एक सुकून भरा घर सिर्फ चार दीवारों से नहीं बनता, बल्कि उन लोगों से बनता है जो हमारे आस-पास रहते हैं। हमारे पड़ोसी या ‘पड़ोसी’ हमारी रोज़मर्रा की ज़िंदगी का एक अहम हिस्सा होते हैं। इस्लाम में पड़ोसियों के साथ अच्छे ताल्लुक़ात और उनके हक़ू़क़ (अधिकार) पर बहुत ज़ोर दिया गया है। जब हमारे आस-पास के लोग अमन-पसंद और नेक होते हैं, तो न सिर्फ हमारा घर, बल्कि हमारा पूरा माहौल सुकून और रहमत से भर जाता है।
अच्छे पड़ोसियों की अहमियत को समझते हुए, हमें न सिर्फ उनके साथ अच्छा सुलूक करना चाहिए, बल्कि अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त से अपने लिए और उनके लिए ख़ैर व बरकत की दुआ भी मांगनी चाहिए।
Padosi Aur Rozmarrah Zindagi
इंसान एक समाजी मख़लूक़ है और वह अकेला नहीं रह सकता। घर के बाद अगर कोई सबसे ज़्यादा हमारे क़रीब होता है, तो वह हमारा पड़ोसी है। सुबह की शुरुआत से लेकर रात के आराम तक, हम किसी न किसी तरह अपने पड़ोसियों से जुड़े होते हैं। एक अच्छा पड़ोसी वह है जिससे आपको ज़हनी सुकून मिले, जो ज़रूरत के वक़्त आपके काम आए और जिसकी मौजूदगी से आप और आपका परिवार महफ़ूज़ (सुरक्षित) महसूस करें।
कभी-कभी छोटी-छोटी बातें, जैसे मुस्कुरा कर सलाम करना या ज़रूरत पड़ने पर एक-दूसरे की मदद करना, रिश्तों में मिठास पैदा कर देती हैं। सुकून भरी ज़िंदगी के लिए यह ज़रूरी है कि हमारे पड़ोसियों के साथ हमारे ताल्लुक़ात अदब और लिहाज़ पर मबनी (आधारित) हों। जब हम अल्लाह से “Achche padosi ki dua” मांगते हैं, तो असल में हम अपने घर और गली में अमन और सलामती की दरख्वास्त करते हैं।
Islam Padosiyon Ke Bare Mein Kya Sikhata Hai
इस्लाम में पड़ोसियों का मर्तबा बहुत बुलंद है। नबी करीम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फ़रमाया कि जिब्रील (अलैहिस्सलाम) मुझे पड़ोसियों के बारे में इस क़दर ताकीद (ज़ोर देना) करते रहे कि मुझे गुमान होने लगा कि शायद उन्हें विरासत में हिस्सेदार न बना दिया जाए। यह हदीस हमें बताती है कि पड़ोसी का हक़ हमारे ऊपर कितना ज़्यादा है।
इस्लाम हमें सिखाता है कि हम अपने पड़ोसी के साथ नरमी बरतें, उनके दुख-सुख में शरीक हों और उन्हें अपनी ज़बान या अमल से कोई तकलीफ़ न पहुँचाएँ। दुआ इस सामाजी रिश्ते का एक रूहानी हिस्सा है। जब हम दुआ करते हैं, तो हम अल्लाह से यह उम्मीद लगाते हैं कि वह हमारे इर्द-गिर्द नेक और अच्छे लोग बसाए, ताकि हमारा ईमान और अख़लाक़ भी महफ़ूज़ रहे।
Achche Padosi Ke Liye Padhi Jane Wali Masnoon Dua
नबी करीम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) अक्सर उन चीज़ों से पनाह मांगते थे जो इंसान के सुकून में ख़लल डालती हैं। इसी सिलसिले में एक बहुत ही जामे (Comprehensive) दुआ ज़िक्र की गई है, जिसमें एक मुस्तक़िल (स्थायी) घर में बुरे पड़ोसी से पनाह और अच्छे माहौल की तलब की गई है।
Arabic Dua
اللَّهُمَّ إِنِّي أَعُوذُ بِكَ مِنْ جَارِ السَّوءِ فِي دَارِ الْمُقَامَةِ، فَإِنَّ جَارَ الْبَادِيَةِ يَتَحَوَّلُ
तलफ़्फ़ुज़
अल्लाहुम्मा इन्नी अऊज़ु बिका मिन जारिस-सू-इ़ फ़ी दारिल मुक़ामति, फ़-इन्ना जारल बादियति यतहव्व-लु।
Roman (Hinglish)
Allahumma inni a’udhu bika min jaaris-saw’i fi daaril-muqaamati, fa inna jaaral-baadiyati yatahawwalu.
