शाम का वक़्त दिन के ढलने और रात के साए गहराने का वक़्त होता है। जैसे-जैसे सूरज उफ़ुक़ (क्षितिज) के पीछे छिपता है, पूरी कायनात एक सुकून की चादर ओढ़ लेती है। यह वक़्त सिर्फ दिन के ख़त्म होने का नहीं, बल्कि अपने ज़ेहन और रूह को अल्लाह की याद में सुकून देने का मौका होता है। इस्लाम में शाम के इन लम्हात की बहुत अहमियत है, और इन्हें अल्लाह की याद से जोड़ना सुन्नत से साबित है।
जब हम शाम की दुआ (Sham ki dua) और मसनून अज़कार को अपनी रोज़ाना की आदत बनाते हैं, तो यह हमारे थके हुए दिल के लिए एक मरहम की तरह काम करते हैं। यह कोई ऐसा अमल नहीं है जो हम पर बोझ बने, बल्कि यह वह ज़िक्र है जो हमें दिन भर की भाग-दौड़ के बाद इत्मिनान और तवक्कुल की तरफ ले जाता है।
Shaam Ka Waqt Aur Insaan Ka Zehan
दिन भर इंसान दुनियावी कामों, ज़िम्मेदारियों और कई तरह की उलझनों में घिरा रहता है। जैसे ही शाम होती है, माहौल की खामोशी इंसान के अंदरूनी शोर को उजागर करने लगती है। कभी आने वाले कल की फिक्र, तो कभी गुज़रे हुए वक़्त का मलाल ज़ेहन पर हावी हो सकता है। परिंदे अपने घरों की तरफ लौटते हैं, और इंसान भी अपने घर के सुकून की तलाश करता है।
मनोवैज्ञानिक तौर पर भी शाम का वक़्त एक बदलाव (transition) का वक़्त है। इस वक़्त में जब हम ज़िक्र और दुआ का सहारा लेते हैं, तो हमारा ज़ेहन फालतू की सोचों से हटकर एक मरकज़ पर टिक जाता है। यह खामोशी हमें डराती नहीं, बल्कि अल्लाह की कुदरत पर गौर करने का मौका देती है। शाम के अज़कार असल में हमारे ज़ेहन को रात की नींद के लिए तैयार करते हैं, ताकि हम एक बे-फ़िक्र और पुर-सुकून नींद ले सकें।
Islam Shaam Ke Waqt Allah Ki Yaad Ka Kya Maqsad Batata Hai
इस्लाम हमें सिखाता है कि बंदा हर हाल में अपने खालिक़ का मोहताज है। शाम के वक़्त अल्लाह को याद करने का मक़सद यह है कि हम इस बात को तस्लीम करें कि आज का दिन जो हमें मिला, वह अल्लाह का इनाम था। अब जबकि रात शुरू हो रही है, हम अपनी हिफ़ाज़त और अपने ईमान की सलामती के लिए उसी की तरफ रुजू करते हैं।
इन दुआओं का एक बड़ा मक़सद ईमान की तसल्ली है। जब हम अल्लाह की पनाह मांगते हैं, तो हमारे अंदर का डर खत्म हो जाता है। यह तवक्कुल पैदा करता है कि जो ज़ात सूरज को डुबोकर चाँद निकालने पर क़ादिर है, वही हमारी मुश्किलों को हल करने और हमें हर तरह के शर (बुराई) से बचाने पर भी क़ादिर है। यह ज़िक्र हमारे और अल्लाह के दरमियान एक ऐसा राब्ता कायम करते हैं जो हमें दुनिया की भीड़ में भी अकेला महसूस नहीं होने देता।
Shaam Ke Waqt Padhe Jaane Wale Masnoon Adhkar Aur Duas
यहाँ दो निहायत जामे और मुस्तनद दुआएं दी जा रही हैं। इन्हें पढ़ने का तरीक़ा यह है कि आप इनके अलफ़ाज़ को ज़बान से अदा करें और इनके मायने को दिल में महसूस करें।
1. Din Aur Raat Ka Sufoord-e-Khuda Karna
यह दुआ हमारे वजूद और हमारे वक़्त को अल्लाह के हवाले करने का बेहतरीन ज़रिया है।
Arabic Zikr / Dua
اللَّهُمَّ بِكَ أَمْسَيْنَا، وَبِكَ أَصْبَحْنَا، وَبِكَ نَحْيَا، وَبِكَ نَمُوتُ، وَإِلَيْكَ الْمَصِيرُ
तलफ़्फ़ुज़
अल्लाहुम्मा बिका अमसैना, व बिका असबहना, व बिका नह्या, व बिका नमूतू, व इलै कल-मसीर।
Roman (Hinglish)
Allahumma bika amsayna, wa bika asbahna, wa bika nahya, wa bika namutu, wa ilaykal maseer.
