ज़िंदगी के सफ़र में कभी-कभी ऐसा वक़्त आता है जब इंसान खुद को बहुत थका हुआ और कमज़ोर महसूस करता है। ऐसा लगता है जैसे जिस्म और ज़हन दोनों बोझिल हो गए हैं। किसी काम में दिल नहीं लगता, ज़रा सा काम पहाड़ जैसा महसूस होता है, और इंसान चाहकर भी वैसी फुर्ती नहीं दिखा पाता जैसी वह दिखाना चाहता है। इस हालत को अक्सर लोग ‘सुस्ती’ या ‘काहिली’ कह देते हैं, लेकिन गहराई में देखा जाए तो यह सिर्फ़ काम न करने की इच्छा नहीं, बल्कि एक ज़ेहनी और रूहानी कैफियत (हालत) है।
जब हम ऐसी कैफियत से गुज़रते हैं, तो दिल में एक अजीब सी बेचैनी रहती है। हम खुद को बुरा भला कहने लगते हैं, लेकिन इससे हिम्मत बढ़ने के बजाय और कम हो जाती है। ऐसे वक़्त में इस्लाम हमें बहुत ही खूबसूरत और नर्म रास्ता दिखाता है। वह रास्ता है अल्लाह ताला से मदद मांगने का और अपनी कमज़ोरी को उसके सामने रख देने का।
Susti Aur Insaani Haalat
सुस्ती या काहिली का मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि आप मेहनत नहीं करना चाहते। कई बार यह जिस्मानी थकावट, ज़ेहनी तनाव, या किसी पुरानी परेशानी की वजह से होती है। कभी-कभी दिल पर एक तरह का बोझ महसूस होता है जिसे ‘भारीपन’ कहा जा सकता है। ऐसे में इंसान का दिल करता है कि वह सब कुछ छोड़ दे।
यह समझना बहुत ज़रूरी है कि इंसान होने के नाते हम हमेशा एक जैसी ताक़त या जोश में नहीं रह सकते। उतार-चढ़ाव इंसान की फ़ितरत का हिस्सा हैं। अगर आप आज सुस्ती महसूस कर रहे हैं, तो खुद पर सख़्ती न करें और न ही इसे अपनी नीयत की खराबी समझें। बस इस बात को तस्लीम (accept) करें कि इस वक़्त आपको अल्लाह की रहमत और सुकून की ज़रूरत है। अल्लाह हर उस इंसान को जानता है जो अपने हाल पर बेचैन है और बेहतर बनने की कोशिश करना चाहता है।
Islam Susti Aur Koshish Ko Kaise Samajhta Hai
इस्लाम एक ऐसा दीन है जो इंसान की कमज़ोरियों को समझता है। कुरआन और हदीस में हमें यह सिखाया गया है कि अल्लाह ताला से हर चीज़ के लिए रुजू करना चाहिए, यहाँ तक कि अपनी हिम्मत और ताक़त के लिए भी। अल्लाह को वह बंदा बहुत पसंद है जो अपनी कमज़ोरी का इक़रार करके उससे कुव्वत (ताक़त) मांगता है।
दीन में ‘हिम्मत’ और ‘कोशिश’ को बहुत अहमियत दी गई है, लेकिन इसके साथ ही यह भी बताया गया है कि असली ताक़त सिर्फ़ अल्लाह की ज़ात से मिलती है। दुआ मांगना खुद में एक बहुत बड़ी इबादत है क्योंकि जब हम ‘सुस्ती और काहिली दूर करने की दुआ’ मांगते हैं, तो हम दरअसल यह मान रहे होते हैं कि ऐ अल्लाह, मैं अपनी हिम्मत से कुछ नहीं कर सकता, मुझे तेरी मदद चाहिए। यह आज़िज़ी (humility) अल्लाह की रहमत को खींचती है और दिल का बोझ हल्का करती है।
Susti Aur Kahili Se Panah Maangne Ki Masnoon Duas
प्यारे नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम अक्सर सुस्ती और बेबसी से अल्लाह की पनाह मांगा करते थे। यह इस बात का सबूत है कि सुस्ती एक ऐसी चीज़ है जिससे कोई भी मुतास्सिर (affected) हो सकता है, और इसके लिए दुआ मांगना नबियों का तरीका है।
यहाँ हम दो ऐसी दुआएं ज़िक्र कर रहे हैं जो सहीह अहादीस से साबित हैं और सुस्ती व काहिली से बचने के लिए सबसे ज़बरदस्त ज़रिया हैं।
पहली दुआ
यह दुआ फ़िक्र, ग़म और सुस्ती से पनाह मांगने के लिए बहुत मशहूर और जामे (comprehensive) दुआ है।
Arabic Dua:
اللَّهُمَّ إِنِّي أَعُوذُ بِكَ مِنَ الْهَمِّ وَالْحَزَنِ، وَالْعَجْزِ وَالْكَسَلِ، وَالْجُبْنِ وَالْبُخْلِ، وَضَلَعِ الدَّيْنِ، وَغَلَبَةِ الرِّجَالِ
तलफ़्फ़ुज़ (Hindi):
अल्लाहुम्मा इन्नी अऊज़ु बिका मिनल-हम्मी वल-हज़नी, वल-अज्ज़ी वल-कसली, वल-जुब्नी वल-बुख़ली, व-ज़लइद्-दैनी, व-ग़लबतिर-रिजाली।
Roman (Hinglish):
Allahumma inni a’udhu bika minal-hammi wal-hazan, wal-‘ajzi wal-kasal, wal-jubni wal-bukhl, wa-dala’id-dain, wa-ghalabatir-rijal.