तर्जुमा
“ऐ अल्लाह! मैं एक मुस्तक़िल घर (जहां हमेशा रहना हो) में बुरे पड़ोसी से तेरी पनाह मांगता हूँ, क्योंकि सफ़र या अस्थायी जगह का पड़ोसी तो बदल जाता है।”
इस दुआ में बंदा अल्लाह से दुआ करता है कि जहाँ उसे मुस्तक़िल तौर पर रहना है, वहाँ उसे ऐसे पड़ोसियों से बचाए जो उसके लिए फ़ितना या परेशानी का सबब बनें। इसका दूसरा पहलू यह है कि अल्लाह उसे नेक और सुकून देने वाले पड़ोसी अता फरमाए।
Masdar (Reference)
- Sunan an-Nasa’i: 5502
- Sahih Ibn Hibban: 1033(इसे इमाम अल्बानी ने सहीह क़रार दिया है)।
Dua Ke Saath Padosiyon Ke Saath Rawaiya
सिर्फ दुआ करना काफ़ी नहीं है, बल्कि सुन्नत का रास्ता यह है कि हम खुद भी एक अच्छे पड़ोसी बनें। हमारे अख़लाक़ और किरदार से पड़ोसियों को यह महसूस होना चाहिए कि वे महफ़ूज़ हैं।
- स्रब और बर्दाश्त: अगर पड़ोसी से कोई छोटी-मोटी भूल हो जाए, तो सब्र से काम लेना और उसे नज़रअंदाज़ करना बड़े दिल की निशानी है।
- नरमी और भलाई: हदीस में आता है कि वह शख्स मोमिन नहीं जो खुद पेट भरकर सोए और उसका पड़ोसी भूखा हो। यह सिखाता है कि हमें अपने पड़ोसियों की ज़रूरतों का ख्याल रखना चाहिए।
- नीयत की पाकीज़गी: जब भी आप अपने घर के लिए सुकून की दुआ करें, तो अपने पड़ोसियों की ख़ैर-ख़्वाह (भलाई) की नीयत भी रखें। आपकी नेक नीयत आपके पूरे मोहल्ले में बरकत का ज़रिया बन सकती है।
अच्छे पड़ोसी अल्लाह की एक बड़ी नेमत हैं। उनके साथ खुश-अख़लाक़ी से पेश आना सदक़ा है और यह हमारे मुआशरे (समाज) को मज़बूत बनाता है।
मुख़्तसर सवाल-जवाब
क्या सिर्फ दुआ से पड़ोसी का रिश्ता बेहतर हो सकता है?
दुआ एक ताक़तवर ज़रिया है, लेकिन इसके साथ-साथ हमें अपने अमल और अख़लाक़ को भी सुन्नत के मुताबिक ढालना चाहिए। जब हम खुद अच्छे पड़ोसी बनते हैं और अल्लाह से दुआ भी करते हैं, तो रिश्तों में बेहतरी और सुकून ज़रूर आता है।
क्या पड़ोसी के लिए दुआ करना सुन्नत रवैया है?
जी हाँ, दूसरों के लिए भलाई और हिदायत की दुआ करना नबी करीम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) का तरीका है। पड़ोसियों के लिए सुकून और ख़ैर की दुआ करना न सिर्फ सामाजी भाईचारे को बढ़ाता है, बल्कि यह हमारे अपने दिल को भी साफ़ रखता है।
आख़िरी बात
एक नेक और अमन-पसंद पड़ोसी अल्लाह का बेहतरीन तोहफ़ा है। अपनी रोज़ाना की दुआओं में अल्लाह से अच्छे माहौल और नेक पड़ोसियों की दरख्वास्त करें। याद रखें कि दुआ मांगने का मक़सद किसी की शिकायत करना नहीं, बल्कि अपने और अपने परिवार के लिए सुकून और हिफ़ाज़त की तलब करना है। जब हम अल्लाह पर कामिल (पूरा) भरोसा रखते हैं और सुन्नत के मुताबिक़ ज़िंदगी गुज़ारने की कोशिश करते हैं, तो अल्लाह हमारे लिए हर मामले में आसानी और भलाई के रास्ते खोल देता है।
अल्लाह हमें और हमारे पड़ोसियों को एक-दूसरे के लिए सुकून और रहमत का ज़रिया बनाए। आमीन।


