ज़िंदगी में कई बार ऐसे मोड़ आते हैं जहाँ इंसान खुद को अकेला और बेबस महसूस करने लगता है। चाहे वह माली (आर्थिक) परेशानी हो, खानदानी उलझनें हों या किसी की ज़्यादती का सामना करना हो, इंसान का दिल अक्सर एक ऐसी पनाह तलाश करता है जहाँ उसे सच्ची तसल्ली मिल सके। इस्लाम हमें मायूसी के अंधेरों से निकालकर अल्लाह की ज़ात पर मुकम्मल भरोसे का रास्ता दिखाता है।
इन्हीं पाक रास्तों में से एक बेहतरीन ज़रिया ‘हसबुनल्लाहु व नि‘मल वकील’ का कलिमा है। यह महज़ चन्द अलफ़ाज़ नहीं हैं, बल्कि यह ईमान का वह सुतून (खंभा) है जो एक मोमिन को मुश्किलों के दरमियान भी डगमगाने नहीं देता।
Hasbunallahu Wa Ni‘mal Wakeel Ka Matlab
इस कलिमे की गहराई को समझने के लिए इसके लफ़्ज़ों के मायने को जानना बहुत ज़रूरी है। इसका अरबी तलफ़्फ़ुज़ और तर्जुमा इस तरह है:
حَسْبُنَا اللَّهُ وَنِعْمَ الْوَكِيلُ
तर्जुमा:“अल्लाह हमारे लिए काफ़ी है और वह बेहतरीन कारसाज़ (काम बनाने वाला) है।”
यहाँ दो अहम बातें समझने वाली हैं:
- हसबुनल्लाह: इसका मतलब है कि हमारे तमाम मामलात में, हमारी ज़रूरतों में और हमारी हिफ़ाज़त के लिए सिर्फ़ अल्लाह की ज़ात काफ़ी है। हमें किसी और के आगे हाथ फैलाने या किसी मखलूक से खौफ खाने की ज़रूरत नहीं।
- नि‘मल वकील: ‘वकील’ उस हस्ती को कहते हैं जिसे हम अपना ज़िम्मेदार बना लें और जिस पर हमें पूरा भरोसा हो कि वह हमारे हक़ में सबसे बेहतर फ़ैसला करेगा। जब हम अल्लाह को अपना ‘वकील’ मान लेते हैं, तो हम अपनी परेशानियों का बोझ अपने कमज़ोर कंधों से उतारकर उस हस्ती के सुपुर्द कर देते हैं जो तमाम जहानों का मालिक है।
यह कलिमा इंसान के अंदर एक अजीब तरह का सुकून पैदा करता है, क्योंकि उसे यह एहसास हो जाता है कि उसका मामला अब किसी कमज़ोर इंसान के हाथ में नहीं, बल्कि रब्बुल आलमीन के हाथ में है।
Yeh Kalima Qur’an Mein Kis Waqt Kaha Gaya
यह महज़ कोई वज़ीफ़ा नहीं है, बल्कि एक तारीख़ी हक़ीक़त है जिसका ज़िक्र अल्लाह तआला ने क़ुरआन करीम (सूरह आल-इमरान, आयत 173) में फ़रमाया है।
जब इस्लाम के शुरुआती दौर में सहाबा-ए-किराम (रज़ि.) को दुश्मनों की बड़ी ताक़त और उनके लश्कर से डराने की कोशिश की गई, तो उनका ईमान कमज़ोर होने के बजाय और ज़्यादा मज़बूत हो गया। जब उनसे कहा गया कि लोग तुम्हारे खिलाफ जमा हुए हैं, उनसे डरो, तो उन्होंने जवाब में यही कलिमा कहा— ‘हसबुनल्लाहु व नि‘मल वकील’।
यह उस वक़्त कहा गया जब हालात बहुत सख़्त थे और ज़ाहिरी तौर पर असबाब (resources) बहुत कम थे। इससे यह सबक मिलता है कि तवक्कुल (अल्लाह पर भरोसा) का असली इम्तिहान तब होता है जब चारों तरफ से मुश्किलें घेरे हुए हों। यह कलिमा मोमिन की उस हिम्मत को दिखाता है जहाँ वह दुनिया की ताक़त को नहीं, बल्कि अल्लाह की रहमत और कुदरत को देखता है।
Hasbunallahu Wa Ni‘mal Wakeel Ke Asar
इस कलिमे को अपनी ज़िंदगी और ज़बान का हिस्सा बनाने से इंसान की रूहानी और नफ़सियाती (Psychological) हालत पर कुछ गहरे असर पड़ते हैं:
- दिल को मिलने वाली तसल्ली: जब इंसान यह मानता है कि अल्लाह उसके लिए काफ़ी है, तो उसके दिल से ‘बेचैनी’ और ‘घबराहट’ कम होने लगती है। यह कलिमा इस बात का एहसास दिलाता है कि भले ही दुनिया के दरवाज़े बंद हो जाएं, अल्लाह का दरवाज़ा हमेशा खुला है। यह मानसिक तनाव के वक़्त एक ढाल की तरह काम करता है।
- अकेलेपन का खात्मा: कई बार इंसान को लगता है कि कोई उसे समझ नहीं रहा या कोई उसकी मदद के लिए मौजूद नहीं है। इस कलिमे के ज़रिए बंदा अपने आप को अल्लाह के करीब महसूस करता है। उसे यह यकीन हो जाता है कि उसका ‘वकील’ उसके साथ है, जो न कभी सोता है और न कभी उसे तन्हा छोड़ता है।
