बारिश अल्लाह सुब्हानहु व तआला की एक अज़ीम नेमत और रहमत है। ज़मीन की हरियाली, इंसानों की ज़रूरत और जानवरों की प्यास इसी पानी से जुड़ी है। लेकिन कभी-कभी इंसान की कमज़ोरी और हालात ऐसे होते हैं कि लगातार होने वाली बारिश से रोज़मर्रा के कामों में दुश्वारी आने लगती है। ऐसे में एक मोमिन का तरीका यह है कि वह घबराने या परेशान होने के बजाय अपने रब की तरफ़ रुजू करे।
इस लेख में हम सुन्नत के मुताबिक़ वह दुआ और अदब जानेंगे जो बारिश के ज़रूरत से ज़्यादा होने या नुक़सान के अंदेशे के वक़्त पढ़ी जाती है।
Barish Aur Insaan Ki Bechaini
इंसानी ज़िंदगी कुदरत के निज़ाम से गहराई से जुड़ी हुई है। बारिश जहाँ ख़ुशहाली लाती है, वहीं इसकी ज़्यादती कभी-कभी इंसान की बेचैनी का सबब बन जाती है।
- सफ़र: मुसाफ़िरों के लिए रास्ते मुश्किल हो जाते हैं।
- काम-काज: रोज़ाना की मज़दूरी और कारोबार पर असर पड़ता है।
- खेती-बाड़ी: किसानों के लिए फ़सल की हिफ़ाज़त की चिंता बढ़ जाती है।
- मजबूरी: इंसान अपनी तमाम तरक्की के बावजूद कुदरत के सामने बेबस है।
यह बेचैनी हमें इस बात की तरफ़ ले जाती है कि हम उस ज़ात से मदद माँगें जिसके हाथ में तमाम निज़ाम है।
Islam Barish Ko Kaise Dekhta Hai
इस्लाम में बारिश को अल्लाह की रहमत कहा गया है। क़ुरआन और हदीस में बारिश के बरसने को ज़िक्र-ए-इलाही और शुक्र का मक़ाम बताया गया है। लेकिन दीन-ए-इस्लाम एक मुकम्मल ज़ब्ता-ए-हयात (Code of Life) है, जो हमें तवाज़ुन (Balance) सिखाता है।
अल्लाह की हिकमत कभी बारिश की ज़्यादती में होती है तो कभी उसके रुकने में। जब बारिश ज़रूरत से ज़्यादा हो जाए और उससे इंसान को नुक़सान पहुँचने का डर हो, तो अल्लाह से आसानी की दुआ करना सुन्नत से साबित है। यह दुआ बारिश को बुरा कहने के लिए नहीं, बल्कि उसकी सिम्त (Direction) और मिक़दार (Quantity) में बेहतरी और सलामती माँगने के लिए होती है।
Barish Kam Ya Rukne Ke Liye Padhi Jane Wali Masnoon Dua
जब बारिश हद से ज़्यादा हो जाए और आप यह महसूस करें कि अब इससे आसानी के बजाय दुश्वारी हो रही है, तो आप barish rukne ki dua के तौर पर यह मसनून दुआ पढ़ सकते हैं। यह दुआ सहीह बुख़ारी की रिवायत से साबित है, जिसे नबी करीम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने उस वक़्त पढ़ा था जब ज़्यादती-ए-बारिश से लोगों को परेशानी होने लगी थी।
Arabic Dua
اللَّهُمَّ حَوَالَيْنَا وَلاَ عَلَيْنَا، اللَّهُمَّ عَلَى الآكَامِ وَالظِّرَابِ، وَبُطُونِ الأَوْدِيَةِ، وَمَنَابِتِ الشَّجَرِ
तलफ़्फ़ुज़ (Hindi)
अल्लाहुम्मा हवालैना वला अलैना, अल्लाहुम्मा अलल-आकामि वज़-ज़िराबी, व बुतूनील-अौदियती, व मनाबितिश-शजर।
Roman (Hinglish)
Allahumma hawalayna wala ‘alayna, Allahumma ‘alal-akami waz-zirabi, wa butunil-awdiyati, wa manabitish-shajar.
तर्जुमा
“ऐ अल्लाह! हमारे आस-पास बारिश बरसा, हम पर (नुक़सानदेह तौर पर) न बरसा। ऐ अल्लाह! टीलों, पहाड़ों, वादियों और दरख़्तों के उगने की जगहों पर (बारिश बरसा)।”
Masdar (Reference)
Sahih Bukhari: 1013, 1014
Dua Padhte Waqt Dil Ka Rawaiya
दुआ सिर्फ़ अल्फ़ाज़ का नाम नहीं है, बल्कि यह दिल की कैफियत है। जब आप बारिश की ज़्यादती के वक़्त दुआ करें, तो इन बातों का ख़्याल रखें:
- अदब और आज़ज़ी: अल्लाह के सामने अपनी बेबसी का इक़रार करें। यह दुआ अल्लाह की रहमत को ठुकराने के लिए नहीं, बल्कि हिफ़ाज़त के लिए है।
- शुक्र और सब्र: बारिश चाहे कम हो या ज़्यादा, अल्लाह का शुक्र अदा करते रहें। दिल में यह यकीन रखें कि हर हाल में अल्लाह की कोई न कोई हिकमत पोशीदा है।
- तवाक्कुल (अल्लाह पर भरोसा): दुआ करने के बाद नतीजे को अल्लाह पर छोड़ दें। वह अपने बंदों के लिए वही करता है जो उनके हक में बेहतर हो।
मुख़्तसर सवाल-जवाब
सवाल 1: क्या बारिश रुकने की दुआ पढ़ना बे-अदबी है?
जवाब: जी नहीं, यह बे-अदबी नहीं है। नबी करीम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने ख़ुद सहाबा की दरख़्वास्त पर बारिश के रुख़ को मोड़ने की दुआ फ़रमाई थी। यह अल्लाह से सलामती और रहमत माँगने का एक ज़रिया है।
सवाल 2: क्या बारिश रहमत होने के बावजूद दुआ की जा सकती है?
जवाब: हाँ, बारिश बेशक रहमत है, लेकिन अगर वही रहमत इंसानी जान-माल के लिए परेशानी का सबब बनने लगे, तो सुन्नत तरीका यही है कि अल्लाह से उसकी सिम्त बदलने और उसे नफ़ा देने वाली बनाने की दुआ की जाए।
आख़िरी बात
बारिश का बरसना अल्लाह की क़ुदरत की एक निशानी है। एक मुसलमान का काम हर हाल में अपने रब को याद रखना है। चाहे धूप हो या बारिश, हमें हमेशा अल्लाह की रज़ा में राज़ी रहना चाहिए। जब हम मसनून दुआओं के ज़रिए अल्लाह से जुड़ते हैं, तो हमारे दिल को सुकून मिलता है और अल्लाह की तरफ़ से हिफ़ाज़त और ख़ैर की उम्मीद बनी रहती है।
अल्लाह तआला हमें हर हाल में दीन की सही समझ और सुन्नत पर अमल करने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए। आमीन।


