Baarish Ki Dua | बारिश के वक़्त की मसनून दुआ

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मुख़्तसर रहनुमाई

बारिश की दुआ

اللَّهُمَّ صَيِّبًا نَافِعًا
तलफ़्फ़ुज़:
अल्लाहुम्मा सय्यिबन नाफ़िअ
तर्जुमा:
ऐ अल्लाह! इसे (इस बारिश को) खूब बरसने वाला और नफ़ा (फ़ायदा) देने वाला बना दे।
मसदर: 
सहीह बुख़ारी: 1032
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Baarish: Allah Ki Taraf Se Ek Tohfa

सख्त गर्मी और धूप के बाद जब आसमान से पानी बरसता है, तो ज़मीन और इंसान दोनों को सुकून मिलता है। इस्लाम में बारिश को सिर्फ पानी की बूंदें नहीं माना जाता, बल्कि इसे “रहमत” कहा गया है।1 यह अल्लाह का वह निज़ाम है जिससे सूखी ज़मीन ज़िंदा होती है, खेतों को पानी मिलता है और इन्सानों के रिज़्क़ का सामान पैदा होता है।

बारिश का बरसना इस बात का सबूत है कि अल्लाह अपने बंदों की ज़रूरतों से वाकिफ़ है। जब हम बारिश को देखते हैं, तो हमारे दिल में खुशी के साथ-साथ शुक्र का जज़्बा भी होना चाहिए। यह वक़्त अल्लाह से जुड़ने और अपनी हाजतों को तलब करने का बहुत कीमती वक़्त होता है।

Rahmat Ka Darwaza Khulna

हदीसों में आता है कि बारिश का वक़्त दुआओं की कुबूलियत का वक़्त होता है। जब आसमान से पानी गिर रहा हो, तो उस वक़्त रहमत के दरवाज़े खुले होते हैं। एक मोमिन (ईमान वाला) बारिश को देखकर कभी भी कुढ़ता नहीं है और न ही कीचड़ या परेशानी की शिकायत करता है।

इसके बजाय, वह अल्लाह की इस नेमत का इस्तिकबाल (स्वागत) एक प्यारी सी दुआ के साथ करता है। मकसद यह होता है कि यह बारिश हमारे लिए सिर्फ पानी न रहे, बल्कि नफ़ा (फ़ायदा) पहुँचाने वाली ज़रिया बन जाए।

Baarish Dekhte Hi Padhne Wali Dua

नबी-ए-करीम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) जब बारिश बरसती हुई देखते, तो अपनी उम्मत को एक बहुत ही जामिए (comprehensive) दुआ की तालीम देते थे। यह दुआ बहुत मुख़्तसर है लेकिन इसका मतलब बहुत गहरा है।

Arabic Dua

اللَّهُمَّ صَيِّبًا نَافِعًا

तलफ़्फ़ुज़

अल्लाहुम्मा सय्यिबन नाफ़िअ

Roman (Hinglish)

Allahumma Sayyiban Nafi’a

तर्जुमा

ऐ अल्लाह! इसे (इस बारिश को) खूब बरसने वाला और नफ़ा (फ़ायदा) देने वाला बना दे।

Masdar

(सहीह बुख़ारी: 1032)

‘Nafi’a’ (Faydemand) Maangne Ki Wajah

इस दुआ में एक बहुत खास लफ़्ज़ “नाफ़िअ” इस्तेमाल हुआ है, जिसका मतलब है “फ़ायदेमंद”। हम अल्लाह से यह दुआ इसलिए करते हैं क्योंकि हर बारिश रहमत नहीं होती; कभी-कभी तेज़ बारिश बाढ़ या नुकसान का सबब भी बन सकती है।

जब हम यह दुआ पढ़ते हैं, तो हम अल्लाह से दरख्वास्त करते हैं कि यह पानी हमारी फसलों, हमारे पीने के पानी के ज़खीरों और हमारे माहौल के लिए अच्छा साबित हो। यह दुआ हमें सिखाती है कि चीज़ों का होना ही काफी नहीं है, बल्कि उनका “खैर” और “बरकत” वाला होना असली कामयाबी है।

मुख़्तसर सवाल-जवाब

क्या बारिश के दौरान कोई और दुआ भी मांगी जा सकती है?
जी हाँ, हदीस के मुताबिक बारिश बरसने के वक़्त दुआएं रद्द नहीं की जातीं। इसलिए इस मसनून दुआ के साथ-साथ आप अपनी निजी हाजतों और परेशानियों के लिए भी अल्लाह से दुआ कर सकते हैं।

अगर बारिश बहुत तेज़ हो जाए और नुकसान का डर हो, तो क्या करें?
अगर बारिश ज़रूरत से ज़्यादा हो जाए और नुकसान का अंदेशा हो, तो एक अलग दुआ (हवालात) पढ़ी जाती है जिसमें बारिश को रोकने या दूसरी तरफ़ मोड़ने की दरख्वास्त होती है। लेकिन आम बारिश में “अल्लाहुम्मा सय्यिबन नाफ़िअ” ही सबसे बेहतरीन दुआ है।

आख़िरी बात

बारिश अल्लाह की कुदरत का एक हसीन नज़ारा है। अगली बार जब आप बादलों को बरसता देखें, तो शिकायत करने के बजाय अपने दिल को अल्लाह की तरफ़ मोड़ें। यह दुआ पढ़ें और महसूस करें कि अल्लाह की रहमत आप पर बरस रही है। छोटी-छोटी सुन्नतों पर अमल करने से ही हमारी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में बरकत और नूर आता है।