Safar Se Wapas Aane Ki Dua | सफ़र के बाद अल्लाह का शुक्र अदा करने की दुआ

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मुख़्तसर रहनुमाई

सफर से वापस आने की दुआ

آيِبُونَ تَائِبُونَ عَابِدُونَ لِرَبِّنَا حَامِدُونَ
तलफ़्फ़ुज़:
आईबू-न, ता'इबू-न, 'आबिदू-न, लि-रब्बिना हामिदू-न।
तर्जुमा:
हम (अपने घर) लौटने वाले हैं, तौबा करने वाले हैं, (अल्लाह की) इबादत करने वाले हैं और अपने रब की तारीफ करने वाले हैं।
मसदर: 
सहीह मुस्लिम (1345), सहीह बुखारी (6385)
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सफ़र चाहे छोटा हो या बड़ा, जब इंसान अपने घर की दहलीज़ पर कदम रखता है, तो एक अलग ही सुकून महसूस होता है। दुनिया भर की रौनक़ें एक तरफ और अपने घर का इत्मीनान एक तरफ। यह वह लम्हा होता है जब मुसाफ़िर अपनी तमाम थकान भूलकर अपने अपनों के बीच वापस लौटता है। इस्लाम में हर जायज़ काम की शुरुआत और उसके खत्म होने पर अल्लाह का ज़िक्र करने की तालीम दी गई है। सफ़र से वापसी का यह वक्त भी अल्लाह की रहमत और उसके शुक्र का बेहतरीन मौका है।


Safar Ke Baad Dil Ka Ehsaas

जब हम एक लंबे सफ़र के बाद वापस लौटते हैं, तो दिल में कई तरह के जज्बात होते हैं। रास्ते की धूल, मुसाफ़िरी की थकान और अजनबी रास्तों का सफ़र तय करने के बाद अपने शहर और अपने मोहल्ले की गलियां एक अजीब सा सुकून देती हैं। मुसाफ़िरी के दौरान इंसान कई तरह के तजुर्बों से गुज़रता है, लेकिन घर की वापसी उसे अपनी असलियत और अपनी जड़ों से दोबारा जोड़ती है।

यह वह वक्त होता है जब इंसान को शिद्दत से यह महसूस होता है कि उसकी सलामती और वापसी सिर्फ अल्लाह के करम से मुमकिन हुई है। घर के दरवाज़े पर दस्तक देते हुए जो राहत एक मुसाफ़िर को मिलती है, वह अल्लाह की एक बहुत बड़ी नेमत है। इस लम्हे में सिर्फ़ जुबान से ही नहीं, बल्कि दिल की गहराइयों से अल्लाह का शुक्र अदा करना इंसान को रूहानी सुकून देता है। यह अहसास कि अल्लाह ने हमें हिफ़ाज़त के साथ अपनों से मिलाया, हमारे ईमान को और भी ताज़ा कर देता है।

Islam Safar Aur Wapsi Ko Kaise Dekhta Hai

इस्लाम में सफ़र को सिर्फ एक जगह से दूसरी जगह जाना नहीं माना गया, बल्कि इसे एक तजुर्बा और इब्रत का ज़रिया समझा गया है। सफ़र के दौरान इंसान को अल्लाह की कुदरत और उसकी बनाई हुई कायनात को करीब से देखने का मौका मिलता है। वहीं सफ़र से वापसी को अल्लाह की खास रहमत के तौर पर देखा जाता है।

अल्लाह के रसूल ﷺ जब भी किसी सफ़र से वापस लौटते, तो उनके दिल में शुक्रगुज़ारी का एक गहरा जज्बा होता था। वापसी के वक्त दुआ पढ़ना इस बात की निशानी है कि एक मोमिन हर हाल में अपने रब को याद रखता है। चाहे वह सफ़र की मुश्किलात हों या वापसी की खुशी, वह जानता है कि हर चीज़ का मालिक अल्लाह ही है। वापसी के वक्त पढ़ी जाने वाली दुआएं हमें यह याद दिलाती हैं कि हम इस दुनिया के सफ़र में भी मुसाफ़िर हैं और आखिरकार हमें अपने रब की तरफ ही लौटकर जाना है। यह सादगी और तवाज़ु (humility) का वह रास्ता है जो एक मुसलमान को अपने रब के करीब लाता है।

