इंसानी ज़िंदगी में सेहत एक बहुत बड़ी नेमत है। लेकिन कभी-कभी इंसान की तबीयत नासाज़ हो जाती है, जिस्म में कमज़ोरी महसूस होती है या कोई पुरानी बिमारी घेर लेती है। ऐसे वक़्त में इंसान खुद को बेबस और अकेला महसूस करने लगता है। इस्लाम हमें सिखाता है कि जहाँ हम बिमारी का सही इलाज कराएं, वहीं अपने रब के सामने हाथ फैलाकर sehat yabi ki dua भी करें।
यह लेख उन तमाम भाई-बहनों और बुजुर्गों के लिए है जो अपनी या अपने अपनों की सेहत को लेकर फ़िक्रमंद हैं। यहाँ हम दीन की रोशनी में सेहत और शिफ़ा के ताल्लुक से कुछ बातें और मसनून दुआएं साझा करेंगे, जो दिल को सुकून और उम्मीद देती हैं।
सेहत और इंसानी कमज़ोरी
बिमारी और कमज़ोरी इंसान को उसकी हक़ीक़त याद दिलाती है। जब बदन साथ नहीं देता, तो इंसान को अहसास होता है कि वह कितना महदूद (limited) है और वह हर हाल में अल्लाह की रहमत का मोहताज है। बिमारी सिर्फ़ जिस्म को नहीं थकाती, बल्कि यह ज़हन और रूह पर भी असर डालती है। ऐसे में घबराहट होना या उदास महसूस करना एक फ़ितरी बात है।
लेकिन मोमिन के लिए यह वक़्त अल्लाह से क़रीब होने का ज़रिया बन सकता है। जब हम अपनी कमज़ोरी को मान लेते हैं और पूरी आज़ज़ी के साथ अल्लाह की तरफ़ रुजू करते हैं, तो दिल को एक अनजाना सा सहारा मिल जाता है। दुआ का मक़सद सिर्फ़ शिफ़ा मांगना ही नहीं, बल्कि उस ज़ात पर अपना भरोसा मज़बूत करना है जो हर मुश्किल में हमारे साथ है।
इस्लाम में बिमारी और सबर
इस्लाम की तालीमात के मुताबिक़, बिमारी ज़िंदगी की एक हक़ीक़त है। यह न तो किसी की ज़िल्लत की निशानी है और न ही हमेशा के लिए मायूसी का सबब। हमारे नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने सिखाया है कि मुश्किल वक़्त में सबर और दुआ का दामन थामे रखना चाहिए।
सबर का मतलब हाथ पर हाथ रखकर बैठना नहीं है, बल्कि अपनी तकलीफ़ को अल्लाह की रज़ा समझकर बर्दाश्त करना और उससे बेहतरी की उम्मीद रखना है। जब इंसान सबर करता है और अल्लाह से sehat yabi ki dua करता है, तो उसे रूहानी ताक़त मिलती है। यह उम्मीद कि “अल्लाह मेरी पुकार सुन रहा है,” इंसान के अंदर की बेचैनी को कम कर देती है। याद रखें, अल्लाह की रहमत बहुत वसी (बड़ी) है और वह अपने बंदों को कभी तनहा नहीं छोड़ता।
सेहत और शिफ़ा के लिए मसनून दुआएं
यहाँ हम दो ऐसी दुआएं पेश कर रहे हैं जो सहीह अहादीस से साबित हैं। ये दुआएं हमें अल्लाह पर तवक्कुल करना सिखाती हैं।
पहली दुआ (बिमारी और शिफ़ा के लिए)
यह दुआ हुज़ूर (सल्लल्लाहु अलैहि अलैहि वसल्लम) अक्सर बीमारों की इयादत (visit) करते वक़्त पढ़ा करते थे।
Arabic Dua:
اللَّهُمَّ رَبَّ النَّاسِ أَذْهِبِ الْبَاسَ اشْفِهِ وَأَنْتَ الشَّافِي لاَ شِفَاءَ إِلاَّ شِفاؤُكَ شِفَاءً لاَ يُغَادِرُ سَقَمًا
तलफ़्फ़ुज़ (Devanagari Hindi):
अल्लाहुम्मा रब्बन-नासि अज़हिबिल-बा-स इशफ़िहि व अन्तश-शाफ़ी ला शिफ़ा-अ इल्ला शिफ़ा-उ-क शिफ़ा-अन ला युगादिरु सक़मा।
Roman (Hinglish):
Allahumma Rabban-nas Azhibil-ba’sa ishfihi wa Antash-Shafi la shifa’a illa shifa’uka shifa’an la yugadiru saqama.
