Taqreer Shuru Karne Se Pehle Ki Dua | बोलने से पहले अल्लाह से मदद की दुआ

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मुख़्तसर रहनुमाई

तक़रीर शुरू करने से पहले की दुआ

رَبِّ اشْرَحْ لِي صَدْرِي وَيَسِّرْ لِي أَمْرِي وَاحْلُلْ عُقْدَةً مِنْ لِسَانِي يَفْقَهُوا قَوْلِي
तलफ़्फ़ुज़:
रब्बि-शरह ली सदरी, व यस्सिर ली अमरी, वह-लुल उ़क़दतम्-मिल-लिसानी, यफ़क़हू क़ौली।
तर्जुमा:
ए मेरे रब! मेरे लिए मेरा सीना खोल दे, और मेरे लिए मेरा काम आसान कर दे, और मेरी ज़बान की गिरह खोल दे, ताकि लोग मेरी बात समझ सकें।
मसदर: 
कुरआन करीम, सूरह ता-हा (Surah Ta-Ha), आयत 25 से 28
taqreer shuru karne se pehle ki dua

Table of Content

किसी भी महफ़िल या मजमे में अपनी बात रखना सिर्फ़ हुनर का काम नहीं है, बल्कि यह एक बड़ी ज़िम्मेदारी है। जब कोई शख़्स बोलने के लिए खड़ा होता है, तो उसके दिल पर एक तरह का बोझ होता है—यह एहसास कि उसके अल्फ़ाज़ किसी की सोच बदल सकते हैं या किसी के दिल पर असर कर सकते हैं। इस्लाम में बोलना सिर्फ़ आवाज़ का खेल नहीं, बल्कि रूह और नीयत का मामला है।


बोलने से पहले दिल की हाालत

अक्सर देखा गया है कि जब इंसान को कोई बात कहनी होती है, तो उसका ज़हन उसकी तैयारी में लग जाता है। लेकिन एक मोमिन के लिए तैयारी से पहले अपने दिल को अल्लाह की तरफ़ मोड़ना ज़रूरी है। तक़रीर शुरू करने से पहले की दुआ का असली मक़सद यह है कि हम अपनी कमज़ोरी को मान लें और अल्लाह की किब्रियाई को ज़ाहिर करें।

जब हम लोगों के सामने खड़े होते हैं, तो दिल में शोहरत या वाह-वाही की चाहत आ सकती है। यहीं से दुआ का काम शुरू होता है। दुआ हमारे दिल को इस गुमान से साफ़ करती है कि “मैं अच्छा बोलूँगा” और उसे इस यकीन पर लाती है कि “वही बुलवाएगा जो बेहतर है।” दिल की यह आज़िज़ी और अल्लाह से मदद की तलब ही इंसान की बात में वज़न पैदा करती है।


इस्लाम में ज़बान और ज़िम्मेदारी

हमारी ज़बान एक अमानत है। हम जो कुछ भी कहते हैं, उसका हिसाब है। इस्लाम हमें सिखाता है कि जब भी बोलो, तो उसमें नर्मी, सच्चाई और वज़ाहत हो। तक़रीर का मतलब सिर्फ़ लच्छेदार बातें करना नहीं, बल्कि हक़ बात को सही तरीक़े से पहुँचाना है।

अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने हमेशा साफ़ और ऐसी बात करने को पसंद फ़रमाया जो लोगों की समझ में आए। तक़रीर करने वाले के लिए यह ज़रूरी है कि वह अपनी ज़बान पर काबू रखे और सिर्फ़ वही कहे जो सही हो। ज़बान की नर्मी और लहजे का अदब दुआ के ज़रिए ही हासिल होता है, क्योंकि जब अल्लाह की मदद शामिल होती है, तो अल्फ़ाज़ में ज़हरीलापन नहीं बल्कि सुकून होता है।


तक़रीर शुरू करने से पहले पढ़ी जाने वाली मसनून दुआ

हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम को जब एक बहुत बड़ी और सख़्त जगह अपनी बात कहनी थी, तो उन्होंने अल्लाह से यही दुआ मांगी थी। यह दुआ कुरआन करीम की सबसे बेहतरीन दुआओं में से एक है जो बोलने की रुकावटों को दूर करने और दिल को खोलने के लिए पढ़ी जाती है।

