Bazaar Mein Dakhil Hone Ki Dua | बाज़ार में दाख़िल होते वक़्त पढ़ी जाने वाली दुआ

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मुख़्तसर रहनुमाई

बाज़ार में दाख़िल होते वक़्त पढ़ी जाने वाली दुआ

لَا إِلَهَ إِلَّا اللهُ وَحْدَهُ لَا شَرِيكَ لَهُ، لَهُ الْمُلْكُ وَلَهُ الْحَمْدُ، يُحْيِي وَيُمِيتُ، وَهُوَ حَيٌّ لَا يَمُوتُ، بِيَدِهِ الْخَيْرُ، وَهُوَ عَلَى كُلِّ شَيْءٍ قَدِيرٌ
तलफ़्फ़ुज़:
ला इला-ह इल्लल्लाहु वहदहु ला शरी-क लहु, लहुल मुल्कु व लहुल हम्दु, युह्यी व युमीतु, वहु-व हय्युन ला यमूतु, बियदिहिल खैर, वहु-व अला कुल्लि शैइन क़दीर।
तर्जुमा:
अल्लाह के सिवा कोई माबूद नहीं, वह अकेला है, उसका कोई शरीक नहीं। उसी की बादशाही है और उसी के लिए तमाम तारीफ़ें हैं। वही ज़िन्दगी देता है और वही मौत देता है। वह हमेशा ज़िन्दा है, उसे कभी मौत नहीं आएगी। तमाम भलाई उसके हाथ में है और वह हर चीज़ पर पूरी क़ुदरत रखने वाला है।
मसदर: 
सुनन अत-तिर्मिज़ी
bazaar mein dakhil hone ki dua main

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बाज़ार हमारी ज़िंदगी का एक अहम हिस्सा हैं। ज़रूरत का सामान खरीदना हो या रोज़गार के सिलसिले में जाना हो, बाज़ार में हमारा आना-जाना लगा रहता है। अक्सर देखा गया है कि बाज़ार की भीड़-भाड़ और शोर-शराबे में इंसान दुनिया की चीज़ों में इतना खो जाता है कि उसे अपने रब की याद नहीं रहती। इस्लाम हमें सिखाता है कि हम अपनी रोज़ाना की मसरूफ़ियत में भी अल्लाह से जुड़े रहें। Bazaar mein dakhil hone ki dua पढ़ना इसी ताल्लुक को मज़बूत करने का एक बेहतरीन ज़रिया है।


Bazaar Aur Insaan Ki Mashgooliyat

बाज़ार एक ऐसी जगह है जहाँ दुनिया की चमक-धमक अपनी पूरी रौनक़ पर होती है। यहाँ हर कोई अपनी ज़रूरतें पूरी करने या कारोबार करने के इरादे से आता है। इस गहमागहमी में अक्सर इंसान का ध्यान भटक जाता है। शोर, भीड़ और चीज़ों को खरीदने की फ़िक्र दिल में एक तरह की बेचैनी पैदा कर सकती है।

जब हम बाज़ार में होते हैं, तो हमारा ज़हन पैसों के हिसाब और चीज़ों की तलाश में मश्गूल हो जाता है। ऐसे में ‘ग़फ़लत’ (यानी अल्लाह को भूल जाना) का इमकान बढ़ जाता है। दीन-ए-इस्लाम ने हमें इस ग़फ़लत से बचने का एक बेहद सादा और रूहानी रास्ता दिखाया है। वह रास्ता है—ज़िक्रे-इलाही। बाज़ार की भीड़ में भी अगर ज़बान पर अल्लाह का नाम हो, तो दिल को एक अजीब सा सुकून और हिफ़ाज़त का एहसास रहता है।


Islam Roz-Marrah Ke Aadaab Kya Sikhata Hai

इस्लाम सिर्फ इबादतगाहों तक महदूद नहीं है, बल्कि यह एक मुकम्मल ज़ब्त-ए-हयात (Code of Life) है। यह हमें हर क़दम पर आदाब सिखाता है—चाहे वह घर में दाख़िल होना हो या बाज़ार जाना। सुन्नत का तरीक़ा यह है कि इंसान अपनी हर छोटी-बड़ी ज़रूरत के लिए अल्लाह की तरफ रुजू करे।

बाज़ार जाने का मक़सद अपनी ज़रूरतें पूरी करना है, लेकिन एक मोमिन की शान यह है कि वह बाज़ार में भी अपनी नीयत को साफ़ रखे। Bazaar mein dakhil hone ki dua पढ़ना हमें याद दिलाता है कि तमाम चीज़ों का मालिक अल्लाह है और वही हमें हर हाल में हिफ़ाज़त और भलाई अता करने वाला है। यह छोटी सी सुन्नत हमारे ईमान को ताज़ा रखती है और बाज़ार के शोर में भी दिल को भटकाव से बचाती है।