तर्जुमा:
ऐ अल्लाह! लोगों के रब, तू इस तकलीफ़ को दूर कर दे। तू शिफ़ा अता फ़रमा, तू ही शिफ़ा देने वाला है। तेरी शिफ़ा के सिवा कोई शिफ़ा नहीं, ऐसी शिफ़ा अता कर जो किसी बिमारी को न छोड़े।
मास्दर (Source):
सहीह बुख़ारी (5675), सहीह मुस्लिम (2191)
दूसरी दुआ (तबीयत खराब होने पर उम्मीद के लिए)
जब कोई इंसान बीमार हो, तो उसके पास बैठकर या खुद अपने लिए यह दुआ की जा सकती है।
Arabic Dua:
أَسْأَلُ اللَّهَ الْعَظِيمَ رَبَّ الْعَرْشِ الْعَظِيمِ أَنْ يَشْفِيَكَ
तलफ़्फ़ुज़ (Devanagari Hindi):
अस-अलुल्लाहल-अज़ीम रब्बल-अर्शिल-अज़ीम अंय-यशफ़ि-य-क।
Roman (Hinglish):
As’alullahal-Azima Rabbal-Arshil-Azimi ay-yashfiyaka.
तर्जुमा:
मैं अज़मत वाले अल्लाह से, जो अज़ीम अर्श का मालिक है, दुआ करता हूँ कि वह तुझे शिफ़ा अता फ़रमाए।
मास्दर (Source):
सुनन अबू दाऊद (3106), जामी तिर्मिज़ी (2083)
दुआ और इलाज का तवाज़ुन
इस्लाम में दुआ और इलाज के बीच एक खूबसूरत तवाज़ुन (balance) है। नबी-ए-करीम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने खुद इलाज करवाने का हुक्म दिया है और फरमाया है कि अल्लाह ने हर बिमारी की दवा उतारी है। इसलिए, डॉक्टरों से मशविरा करना, दवाएं वक़्त पर लेना और अपनी सेहत का ख्याल रखना सुन्नत के ऐन मुताबिक़ है।
दुआ इलाज का मुबादिल (substitute) नहीं है, बल्कि इलाज के साथ अल्लाह की मदद चाहने का नाम है। दवा अपना काम करती है, लेकिन शिफ़ा देने वाली ज़ात सिर्फ़ अल्लाह की है। जब हम दवा लेते वक़्त यह यकीन रखते हैं कि इसका असर अल्लाह के हुक्म से होगा, तो हमारा तवक्कुल मज़बूत होता है। यह यकीन हमारे दिल को इत्मिनान बख्शता है और बीमारी के दौरान होने वाले ज़हनी तनाव (stress) को कम करता है।
दो मुख़्तसर सवाल
क्या सेहत के लिए दुआ रोज़ की जा सकती है?
जी हाँ, बिल्कुल। अल्लाह से अपनी सेहत और खैरियत की दुआ रोज़ाना करना बहुत अच्छी बात है। हम अपनी नमाज़ों में और चलते-फिरते अल्लाह से आफियत मांग सकते हैं। यह ज़िक्र हमारे दिल को अल्लाह की याद से जोड़े रखता है।
अगर बिमारी लंबी हो, तो क्या दुआ बेकार होती है?
नहीं, दुआ कभी बेकार नहीं जाती। कभी अल्लाह हमें फौरन आराम दे देता है, तो कभी दुआ के ज़रिए हमारी मुश्किलें आसान कर देता है या हमें सब्र की ताक़त देता है। लंबी बिमारी के दौरान दुआ करना हमारे अज्र (reward) को बढ़ाता है और अल्लाह पर हमारे यकीन को और पुख्ता करता है।
आख़िरी बात
बिमारी का वक़्त आज़माइश का तो होता है, लेकिन यह अल्लाह की रहमत से मायूस होने का वक़्त नहीं है। sehat yabi ki dua हमें यह याद दिलाती है कि अंधेरे के बाद उजाला ज़रूर आता है। आप अपनी कोशिश जारी रखें, सही इलाज कराएं और अपने रब से अपनी सेहत के लिए गिड़गिड़ाकर दुआ करते रहें। वह बहुत रहीम और करीम है, वह अपने बंदे की पुकार को ज़रूर सुनता है और उसे अपनी रहमत के साये में रखता है। सबर और उम्मीद ही वह रास्ते हैं जो हमें सुकून की तरफ़ ले जाते हैं।


