ज़िंदगी में उतार-चढ़ाव आना एक कुदरती बात है। कभी वक़्त बहुत अच्छा गुज़रता है, तो कभी रिज़्क़ की तंगी इंसान को परेशान कर देती है। जब घर के खर्चों की फिक्र, बच्चों की ज़रूरतें और आने वाले कल का डर दिल पर बोझ बनने लगे, तो एक मोमिन का सबसे बड़ा सहारा उसका अल्लाह होता है।
रिज़्क़ की तंगी की दुआ सिर्फ चंद अल्फाज़ नहीं हैं, बल्कि यह अल्लाह के सामने अपनी आज़ज़ी (humility) और भरोसे का इज़हार है। यह वह रास्ता है जो हमें मायूसी के अंधेरों से निकालकर उम्मीद की रोशनी की तरफ ले जाता है।
Rizq Ki Tangi Aur Dil Ka Bojh
जब जेब में पैसे कम हों और ज़रूरतें ज़्यादा, तो उसका असर सिर्फ हमारे रहन-सहन पर नहीं, बल्कि हमारी ज़ेहनी सेहत (mental health) पर भी पड़ता है। रात की नींद उड़ जाना और हर वक़्त एक बेचैनी महसूस होना, रिज़्क़ की कमी का एक बड़ा बोझ होता है।
हमें यह समझना चाहिए कि इस तरह की परेशानी में महसूस होने वाला तनाव (stress) कोई गुनाह नहीं है, बल्कि यह इंसानी फितरत है। लेकिन इस तनाव को खुद पर हावी होने देने के बजाय, हमें अपनी इन तकलीफों को अल्लाह के सुपुर्द करना सीखना चाहिए। दुआ वह ज़रिया है जो हमें यह एहसास दिलाता है कि हम इस मुश्किल सफ़र में अकेले नहीं हैं।
Islam Rizq Aur Imtihan Ko Kaise Samajhta Hai
इस्लाम हमें सिखाता है कि रिज़्क़ देने वाली ज़ात सिर्फ और सिर्फ अल्लाह की है। कभी रिज़्क़ की ज़्यादती हमें आज़माने के लिए होती है, तो कभी रिज़्क़ की कमी हमारे सब्र का इम्तिहान होती है।
क़ुरआन और हदीस की रोशनी में हमें यह पैग़ाम मिलता है कि:
- रिज़्क़ का ताल्लुक सिर्फ हमारी मेहनत से नहीं, बल्कि अल्लाह की तक़दीर और उसकी हिकमत (wisdom) से है।
- तंगी के वक़्त घबराना नहीं चाहिए, क्योंकि अल्लाह किसी पर उसकी बर्दाश्त से ज़्यादा बोझ नहीं डालता।
- सब्र और दुआ ऐसे दो हथियार हैं जो मुश्किल से मुश्किल हालात में भी दिल को इत्मिनान देते हैं।
Rizq Ki Tangi Mein Padhi Jane Wali Masnoon Duas
यहाँ हम ऐसी दो मसनून दुआएं ज़िक्र कर रहे हैं जो अल्लाह के रसूल ﷺ ने हमें सिखाई हैं। इन दुआओं को पूरे यकीन और दिल की गहराइयों के साथ पढ़ना चाहिए।
पहली दुआ (पाकीज़ा रिज़्क़ के लिए)
यह दुआ सुबह की नमाज़ के बाद पढ़ना बहुत अफ़ज़ल है। इसमें अल्लाह से नफ़ा (फायदा) देने वाले इल्म और पाकीज़ा रिज़्क़ की दरख्वास्त की गई है।
Arabic Dua:
اللَّهُمَّ إِنِّي أَسْأَلُكَ عِلْمًا نَافِعًا، وَرِزْقًا طَيِّبًا، وَعَمَلًا مُتَقَبَّلًا
तलफ़्फ़ुज़ (Hindi):
अल्लाहुम्मा इन्नी अस-अलुका ‘इल्मन नाफ़ि-‘अन, व रिज़क़न तय्यिबन, व ‘अमलम मुतक़ब्बलन।
Roman (Hinglish):
Allahumma inni as-aluka ‘ilman nafi’an, wa rizqan tayyiban, wa ‘amalan mutaqabbalan.