तर्जुमा:
“ऐ अल्लाह! मैं तेरी पनाह मांगता हूँ फ़िक्र और ग़म से, बेबसी और सुस्ती से, बुज़दिली और कंजूसी से, क़र्ज़ के बोझ और लोगों के ग़लवे (दबाव) से।”
हवाला (Masdar):
(सहीह बुख़ारी: 6369)
दूसरी दुआ
इस दुआ में खास तौर पर उन चीज़ों से पनाह मांगी गई है जो इंसान को अपनी ज़िम्मेदारियों से पीछे हटा देती हैं।
Arabic Dua:
اللَّهُمَّ إِنِّي أَعُوذُ بِكَ مِنَ الْعَجْزِ وَالْكَسَلِ، وَالْجُبْنِ وَالْهَرَمِ، وَالْبُخْلِ
तलफ़्फ़ुज़ (Hindi):
अल्लाहुम्मा इन्नी अऊज़ु बिका मिनल-अज्ज़ी वल-कसली, वल-जुब्नी वल-हरमी वल-बुख़ली।
Roman (Hinglish):
Allahumma inni a’udhu bika minal-‘ajzi wal-kasali, wal-jubni wal-harami wal-bukhl.
तर्जुमा:
“ऐ अल्लाह! मैं तेरी पनाह मांगता हूँ बेबसी से, सुस्ती से, बुज़दिली से, बुढ़ापे की लाचारी से और कंजूसी से।”
हवाला (Masdar):
(सहीह मुस्लिम: 2706)
Dua Ke Saath Himmat Aur Tawazun
दुआ और कोशिश का रिश्ता बहुत गहरा है। जब हम अल्लाह से दुआ मांगते हैं, तो हमारा ज़हन एक सुकून महसूस करता है। दुआ दरअसल हमारे अंदर की हिम्मत को दोबारा ज़िंदा करने की एक चाबी है। लेकिन इसके साथ-साथ हमें अपनी हदों (limits) को भी समझना चाहिए।
अल्लाह ताला किसी भी जान पर उसकी ताक़त से ज़्यादा बोझ नहीं डालता। अगर आप बहुत ज़्यादा सुस्ती महसूस कर रहे हैं, तो शायद आपके जिस्म को आराम की ज़रूरत हो। दुआ मांगते हुए यह नीयत रखें कि अल्लाह आपको वह ताक़त अता करे जिससे आप अपने ज़रूरी काम सुकून से कर सकें। खुद को दूसरों से कम्पेयर (compare) न करें। हर इंसान की ताक़त अलग होती है। अल्लाह पर भरोसा रखें कि वह आपकी छोटी सी कोशिश को भी क़बूल फ़रमाएगा। जब हम अल्लाह पर भरोसा करते हैं, तो धीरे-धीरे दिल का भारीपन कम होने लगता है और काम करने की रफ़्तार खुद-ब-खुद संभल जाती है।
Short Q&A
क्या सुस्ती के लिए दुआ रोज़ पढ़ी जा सकती है?
जी हाँ, सुस्ती और काहिली से पनाह मांगने की दुआ रोज़ाना सुबह और शाम के ज़िक्र में शामिल की जा सकती है। प्यारे नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम अक्सर इन अल्फाज़ के ज़रिए अल्लाह की पनाह मांगा करते थे, इसलिए इसे अपनी रोज़ की आदत बनाना बहुत मुबारक़ है।
अगर सुस्ती बहुत ज़्यादा हो, तो क्या मदद लेना ग़लत है?
बिल्कुल नहीं। इस्लाम में अपनी सेहत का ख्याल रखना सुन्नत है। अगर दुआ और ज़िक्र के साथ-साथ आपको लगता है कि सुस्ती किसी बीमारी या जिस्मानी कमी की वजह से है, तो डॉक्टर या किसी माहिर (expert) से सलाह लेना बहुत ज़रूरी है। यह भी एक तरह की कोशिश है जिसे अल्लाह पसंद फ़रमाता है।
आख़िरी बात
ज़िंदगी में सुस्ती या काहिली का आना कोई गुनाह नहीं है, बल्कि यह एक इंसानी हालत है। अपनी इस हालत पर शर्मिंदा होने के बजाय अल्लाह की रहमत की तरफ़ कदम बढ़ाएं। जब आप दुआ के लिए हाथ उठाते हैं, तो उसी लम्हे से आपकी बेहतरी का सफ़र शुरू हो जाता है।
अल्लाह से अपनी हिम्मत, ताक़त और फुर्ती की दरख्वास्त करें। वह बहुत मेहरबान है और अपने बंदों की पुकार को कभी खाली नहीं जाने देता। छोटी-छोटी कोशिशें करें और अल्लाह पर कामिल भरोसा रखें। इंशाअल्लाह, वह आपके दिल को भी सुकून देगा और आपके कामों में बरकत और फुर्ती भी अता फ़रमाएगा।

