इस्लाम में ईमान की हिफ़ाज़त सबसे बड़ी चीज़ है। जब भी दज्जाल का ज़िक्र आता है, तो अक्सर लोग डर और घबराहट महसूस करने लगते हैं। एक मुसलमान होने के नाते हमारा यह यकीन होना चाहिए कि दुनिया की कोई भी आज़माइश अल्लाह की मर्जी और उसकी पनाह से बड़ी नहीं है। दज्जाल के फ़ित्ने से बचने के लिए हमारे प्यारे नबी मुहम्मद ﷺ ने हमें न सिर्फ आगाह किया, बल्कि उससे बचने का सबसे मज़बूत रास्ता भी दिखाया—और वह रास्ता है ‘दुआ’।
यह आर्टिकल आपको उस सही मसनून दुआ और सुन्नत के तरीके से रूबरू कराएगा, जो अल्लाह के रसूल ﷺ ने अपनी उम्मत को सिखाई है, ताकि हम बिना किसी डर के अपने ईमान को मज़बूत रख सकें।
Dajjal Ka Zikr Aur Dil Ki Ghabrahat
अक्सर दज्जाल का नाम सुनते ही ज़हन में डरावनी तस्वीरें और तरह-तरह के खौफ पैदा होने लगते हैं। लेकिन इस्लाम हमें डरने के लिए नहीं, बल्कि तैयार रहने और अल्लाह पर भरोसा करने की तालीम देता है। दिल की इस घबराहट का असल इलाज ‘इल्म’ और ‘यक़ीन’ है।
जब हम यह जान लेते हैं कि अल्लाह तआला ने हर फ़ित्ने से बचने का रास्ता पहले ही बता दिया है, तो दिल को सुकून मिलता है। ईमान और घबराहट का रिश्ता बहुत गहरा है; जितना ज़्यादा हमारा अल्लाह पर तवक्कुल (भरोसा) बढ़ेगा, उतना ही दुनिया का डर कम होगा। हमें अपनी सोच को खौफ से हटाकर अल्लाह की पनाह और उसकी इबादत पर मरकूज़ (focus) करना चाहिए।
Islam Ne Dajjal Ke Fitne Ko Kaise Samjhaya
इस्लाम में ‘फ़ित्ना’ का मतलब आज़माइश या इम्तिहान होता है। दज्जाल का फ़ित्ना तारीख़ का सबसे बड़ा फ़ित्ना इसलिए बताया गया है क्योंकि यह इंसान के ईमान पर हमला होगा। यह महज़ कोई जिस्मानी जंग नहीं, बल्कि हक़ और बातिल की पहचान का एक इम्तिहान होगा।
अल्लाह के रसूल ﷺ ने हमें सिखाया कि दज्जाल के फ़ित्ने का असल मकसद लोगों को गुमराह करना होगा। इसलिए, इससे बचने का सबसे बड़ा ज़रिया वह रूहानी कुव्वत है जो हमें दुआओं और अल्लाह के ज़िक्र से मिलती है। हमें किसी भी तरह की अटकलों या बेबुनियाद कहानियों में पड़ने के बजाए सिर्फ उन बातों पर ध्यान देना चाहिए जो अल्लाह और उसके रसूल ﷺ ने हमें सिखाई हैं।
Dajjal Ke Fitne Se Bachne Ke Liye Masnoon Dua
नबी-ए-करीम ﷺ अपनी नमाज़ में तशह्हुद (अत्तहिय्यात) के बाद और सलाम फेरने से पहले अल्लाह से चार चीज़ों से पनाह मांगा करते थे। इनमें से एक दज्जाल का फ़ित्ना भी है। यह दुआ बेहद जामे (comprehensive) है और हर मुसलमान को इसे याद करना चाहिए।
Arabic Dua
اللَّهُمَّ إِنِّي أَعُوذُ بِكَ مِنْ عَذَابِ جَهَنَّمَ، وَمِنْ عَذَابِ الْقَبْرِ، وَمِنْ فِتْنَةِ الْمَحْيَا وَالْمَمَاتِ، وَمِنْ شَرِّ فِتْنَةِ الْمَسِيحِ الدَّجَّالِ
Devanagari Talaffuz (Pronunciation)
अल्लाहुम्मा इन्नी अऊज़ु बिका मिन अज़ाबि जहन्नम, व मिन अज़ाबिल क़ब्र, व मिन फ़ितनतिल महया वल ममात, व मिन शर्रि फ़ितनतिल मसीहिद दज्जाल।
Roman Talaffuz
Allahumma inni a’udhu bika min ‘adhabi jahannam, wa min ‘adhabil-qabr, wa min fitnatil-mahya wal-mamat, wa min sharri fitnatil-masihid-dajjal.
