब दिल बेक़रार हो या किसी अनहोनी का अंदेशा सताए, तो इस्लाम हमें यकीन दिलाता है कि अल्लाह हमारे सबसे करीब है। अल्लाह की याद और उससे की जाने वाली गुफ़्तगू दिल के बोझ को हल्का करती है।

डर के वक़्त इस्लाम हमें ज़हन को उलझाने के बजाय उसे अल्लाह की रहमत की तरफ़ मोड़ने की सीख देता है। यह अहसास कि “अल्लाह मेरे साथ है” और “वह मेरी हिफ़ाज़त करने वाला है”, इंसान को अंदरूनी तौर पर मज़बूत बनाता है। यहाँ मक़सद डर को ज़बरदस्ती ख़त्म करना नहीं, बल्कि उस डर के बीच भी दिल का इत्मिनान और हौसला पाना है।

Khauf Ke Waqt Padhi Ja Sakti Hai Yeh Duas

जब घबराहट हद से बढ़ने लगे या दिल डूबने लगे, तो अल्लाह की पनाह मांगना सबसे बेहतर है। यहाँ दो ऐसी दुआएं दी जा रही हैं जो दिल के सुकून और अमान के लिए बहुत मोअतबर (प्रामाणिक) मानी जाती हैं।

Arabic Dua

لَا إِلَٰهَ إِلَّا أَنْتَ سُبْحَانَكَ إِنِّي كُنْتُ مِنَ الظَّالِمِينَ

तलफ़्फ़ुज़

ला इला-ह इल्ला अन्त सुब्हा-न-क इन्नी कुन्तु मि-नज़्ज़ालिमीन

Roman (Hinglish)

La ilaha illa anta subhanaka inni kuntu minazzalimeen

तर्जुमा

अल्लाह के सिवा कोई माबूद नहीं, तू पाक है, बेशक मैं ही ज़्यादती करने वालों में से हूँ।

Masdar

क़ुरान (सूरह अल-अम्बिया, आयत 87) — हज़रत यूनुस अलैहिस्सलाम की दुआ जो मुश्किल और बेचैनी के वक़्त पढ़ी जाती है।


Arabic Dua

اللَّهُمَّ اسْتُرْ عَوْرَاتِي وَآمِنْ رَوْعَاتِي

तलफ़्फ़ुज़

Devanagari

अल्लाहुम्मस्तुर औ-रा-ती व आ-मिन रौ-आ-ती

Roman (Hinglish)

Allahummastur ‘awrati wa aamin raw’ati

तर्जुमा

ऐ अल्लाह! मेरी पर्दापोशी फ़रमा और मेरे ख़ौफ़ (घबराहट) को अमन और सुकून में बदल दे।

Masdar

सुनन अबू दाऊद (सहीह)

Dua Ke Saath Dil Ko Kaise Sambhalein

दुआ मांगने के साथ-साथ अपने नफ़्स और जज़्बात को संभालना भी ज़रूरी है। जब ख़ौफ़ का ग़लबा हो, तो गहरी और इत्मिनान भरी सांस लें और अपना सारा मामला अल्लाह के सुपुर्द कर दें। तसल्ली इस बात में नहीं है कि कल क्या होगा, बल्कि इस यकीन में है कि जो भी होगा, अल्लाह की रहमत उससे बड़ी है।

अपने दिल को बार-बार यह समझाएं कि बेचैनी एक आरज़ी (अस्थायी) कैफियत है। अल्लाह पर भरोसा (तवक्कुल) करने का मतलब यह नहीं कि डर गायब हो जाएगा, बल्कि इसका मतलब यह है कि उस डर के बावजूद आप खुद को अल्लाह की पनाह में महफूज़ महसूस करेंगे।

Rozmarrah Zindagi Mein Khauf Ka Samna

रात की तन्हाई में होने वाली घबराहट हो या मुस्तकबिल (भविष्य) के किसी मुश्किल फ़ैसले का डर, ये सब हमारी रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा हैं। कभी-कभी हमें लगता है कि हम अकेले इस अंधेरे में खड़े हैं, लेकिन ऐसे वक़्त में ज़बान पर अल्लाह का ज़िक्र और दिल में उसकी मौजूदगी का अहसास ढाल बन जाता है।

तन्हाई का ख़ौफ़ हो या किसी नुक़सान का अंदेशा, याद रखें कि आपकी हर धड़कन और हर फ़िक्र से अल्लाह वाक़िफ़ है। जब इंसान अपनी कमज़ोरी को मान लेता है और अल्लाह से मदद मांगता है, तो वही ख़ौफ़ उसे अल्लाह के और करीब ले आता है।

मुख़्तसर सवाल-जवाब

क्या डर आना ईमान की कमज़ोरी है?
जी नहीं, डर महसूस करना एक फ़ितरी इंसानी जज़्बा है। सहाबा और नेक बंदों ने भी अपनी ज़िंदगी के मुश्किल हालात में ख़ौफ़ महसूस किया था। ईमान का ताल्लुक इस बात से है कि आप उस डर की हालत में किसके पास जाते हैं और किससे मदद मांगते हैं।

क्या ख़ौफ़ के वक़्त अपनी ज़बान में दुआ मांग सकते हैं?
बिल्कुल, अल्लाह दिल के हाल और हर ज़बान को जानता है। अगर आप अरबी दुआएं नहीं पढ़ पा रहे हैं, तो अपनी मादरी ज़बान में अल्लाह से अपनी घबराहट का ज़िक्र करें और उससे सुकून मांगें। अल्लाह के लिए दिल की आवाज़ सबसे अहम है।

आख़िरी बात

ख़ौफ़ की हालत में सबसे बड़ी कामयाबी यह है कि आप अपनी बेक़रारी को अल्लाह के सामने रख दें। अल्लाह की पनाह वह जगह है जहाँ हर घबराहट को सुकून मिलता है और हर बेचैन दिल को इत्मिनान। इस उम्मीद के साथ जिएं कि अल्लाह आपकी हिफ़ाज़त करने वाला है और वह आपको कभी तन्हा नहीं छोड़ेगा। ज़हन में रखें कि दुआ और सब्र के साथ हर मुश्किल घड़ी गुज़र जाती है।