Bazaar Mein Dakhil Hone Ki Masnoon Dua

अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने बाज़ार में दाख़िल होते वक़्त एक बहुत ही जामिया (comprehensive) दुआ सिखाई है। यह दुआ अल्लाह की तौहीद और उसकी बड़ाई का इज़हार है।

Arabic Dua:

لَا إِلَهَ إِلَّا اللهُ وَحْدَهُ لَا شَرِيكَ لَهُ، لَهُ الْمُلْكُ وَلَهُ الْحَمْدُ، يُحْيِي وَيُمِيتُ، وَهُوَ حَيٌّ لَا يَمُوتُ، بِيَدِهِ الْخَيْرُ، وَهُوَ عَلَى كُلِّ شَيْءٍ قَدِيرٌ

तलफ़्फ़ुज़ (Hindi):

ला इला-ह इल्लल्लाहु वहदहु ला शरी-क लहु, लहुल मुल्कु व लहुल हम्दु, युह्यी व युमीतु, वहु-व हय्युन ला यमूतु, बियदिहिल खैर, वहु-व अला कुल्लि शैइन क़दीर।

Roman (Hinglish):

La ilaha illallahu wahdahu la sharika lahu, lahul-mulku wa lahul-hamdu, yuhyi wa yumitu, wa Huwa hayyun la yamutu, bi-yadihil-khair, wa Huwa ‘ala kulli shay’in Qadir.

तर्जुमा:

अल्लाह के सिवा कोई माबूद नहीं, वह अकेला है, उसका कोई शरीक नहीं। उसी की बादशाही है और उसी के लिए तमाम तारीफ़ें हैं। वही ज़िन्दगी देता है और वही मौत देता है। वह हमेशा ज़िन्दा है, उसे कभी मौत नहीं आएगी। तमाम भलाई उसके हाथ में है और वह हर चीज़ पर पूरी क़ुदरत रखने वाला है।

मस्दर (Source):

यह दुआ सुनन अत-तिर्मिज़ी (Sunan at-Tirmidhi: 3428) में नक़ल की गई है।


Dua Ke Saath Dil Ka Itminan

इस दुआ को पढ़ने का असल मक़सद बाज़ार के फ़ितनों से बचना और अल्लाह की रहमत के साये में रहना है। जब हम यह इक़रार करते हैं कि “तमाम भलाई अल्लाह के हाथ में है”, तो हमारे दिल से दुनियावी चीज़ों का बेजा डर या लालच निकल जाता है।

बाज़ार में कभी मिलावट, कभी धोखा या कभी बे-जा बहस का सामना करना पड़ सकता है। जब एक इंसान अल्लाह को याद करके बाज़ार में क़दम रखता है, तो उसकी नीयत में सच्चाई और अख़लाक़ में नरमी रहती है। उसे यह एहसास रहता है कि कोई और देखे न देखे, उसका रब उसे देख रहा है। यही वह सुकून है जो बाज़ार की आपा-धापी में भी एक इंसान को पुर-सुकून रखता है। यह दुआ महज़ अलफ़ाज़ नहीं, बल्कि अल्लाह की किब्रियाई का एतराफ़ है।


मुख़्तसर सवाल-जवाब

सवाल 1: क्या बाज़ार में हर दफ़ा दुआ पढ़ना ज़रूरी है?
जवाब: यह दुआ एक मसनून अमल (सुन्नत) है। जब भी आप बाज़ार जाएँ, इसे पढ़ना अफ़ज़ल है ताकि आप अल्लाह की याद में रहें और बाज़ार की ग़फ़लत से बचे रहें। यह पाबंदी नहीं बल्कि एक रूहानी तोहफ़ा है।

सवाल 2: अगर दुआ पूरी याद न हो, तो क्या दिल में अल्लाह को याद करना काफ़ी है?
जवाब: जी हाँ, असल मक़सद अल्लाह का ज़िक्र है। अगर आपको पूरी दुआ याद नहीं है, तो आप अपनी ज़बान में अल्लाह से हिफ़ाज़त और भलाई की दुआ माँग सकते हैं या “सुब्हानअल्लाह” और “अल्लाहु अकबर” जैसा ज़िक्र भी कर सकते हैं।


आख़िरी बात

बाज़ार जाना हमारी मजबूरी हो सकती है, लेकिन वहाँ अल्लाह को याद रखना हमारी मर्ज़ी और मुहब्बत है। Bazaar mein dakhil hone ki dua हमें यह पैग़ाम देती है कि एक मोमिन का दिल हर जगह अपने ख़ालिक़ से जुड़ा रहना चाहिए। चाहे बाज़ार की भीड़ हो या घर की तन्हाई, अल्लाह की याद ही दिल को सुकून और हिफ़ाज़त अता करती है। कोशिश करें कि जब भी बाज़ार की तरफ क़दम बढ़ाएँ, इन मुबारक अलफ़ाज़ को अपनी ज़बान पर सजा लें ताकि आपकी दुनियावी ज़रूरतें भी रूहानी बरकत के साथ पूरी हों।