तर्जुमा
ऐ अल्लाह! तेरी ही तौफ़ीक़ से हमने शाम की और तेरी ही तौफ़ीक़ से हमने सुबह की थी। तेरे ही हुक्म से हम जीते हैं और तेरे ही हुक्म से हम मरेंगे और तेरी ही तरफ सबको लौट कर जाना है।
Masdar
सुनन अबु दाऊद: 5068 (सहीह)
2. Allah Ki Badshahi Aur Qudrat Ka Iqrar
जब रात का अंधेरा छाने लगे, तो यह ज़िक्र हमें कायनात के असल मालिक की याद दिलाता है।
Arabic Zikr / Dua
أَمْسَيْنَا وَأَمْسَى الْمُلْكُ لِلَّهِ، وَالْحَمْدُ لِلَّهِ، لاَ إِلَهَ إِلاَّ اللَّهُ وَحْدَهُ لاَ شَرِيكَ لَهُ، لَهُ الْمُلْكُ وَلَهُ الْحَمْدُ وَهُوَ عَلَى كُلِّ شَيْءٍ قَدِيرٌ
तलफ़्फ़ुज़
अमसैना व अमसल-मुल्कु लिल्लाहि, वल-हम्दु लिल्लाहि, ला इला-ह इल्लल्लाहु वहदहु ला शरी-क लहू, लहुल-मुल्कु व लहुल-हम्दु व हु-व अला कुल्लि शैइन क़दीर।
Roman (Hinglish)
Amsayna wa amsal mulku lillahi, wal hamdu lillahi, la ilaha illallahu wahdahu la shareeka lahu, lahul mulku wa lahul hamdu wa huwa ala kulli shay’in qadeer.
तर्जुमा
हमने शाम की और अल्लाह की सारी सल्तनत ने भी शाम की। तमाम तारीफें अल्लाह ही के लिए हैं। अल्लाह के सिवा कोई इबादत के लायक नहीं, वह अकेला है, उसका कोई साझी नहीं। उसी की पूरी बादशाही है और वही तारीफ के लायक है, और वह हर चीज़ पर पूरी कुदरत रखता है।
Masdar
सहीह मुस्लिम: 2723
Zikr Ki Miqdaar Se Zyada Dil Ki Haalat
शाम की दुआ (Sham ki dua) का असर इस बात पर निर्भर नहीं करता कि आपने उसे कितनी बार दोहराया है, बल्कि इस बात पर निर्भर करता है कि आपने उसे किस दिल से पढ़ा है। सुन्नत का मिज़ाज सादगी और मुस्तकिल-मिज़ाजी है।
- अल्पता और पाबंदी: ज़्यादा लंबी लिस्ट बनाने से बेहतर है कि आप सिर्फ दो या तीन दुआएं चुनें और उन्हें रोज़ाना पढ़ें। छोटी मगर रोज़ाना की जाने वाली इबादत अल्लाह को बहुत पसंद है।
- हौले-हौले पढ़ना: ज़िक्र को जल्दी-जल्दी ख़त्म करने की कोशिश न करें। हर लफ़्ज़ को आराम से अदा करें ताकि आपके दिल को उसका अहसास हो सके।
- बिना किसी दबाव के: इन अज़कार को हिफ़ाज़त की गारंटी या किसी जादुई असर के तौर पर न देखें। यह अल्लाह की याद का एक प्यारा तरीक़ा है। जब आप बे-ग़रज़ होकर अल्लाह को याद करते हैं, तो सुकून अपने आप आपके दिल में उतर आता है।
मुख़्तसर सवाल-जवाब
क्या शाम के अज़कार मग़रिब के बाद ही पढ़े जाते हैं?
शाम के अज़कार का बेहतरीन वक़्त असर की नमाज़ के बाद से शुरू हो जाता है और मग़रिब के वक़्त तक रहता है। अगर किसी वजह से देर हो जाए, तो इसे रात होने तक कभी भी पढ़ा जा सकता है।
क्या अगर कभी शाम के अज़कार छूट जाए तो गुनाह होता है?
जी नहीं, यह अज़कार सुन्नत और मुस्तहब (पसंदीदा) हैं, फ़र्ज़ नहीं हैं। इन्हें न पढ़ने पर कोई गुनाह नहीं होता। लेकिन इन्हें पढ़ने से जो रूहानी इत्मिनान मिलता है, वह इंसान के लिए एक बहुत बड़ी नेमत है।
आख़िरी बात
शाम की दुआएं और अज़कार हमारे दिन को एक खूबसूरत मोड़ पर लाकर छोड़ते हैं। यह हमें यह एहसास दिलाते हैं कि हम चाहे कितने ही मसरूफ क्यों न हों, हमारा असल सुकून अल्लाह की याद में ही छिपा है। जब हम आज की रात की शुरुआत अल्लाह के नाम से करते हैं, तो हम आने वाले कल के लिए भी उम्मीद से भर जाते हैं।
शाम का यह वक़्त आपके लिए इत्मिनान का ज़रिया बने और अल्लाह आपकी इन छोटी सी कोशिशों को अपनी बारगाह में क़बूल फरमाए।