तर्जुमा (Hindi Translation)
“ए अल्लाह! मैं जहन्नम के अज़ाब से तेरी पनाह चाहता हूँ, और क़ब्र के अज़ाब से तेरी पनाह चाहता हूँ, और ज़िंदगी और मौत के फ़ित्नों से तेरी पनाह चाहता हूँ, और मसीह दज्जाल के फ़ित्ने की बुराई से तेरी पनाह चाहता हूँ।”
Masdar (Hadith Reference)
यह दुआ सहीह मुस्लिम (हदीस नंबर: 588) और सहीह बुखारी (हदीस नंबर: 1377) में मौजूद है। नबी ﷺ ने इसे हर नमाज़ के आखिर में पढ़ने की ताकीद फ़रमाई है।
Dua Ke Saath Imaan Ko Kaise Mazboot Rakhein
सिर्फ दुआ पढ़ लेना काफी नहीं है, बल्कि उस पर कामिल यकीन होना और अपनी ज़िंदगी को सुन्नत के मुताबिक ढालना भी ज़रूरी है। दज्जाल के फ़ित्ने से हिफ़ाज़त के लिए ये बातें आपके ईमान को मज़बूत करेंगी:
- इल्म हासिल करना: सही इस्लामी तालीम और अक़ीदे का इल्म हासिल करें ताकि आप सही और गलत के बीच फ़र्क समझ सकें।
- पाबंदी से नमाज़: नमाज़ हमें अल्लाह के करीब रखती है और हर बुराई से बचाती है। ऊपर बताई गई दुआ को अपनी हर फर्ज़ और नफ़्ल नमाज़ का हिस्सा बनाएं।
- सूरह कहफ़ की तिलावत: हदीस के मुताबिक, जो शख्स सूरह कहफ़ की शुरुआती दस आयतें याद कर ले, वह दज्जाल के फ़ित्ने से महफूज़ रहेगा।
- अल्लाह पर कामिल भरोसा: इस बात को दिल में बिठा लें कि कोई भी ताकत अल्लाह के हुक्म के बिना आपको नुकसान नहीं पहुँचा सकती।
मुख़्तसर सवाल-जवाब
क्या दज्जाल के फ़ित्ने से डरना गलत है?
इंसानी तौर पर किसी बड़ी आज़माइश से थोड़ा खौफ महसूस होना फितरती है, लेकिन यह डर इतना नहीं होना चाहिए कि आप मायूस हो जाएं या घबराकर अपना यकीन कम कर लें। इस डर को अल्लाह की तरफ मुड़ने का ज़रिया बनाएं और दुआओं का सहारा लें।
क्या यह दुआ रोज़ाना पढ़ना सुन्नत है?
जी हाँ, नबी ﷺ इस दुआ को हर नमाज़ में सलाम फेरने से पहले पढ़ा करते थे। इसलिए इसे रोज़ाना अपनी पांचों वक्त की नमाज़ों में शामिल करना सुन्नत है और हिफ़ाज़त का बेहतरीन ज़रिया है।
आख़िरी बात
दज्जाल का फ़ित्ना बेशक बड़ा है, लेकिन अल्लाह की रहमत उससे कहीं ज़्यादा बड़ी है। एक सच्चे मोमिन का हथियार उसकी दुआ और उसका सब्र है। हमें चाहिए कि हम बे-मकसद की बहसों और खौफनाक कहानियों से बचकर सिर्फ उस रास्ते पर चलें जो सुन्नत से साबित है। जब हम अल्लाह की पनाह में आ जाते हैं, तो फिर कोई भी फ़ित्ना हमारा कुछ नहीं बिगाड़ सकता। अल्लाह हम सबको अपने हिफ़्ज़-ओ-अमान में रखे और हमारे ईमान की हिफ़ाज़त फ़रमाए। आमीन।


