Zalzala Aur Insaani Ghabrahat
ज़लज़ला (Earthquake) एक ऐसी कुदरती आफत है जो बिना किसी चेतावनी के आती है। जब ज़मीन हिलती है, तो इंसान का दिल दहल जाता है। यह एक ऐसा लम्हा होता है जब इंसान खुद को पूरी तरह बेबस महसूस करता है।
अचानक आने वाले झटकों से घबराहट होना, अपने परिवार की फिक्र होना और दिल का ज़ोर से धड़कना एक बहुत ही फितरी (natural) बात है। ऐसे हालात में समझ नहीं आता कि क्या करें और कहां जाएं। यह कन्फ्यूजन और डर हर किसी को महसूस होता है। इस्लाम ऐसे नाजुक वक्त में हमें अपने जज़्बात को दबाने के लिए नहीं, बल्कि अल्लाह की तरफ रुजू करने की सलाह देता है।
Zalzale Ke Waqt Islam Ka Rawaiya
जब ज़मीन हिल रही हो, तो एक मोमिन (ईमान वाला) का रवैया घबराहट में चीखने-चिल्लाने का नहीं होना चाहिए, बल्कि अल्लाह की पनाह मांगने का होना चाहिए। इस्लाम हमें सिखाता है कि कायनात का हर ज़र्रा अल्लाह के हुक्म का पाबंद है।
ऐसे वक्त में सबसे ज़रूरी है कि हम ज़ाहिरी तौर पर अपनी हिफाज़त (Safety measures) का खयाल रखें और बातिनी तौर पर (दिल से) अल्लाह पर भरोसा रखें। अमन और सुकून तलाश करने का सबसे बेहतरीन ज़रिया अल्लाह का ज़िक्र है। यह वक्त तौबा करने का और अल्लाह की रहमत तलब करने का होता है।
Zalzale Ke Waqt Padhi Ja Sakti Hai Yeh Duas
हदीस की किताबों में “ज़लज़ले की दुआ” (Zalzale ki dua) के नाम से कोई एक मखसूस (specific) दुआ मौजूद नहीं है। लेकिन, मुश्किलात, घबराहट और बलाओं से हिफाज़त के लिए पैगंबर मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने जो दुएं सिखाई हैं, उन्हें ज़लज़ले के वक्त पढ़ा जा सकता है।
यहाँ दो बहुत ही मोतबर (authentic) दुआएं दी जा रही हैं जो ऐसे डर के माहौल में पढ़ी जानी चाहिए:
1. मुसीबत और परेशानी के वक़्त की दुआ (आयत-ए-करीमा)
यह पैगंबर यूनुस (अलैहिस्सलाम) की दुआ है, जो उन्होंने मछली के पेट में अंधेरे और मुसीबत के वक्त पढ़ी थी। अल्लाह ने क़ुरआन में फ़रमाया है कि इस दुआ के ज़रिए उन्होंने यूनुस (अ.स.) को निजात दी और इसी तरह वह मोमिनों को भी निजात देगा।
Arabic Dua
لَا إِلَهَ إِلَّا أَنْتَ سُبْحَانَكَ إِنِّي كُنْتُ مِنَ الظَّالِمِينَ
तलफ़्फ़ुज़
ला इलाह इल्ला अन-त सुब-हानक इन्नी कुन-तु मिनज़-ज़ालिमीन
Roman (Hinglish)
La ilaha illa Anta Subhanaka Inni Kuntu Minaz-Zalimin
तर्जुमा
तेरे सिवा कोई माबूद (इबादत के लायक) नहीं, तेरी ज़ात पाक है; बेशक मैं ही कुसूरवारों में से हूँ।
Masdar
सूरह अल-अंबिया (21:87) | जामे तिरमिज़ी
2. डर और घबराहट में अल्लाह पर भरोसे की दुआ