तर्जुमा:
“ऐ अल्लाह! मैं तुझसे नफ़ा देने वाले इल्म, पाकीज़ा रिज़्क़ और क़बूल होने वाले अमल का सवाल करता हूँ।”
मस्दर (Source):
सुनन इब्ने माजाह: 762
दूसरी दुआ (तंगदस्ती और क़र्ज़ से हिफ़ाज़त के लिए)
अगर हालात ज़्यादा सख्त हों और इंसान दूसरों का मोहताज होने से बचना चाहे, तो यह दुआ बहुत असरदार है।
Arabic Dua:
اللَّهُمَّ اكْفِنِي بِحَلَالِكَ عَنْ حَرَامِكَ وَأَغْنِنِي بِفَضْلِكَ عَمَّنْ سِوَاكَ
तलफ़्फ़ुज़ (Hindi):
अल्लाहुम्मक-फ़िनी बि-हलालिका ‘अन हरामिका, व अग़्निनी बि-फ़द़लिका ‘अम्मन सिवाका।
Roman (Hinglish):
Allahummak-fini bi-halalika ‘an haramika, wa aghnini bi-fadlika ‘amman siwaka.
तर्जुमा:
“ऐ अल्लाह! मुझे अपने हलाल के साथ अपने हराम से बचा ले (यानी हलाल रिज़्क़ को मेरे लिए काफ़ी कर दे) और अपने फ़ज़्ल से मुझे अपने सिवा हर किसी से बे-नियाज़ (आज़ाद) कर दे।”
मस्दर (Source):
जामी अत-तिर्मिज़ी: 3563
Dua Ke Saath Sabr Aur Bharosa
अल्लाह से दुआ करने का मतलब यह हरगिज़ नहीं है कि हम कोशिश करना छोड़ दें। दुआ और कोशिश (effort) एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। इस्लाम हमें सिखाता है कि ऊँट को बांधकर अल्लाह पर भरोसा (तवक्कुल) करो।
- जायज़ कोशिश: अपनी सलाहियत (skills) के मुताबिक काम की तलाश करें और ईमानदारी से मेहनत करें।
- गुनाहों से तौबा: कभी-कभी हमारी अपनी छोटी-बड़ी गलतियाँ भी बरकत में रुकावट बनती हैं, इसलिए कसरत से इस्तिग़फ़ार (माफ़ी) माँगते रहें।
- दिल का इत्मिनान: यह याद रखें कि अल्लाह हमारी पुकार सुन रहा है। अगर फ़ौरन हालात नहीं बदल रहे, तो यकीन रखें कि वह आपके लिए बेहतर रास्ता तैयार कर रहा है।
दुआ हमारे अंदर वह हिम्मत पैदा करती है जिससे हम मुश्किल वक़्त को मुस्कुराकर पार कर लेते हैं।
मुख़्तसर सवाल जवाब
सवाल: क्या रिज़्क़ की तंगी में सिर्फ दुआ काफी होती है?
जवाब: दुआ के साथ-साथ अपनी तरफ से पूरी कोशिश और हलाल ज़रिया-ए-माश (earning) तलाश करना ज़रूरी है। अल्लाह तआला मेहनत करने वालों को पसंद करता है। दुआ हमारी मेहनत में बरकत पैदा करती है।
सवाल: अगर दुआ के बावजूद परेशानी लंबी हो जाए, तो क्या दुआ बे-असर होती है?
जवाब: बिल्कुल नहीं। अल्लाह कभी-कभी हमारे सब्र को आज़माता है या उस दुआ के बदले हमें किसी ऐसी बड़ी मुसीबत से बचा लेता है जिसका हमें इल्म नहीं होता। कोई भी नेक दुआ बेकार नहीं जाती।
आख़िरी बात
रिज़्क़ की कमी या ज़्यादती, दोनों ही अल्लाह की तरफ से हैं। तंगी के दिनों में अपना हौसला टूटने न दें। याद रखें कि अल्लाह की रहमत बहुत वसी (बड़ी) है और हर तंगी के बाद आसानी है। अपनी दुआओं में पाबंदी रखें, नेक नीयती से काम करें और अल्लाह पर अपना भरोसा अटूट रखें। वह बेहतरीन रिज़्क़ देने वाला है।