Safar Se Wapas Aane Par Padhi Jane Wali Masnoon Dua

सफ़र से लौटते वक्त अल्लाह का शुक्र अदा करने के लिए यह सबसे बेहतरीन और मुस्तनद (authentic) दुआ है। यह दुआ हमें सिखाती है कि हम अल्लाह की तरफ लौटने वाले और उसकी इबादत करने वाले हैं।

Arabic Dua

آيِبُونَ تَائِبُونَ عَابِدُونَ لِرَبِّنَا حَامِدُونَ

तलफ़्फ़ुज़

आईबू-न, ता’इबू-न, ‘आबिदू-न, लि-रब्बिना हामिदू-न।

Roman (Hinglish)

Aa-iboona, taa-iboona, ‘aa-bidoona, li-Rabbinaa haamidoon.

तर्जुमा

“हम (अपने घर) लौटने वाले हैं, तौबा करने वाले हैं, (अल्लाह की) इबादत करने वाले हैं और अपने रब की तारीफ करने वाले हैं।”

हवाला (Masdar)

सहीह मुस्लिम (1345), सहीह बुखारी (6385)

यह छोटी सी दुआ अपने अंदर शुक्र और आज़िज़ी का समंदर समेटे हुए है। इसमें इस बात का इक़रार है कि हमारी वापसी सिर्फ़ एक मकान तक नहीं है, बल्कि रूहानी तौर पर भी हम अल्लाह की तरफ रुजू कर रहे हैं।


Dua Ke Saath Shukr Aur Sukoon

दुआ पढ़ना सिर्फ़ अल्फ़ाज़ को दोहराना नहीं है, बल्कि यह अपने दिल को अल्लाह के हवाले कर देने का नाम है। जब आप सफ़र से लौटते हुए इन कलमात को दोहराते हैं, तो आपके ज़हन में यह बात साफ़ हो जाती है कि पूरी राह में आपकी हिफ़ाज़त करने वाली ज़ात सिर्फ अल्लाह की थी। इससे मुसाफ़िर के दिल का बोझ हल्का हो जाता है और सफ़र की तमाम थकन एक रूहानी ताज़गी में बदल जाती है।

घर पहुँचकर सुकून महसूस करना और अल्लाह की रहमतों का ज़िक्र करना एक मोमिन की पहचान है। यह दुआ हमें याद दिलाती है कि हम अपनी रोज़ाना की भागदौड़ में चाहे जहाँ भी चले जाएँ, असल सुकून अल्लाह के ज़िक्र और उसकी फ़रमाबरदारी में ही है। जब इंसान शुक्र के साथ घर में कदम रखता है, तो उस घर में बरकत और रहमत का नुज़ूल होता है। यह एक ऐसा अहसास है जो इंसान को अंदरूनी तौर पर मज़बूत बनाता है और उसे आने वाले कल के लिए तैयार करता है।


Short Q&A

क्या सफ़र से वापस आने पर दुआ पढ़ना ज़रूरी होता है?
सफ़र से वापसी पर दुआ पढ़ना सुन्नत है। यह फर्ज़ या वाजिब नहीं है, लेकिन इसे पढ़ने से अल्लाह का शुक्र अदा होता है और दिल को सुकून मिलता है। सुन्नत पर अमल करना हमेशा बरकत का ज़रिया बनता है।

अगर किसी को अरबी दुआ याद ना हो, तो क्या अल्लाह शुक्र क़ुबूल करता है?
अल्लाह दिलों के हाल जानता है। अगर आपको अरबी दुआ याद नहीं है, तो आप अपनी ज़ुबान में भी अल्लाह का शुक्र अदा कर सकते हैं। असल चीज़ दिल की नीयत और शुक्र का जज्बा है, जिसे अल्लाह ज़रूर क़ुबूल फ़रमाता है।


आख़िरी बात

सफ़र की वापसी महज़ एक मंज़िल का खत्म होना नहीं है, बल्कि यह अल्लाह की रहमतों के एक नए सिलसिले का आगाज़ है। जब मुसाफ़िर अपने घर की चौखट पर खड़ा होता है और अल्लाह का नाम लेता है, तो वह अपनी सलामती और वापसी के लिए अपने रब का शुक्रगुज़ार होता है। यह सादा सा अमल हमारे अंदर आज़िज़ी पैदा करता है और हमें याद दिलाता है कि हमारी ज़िंदगी का हर कदम अल्लाह के हुक्म और उसकी हिफ़ाज़त के साये में है। अल्लाह हम सबकी वापसी को सुकून भरा और मुबारक बनाए।