जब ज़मीन हिल रही हो और दिल में खौफ बैठ जाए, तो यह दुआ अल्लाह पर मुकम्मल भरोसे का इज़हार है। इसे हज़रत इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) ने आग में डाले जाते वक्त और पैगंबर मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने मुश्किल वक्त में पढ़ा था।
Arabic Dua
حَسْبُنَا اللَّهُ وَنِعْمَ الْوَكِيلُ
तलफ़्फ़ुज़
हस्बु-नल्लाहु व नेअ-मल वकील
Roman (Hinglish)
Hasbunallahu Wa Ni’mal Wakil
तर्जुमा
हमारे लिए अल्लाह काफी है, और वह बेहतरीन कारसाज़ (काम बनाने वाला/हिफाज़त करने वाला) है।
Masdar
सहीह बुखारी
Dua Ke Saath Dil Ko Kaise Sambhalein
दुआ के अल्फाज़ ज़ुबान से अदा करने के साथ-साथ, दिल की कैफियत को संभालना भी ज़रूरी है। जब आप “हस्बु-नल्लाहु व नेअ-मल वकील” पढ़ें, तो इस यकीन के साथ पढ़ें कि जो ज़ात ज़मीन को हिला सकती है, वही उसे थाम भी सकती है।
ज़लज़ले के झटकों के दौरान अपनी और अपने घर वालों की हिफाज़त के लिए जो भी मुमकिन कोशिश हो (जैसे किसी मज़बूत चीज़ के नीचे छुपना), उसे ज़रूर अपनाएं। दुआ और एहतियात (Safety) अलग-अलग नहीं हैं, बल्कि दोनों साथ-साथ चलते हैं। अल्लाह की याद से दिल को तसल्ली दें कि हर चीज़ उसके इख्तियार में है।
Zalzale Ke Baad Dil Mein Rehne Wala Khauf
अक्सर ज़लज़ला रुक जाने के बाद भी एक डर बाकी रह जाता है। “क्या दोबारा झटके आएंगे?” (Aftershocks) का खौफ नींद और सुकून छीन लेता है। यह बेचैनी इन्सानी फितरत का हिस्सा है।
ऐसे में, बार-बार न्यूज़ देखने या डरने की बजाय, अपने घर में कुरआन की तिलावत करें या सादे लफ्ज़ों में अल्लाह से खैर और अमन की दुआ मांगते रहें। एक-दूसरे को हिम्मत बंधाएं। याद रखें, अल्लाह की हिफाज़त का दायरा हमारे डर से बहुत बड़ा है।
मुख़्तसर सवाल-जवाब
क्या ज़लज़ला अल्लाह का अज़ाब होता है?
हर ज़लज़ला अज़ाब नहीं होता। यह अल्लाह की निशानी (Sign) है जो उसकी ताकत दिखाती है और बंदों को याद दिलाती है कि वे अल्लाह की तरफ लौटें। इसे सज़ा समझने के बजाय, खुद को सुधारने और तौबा करने का मौका समझना चाहिए।
क्या ज़लज़ले के वक़्त अपनी ज़ुबान (मातृभाषा) में दुआ मांग सकते हैं?
बिल्कुल। अल्लाह दिलों का हाल जानता है। अगर आपको अरबी दुआ याद नहीं आ रही या घबराहट बहुत ज़्यादा है, तो आप अपनी ज़ुबान (हिंदी/उर्दू) में अल्लाह को पुकार सकते हैं। वह हर पुकार सुनता है।
आख़िरी बात
ज़लज़ले की दुआ सिर्फ लफ्ज़ों की अदायगी नहीं है, बल्कि यह इस बात का इकरार है कि हम अपनी जान-माल की सलामती के लिए सिर्फ अल्लाह के मोहताज हैं। जब भी ऐसा वक्त आए, तो पैनिक होने के बजाय अल्लाह की बड़ाई बयान करें और उसकी रहमत की उम्मीद रखें।
अल्लाह तआला हम सबको, हमारे मुल्क को और तमाम इंसानियत को हर तरह की आफत और बलाओं से महफूज़ रखे। आमीन।