- ज़हनी मज़बूती और हौसला: यह कलिमा इंसान के अंदर से खौफ निकाल देता है। जब हम अल्लाह को बेहतरीन वकील मान लेते हैं, तो हमारे अंदर मुश्किल हालात का डटकर सामना करने की हिम्मत पैदा होती है। यह हमें मायूस होकर बैठने के बजाय, अल्लाह की रहमत पर भरोसा रखते हुए आगे बढ़ने की ताक़त देता है।
Is Kalime Ko Kab Aur Kaise Kehna Chahiye
इस्लाम में ज़िक्र और दुआ का मक़सद अल्लाह को याद करना और उससे जुड़ना है। इसके लिए किसी खास गिनती या रस्म की ज़रूरत नहीं है, बल्कि इसे इन हालात में पूरी तवज्जो के साथ कहना चाहिए:
- परेशानी और गम के वक़्त: जब आपको लगे कि मुश्किलें आपके काबू से बाहर हो रही हैं, तब इस कलिमे को दिल की गहराई से दोहराएं।
- ज़ुल्म या बे-इंसाफ़ी महसूस होने पर: अगर आपको लगे कि आपके साथ कोई नाइंसाफ़ी हुई है और आप अपना हक़ लेने में कमज़ोर हैं, तो अल्लाह को अपना वकील बनाएं।
- फ़ैसलों के लम्हे (Confusion): जब आप किसी उलझन में हों कि क्या रास्ता अख्तियार किया जाए, तो अल्लाह पर तवक्कुल करते हुए यह कलिमा पढ़ें कि वह आपके लिए बेहतरीन रास्ता खोल दे।
यह याद रहे कि इसे तोते की तरह रटना काफ़ी नहीं है। इसका असली असर तब होता है जब ज़बान के साथ-साथ दिल भी गवाही दे कि “हाँ, मेरा अल्लाह मेरे लिए काफ़ी है।”
Tawakkul Aur Amal Ka Taluq
एक बहुत बड़ी गलतफ़हमी यह है कि ‘तवक्कुल’ का मतलब हाथ पर हाथ रखकर बैठ जाना है। इस्लाम हमें यह नहीं सिखाता कि आप कोशिश छोड़ दें और सिर्फ़ दुआ पर इक्तिफ़ा (rely) करें।
दीन का मुतवाज़िन (balanced) रास्ता यह है:
- पहले अपनी पूरी कोशिश करें।
- तमाम मुमकिन ज़राय (sources) इस्तेमाल करें।
- उसके बाद नतीजा अल्लाह पर छोड़ दें और कहें कि हसबुनल्लाहु व नि‘मल वकील।
अगर कोई शख्स इम्तिहान की तैयारी न करे और कहे कि अल्लाह मेरा वकील है, तो यह तवक्कुल नहीं बल्कि लापरवाही है। असली भरोसा वह है जो पूरी मेहनत के बाद अल्लाह की रज़ा पर राजी रहने से पैदा होता है। अल्लाह उन लोगों को पसंद करता है जो कोशिश करते हैं और फिर उस पर भरोसा करते हैं।
मुख़्तसर सवाल-जवाब
1. क्या ‘हसबुनल्लाहु व नि‘मल वकील’ सिर्फ़ मुश्किल वक़्त के लिए है?
जी नहीं, हालाँकि यह तंगी और आज़माइश के वक़्त बहुत ढारस देता है, लेकिन एक मोमिन के लिए यह हर हाल में ज़बान पर रहने वाला कलिमा है। खुशी हो या गमी, यह याद रखना कि अल्लाह ही हमारे लिए काफ़ी है, हमें हर हाल में शुक्रगुज़ार बनाए रखता है।
2. क्या यह कहना दुआ है या क़ुरआनी कलिमा?
यह दोनों है। यह क़ुरआन की एक आयत का हिस्सा भी है और एक बेहतरीन दुआ भी। दुआ का मतलब सिर्फ़ मांगना नहीं होता, बल्कि अपनी आज़ज़ी (humility) का इज़हार करना और अल्लाह की बड़ाई बयान करना भी दुआ है।
आख़िरी बात
हसबुनल्लाहु व नि‘मल वकील वह रूहानी सहारा है जो हमें अंधेरों में रौशनी की किरण दिखाता है। यह हमें सिखाता है कि हम इस दुनिया में अकेले नहीं हैं। हमारी हार और जीत, हमारी राहत और मुसीबत, सब उस अल्लाह के इल्म में है जो हमसे सत्तर माओं से ज़्यादा मोहब्बत करता है।
सच्चा सुकून महज़ परेशानियों के खत्म हो जाने में नहीं है, बल्कि इस बात पर यकीन रखने में है कि अल्लाह हमारे साथ है और वह जो करेगा हमारे हक़ में बेहतर होगा। अपनी कोशिशें जारी रखें, सब्र का दामन थामे रहें और अपने हर मामले में अल्लाह को अपना वकील बनाएं। यक़ीन मानिए, जिसका वकील अल्लाह हो जाए, उसे फिर किसी और की फिक्र करने की ज़रूरत नहीं रहती।