Arabic Dua

رَبِّ اشْرَحْ لِي صَدْرِي وَيَسِّرْ لِي أَمْرِي وَاحْلُلْ عُقْدَةً مِنْ لِسَانِي يَفْقَهُوا قَوْلِي

तलफ़्फ़ुज़ (Hindi)

रब्बि-शरह ली सदरी, व यस्सिर ली अमरी, वह-लुल उ़क़दतम्-मिल-लिसानी, यफ़क़हू क़ौली।

Roman (Hinglish)

Rabbi-shrah lee sadree, wa yassir lee amree, wah-lul ‘uqdatam-mil-lisaanee, yafqahoo qaulee.

तर्जुमा

“ए मेरे रब! मेरे लिए मेरा सीना खोल दे, और मेरे लिए मेरा काम आसान कर दे, और मेरी ज़बान की गिरह खोल दे, ताकि लोग मेरी बात समझ सकें।”

म़स्दर (Source)

कुरआन करीम, सूरह ता-हा (Surah Ta-Ha), आयत 25 से 28


दुआ और नीयत का ताल्लुक़

इस दुआ में सिर्फ़ बोलने की आसानी नहीं मांगी गई, बल्कि ‘सीना खोलने’ की बात की गई है। इसका मतलब यह है कि बोलने वाले का दिल इत्मीनान में हो, घबराहट न हो और वह जो कहे, वह इख़्लास के साथ कहे।

  • अल्लाह पर भरोसा: जब आप यह दुआ पढ़ते हैं, तो आप अपना सारा मामला अल्लाह के सुपुर्द कर देते हैं। अब यह आपकी अपनी सलाहियत का सवाल नहीं रहता, बल्कि अल्लाह की रहमत का मामला बन जाता है।
  • इख़्लास: अपनी बात में असर पैदा करने के लिए ज़रूरी है कि मक़सद सिर्फ़ अल्लाह की रज़ा हो। अगर नीयत में लोगों को मुतासिर करना या अपनी काबिलियत दिखाना होगा, तो दुआ का वह रूहानी असर कम हो सकता है।
  • तवाज़ु (Humility): एक अच्छा मुक़र्रिर (वक्ता) वह है जो बोलने से पहले भी और बोलने के बाद भी अल्लाह के सामने झुका रहे। यह दुआ हमें याद दिलाती है कि हमारी ज़बान की गिरह खोलने वाला सिर्फ़ वही है।

दो मुख़्तसर सवाल

क्या हर तक़रीर से पहले दुआ की जा सकती है?

जी हाँ, चाहे आप किसी दीनी महफ़िल में बोल रहे हों या किसी आम जगह पर अपनी बात रख रहे हों, अल्लाह से मदद माँगना हमेशा फ़ायदेमंद है। यह ज़हन को सुकून देता है और बात को सही रुख़ पर रखता है।

अगर बोलते वक़्त घबराहट हो, तो क्या अल्लाह मदद करता है?

बिल्कुल। घबराहट एक इंसानी फ़ितरत है। जब कोई बंदा आज़िज़ी के साथ ‘रब्बि-शरह ली सदरी’ पढ़ता है, तो अल्लाह उसके दिल को मज़बूती देता है। घबराहट का इलाज तैयारी के साथ-साथ अल्लाह पर कामिल यकीन रखना है।


आख़िरी बात

तक़रीर शुरू करने से पहले की दुआ महज़ कुछ अल्फ़ाज़ नहीं हैं, बल्कि यह एक मोमिन का अपने रब से राब्ता है। जब हम अदब और इख़्लास के साथ अल्लाह को पुकारते हैं, तो वह हमारी ज़बान में वह तासीर पैदा कर देता है जो न सादा लफ़्ज़ों से मुमकिन है और न ही बनावटी अंदाज़ से। कोशिश करें कि जब भी बोलने का मौक़ा मिले, दिल अल्लाह की तरफ़ मुतवज्जेह हो और मक़सद सिर्फ़ और सिर्फ़ ख़ैर की बात फैलाना हो।