रमज़ान के आख़िरी अशरे (आखिरी 10 दिन) में रातों का माहौल बदल जाता है। एक अजीब सी ख़ामोशी और रूहानी सुकून होता है। यह वो वक़्त होता है जब मोमिन अपनी नींद क़ुर्बान करके अपने रब को मनाता है। लैलतुल क़द्र दुआ (Laylatul Qadr Dua) सिर्फ अल्फ़ाज़ नहीं, बल्कि बंदे की आजीज़ी और अल्लाह की रहमत के बीच का सबसे मज़बूत रिश्ता है।
इस रात की क़द्र वही जानता है, जिसे अपने गुनाहों का अहसास हो और दिल में मग़फ़िरत की सच्ची तड़प हो। यहाँ हम आपको वो सही और मसनून दुआ बता रहे हैं, जो हमारे नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने इस रात के लिए ख़ास तौर पर सिखाई है।
लैलतुल क़द्र और दुआ का रिश्ता
कुरआन-ए-पाक में इस रात को “हज़ार महीनों से बेहतर” बताया गया है। सोचिए, एक रात की इबादत, 83 साल की इबादत से भी ज़्यादा वज़नी है। इस रात अल्लाह की रहमत अपने जोश पर होती है। फरिश्ते ज़मीन पर उतरते हैं और हर उस शख्स के लिए दुआ-ए-मग़फ़िरत करते हैं जो इबादत में मशगूल हो।
इस मुबारक रात में सबसे ज़्यादा अहमियत “माफी” की है। इसलिए जो दुआ सुन्नत से साबित है, वो भी अल्लाह की सिफ़त ‘अफ़ुww’ (माफ़ करने वाला) पर मबनी है।
मसनून लैलतुल क़द्र दुआ (Masnoon Dua for Laylatul Qadr)
यह वो दुआ है जो हज़रत आयशा (रज़ियल्लाहु अन्हा) ने हुज़ूर (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) से पूछी थी कि “अगर मुझे लैलतुल क़द्र मिल जाए, तो मैं क्या पढ़ूँ?” तो आप (स.अ.व) ने यह दुआ सिखाई। इसे कसरत से पढ़ें:
अरबी टेक्स्ट (Arabic Text)
اللَّهُمَّ إِنَّكَ عَفُوٌّ تُحِبُّ الْعَفْوَ فَاعْفُ عَنِّي
हिंदी तलफ़्फ़ुज़ (Hindi Pronunciation)
अल्लाहुम्मा इन्नका ‘अफ़ुव्वुन तुहिब्बुल-‘अफ़्वा फ़‘अफ़ु ‘अन्नी
इंग्लिश तलफ़्फ़ुज़ (English Transliteration)
Allahumma innaka ‘afuwwun tuhibbul-‘afwa fa‘fu ‘anni
तर्जुमा (Translation)
“ऐ अल्लाह! बेशक तू बड़ा माफ़ करने वाला है, माफ़ी को पसंद करता है, तो मुझे माफ़ कर दे।”
मसदर (Reference)
जामिअ़ तिर्मिज़ी: 3513 (सहीह हदीस)
दुआ पढ़ने का सही तरीक़ा और आदाब
लैलतुल क़द्र की रात बहुत कीमती है, इसे गफ़लत में न गुज़ारें। दुआ मांगते वक़्त इन बातों का ख़्याल रखें:
- आजीज़ी (Humility): दुआ ऐसे माँगें जैसे कोई ज़रूरत-मंद झोली फैलाकर मांगता है। अपने गुनाहों पर शर्मिंदगी महसूस करें।
- तकरार (Repetition): इस छोटी सी दुआ को बार-बार पढ़ें। चलते-फिरते, नफ़िल नमाज़ के सजदे में, और ख़ास तौर पर तहज्जुद के वक़्त।
- यक़ीन: जब कहें “तू माफ़ी को पसंद करता है”, तो दिल में यकीन रखें कि अल्लाह आपकी तौबा का ही इंतज़ार कर रहा है।
- कैफ़ियत: अगर रोना न आए, तो रोने जैसी सूरत बना लें। अल्लाह टूटे हुए दिलों की पुकार जल्दी सुनता है।
लैलतुल क़द्र कब होती है? (सही वक्त)
अक्सर लोग परेशान रहते हैं कि “क्या आज लैलतुल क़द्र है?” हिकमत इसी में है कि अल्लाह ने इसे पोशीदा (छुपा हुआ) रखा है ताकि हम ज़्यादा इबादत करें।
हमें इसे रमज़ान की आख़िरी 10 रातों में, ख़ासकर ताक़ रातों (Odd Nights – 21, 23, 25, 27, 29) में तलाश करना चाहिए। सिर्फ 27वीं रात पर भरोसा करके बाकी रातों को न छोड़ें। हर ताक़ रात को यही समझकर इबादत करें कि शायद यही वो रात हो।
लैलतुल क़द्र से जुड़े अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
क्या लैलतुल क़द्र में सिर्फ यही दुआ पढ़ सकते हैं?
नहीं, आप कोई भी जायज़ दुआ मांग सकते हैं। अपनी सेहत, रिज़्क़ और हिदायत के लिए दुआ करें। लेकिन “अल्लाहुम्मा इन्नका अफ़ुव्वुन…” इस रात की सबसे अफ़ज़ल और मसनून दुआ है, इसलिए इसे सबसे ज़्यादा पढ़ें।
क्या ख्वातीन (Women) हैज़/माहवारी की हालत में यह दुआ पढ़ सकती हैं?
जी हाँ, बिल्कुल। इस हालत में नमाज़ और कुरआन को हाथ लगाना मना है, लेकिन ज़बानी दुआ पढ़ना, ज़िक्र करना और अस्तग़फ़ार करना जायज़ है। वो यह दुआ कसरत से पढ़ सकती हैं।
क्या इसे सिर्फ अरबी में ही पढ़ना ज़रूरी है?
अरबी में पढ़ना सुन्नत है और इसका सवाब ज़्यादा है। लेकिन अगर आपको अरबी याद नहीं हो रही, तो आप अपनी ज़बान (हिंदी/उर्दू) में भी अल्लाह से माफ़ी मांग सकते हैं। अल्लाह दिलों का हाल जानता है।
ख़ामोशी, उम्मीद और मग़फ़िरत
आखिर में, लैलतुल क़द्र दुआ सिर्फ अल्फ़ाज़ का दोहराना नहीं है। यह अपने रब से सुलय (समझौता) करने का मौका है। जब सारी दुनिया सो रही हो, तब आप अपने रब के सामने अपनी पेशानी रख दें। उम्मीद रखें कि वो ‘अफ़ुww’ है, वो आपको खाली हाथ नहीं लौटाएगा।
अल्लाह हम सबको लैलतुल क़द्र की बरकत नसीब फरमाए और हमारी टूटी-फूटी इबादतों को क़बूल करे। आमीन।


