इस्लाम में इंसान की इज़्ज़त और उसके वक़ार (dignity) को बहुत ऊँचा मक़ाम दिया गया है। जब हम पर्दादारी और पाकदामनी की बात करते हैं, तो इसका असल मक़सद इंसान के किरदार को मज़बूत करना और उसे एक ऐसा रूहानी सुकून देना है, जहाँ वह अपनी और दूसरों की हुरमत (respect) की हिफ़ाज़त कर सके।
अल्लाह रब्बुल आलमीन ने इंसान को फ़ितरती तौर पर पाकीज़गी पसंद बनाया है। Pardadari aur pakdamani ki dua महज़ अल्फाज़ का मजमुआ नहीं है, बल्कि यह अपने रब से की गई वह इल्तिजा है जिसमें एक बंदा अपनी ज़ात, अपनी सोच और अपने अमल को बुराई की परछाईं से बचाकर अल्लाह की पनाह में देने का इरादा करता है।
Dil Ki Hifazat Aur Insaan Ki Kamzori
इंसानी फ़ितरत में जहाँ बहुत सी खूबियाँ हैं, वहीं कुछ कमज़ोरियाँ भी मौजूद हैं। हमारा दिल अक्सर अलग-अलग तरह के वसवसों और खयालात का मरकज़ बना रहता है। दुनिया की चमक-धमक और बदलती हुई तहज़ीब के दरमियान अपने किरदार की पाकीज़गी को बरकरार रखना कभी-कभी मुश्किल महसूस होने लगता है।
अल्लाह तआला हमारी इन कमज़ोरियों से वाक़िफ़ है। इसीलिए इस्लाम हमें यह सिखाता है कि हम अपनी ताकत पर नहीं, बल्कि अल्लाह की मदद पर भरोसा करें। नियत की सफ़ाई और एहतियात वह दो बुनियादी चीज़ें हैं जो हमें ज़हनी और रूहानी सुकून देती हैं। जब हम दुआ करते हैं, तो हम असल में अपनी बेबसी का इक़रार करते हुए उस ज़ात से मदद माँगते हैं जो दिलों के हाल को बदलने वाली है। यह दुआ हमें डराती नहीं है, बल्कि हमें यह एहसास दिलाती है कि हम अकेले नहीं हैं; अल्लाह की हिफ़ाज़त हमारे साथ है।
Islam Pardadari Aur Pakdamani Ko Kaise Samajhta Hai
इस्लाम में हया को ईमान का एक अहम हिस्सा (शौबा) बताया गया है। हया या पर्दादारी सिर्फ ज़ाहिरी लिबास तक महदूद नहीं है, बल्कि यह इंसान के अख़लाक़, उसकी गुफ़्तगू और उसकी नज़रों की पाकीज़गी का नाम है। पाकदामनी (Chastity) एक अंदरूनी ताक़त है जो इंसान को अपने नफ़्स पर काबू पाना सिखाती है।
यह तसव्वुर किसी पर ज़बर्दस्ती थोपने के लिए नहीं, बल्कि इंसान की अपनी इज़्ज़त (self-respect) को महफ़ूज़ करने के लिए है। जब कोई शख़्स अपने दिल में हया को जगह देता है, तो उसके अंदर एक खास तरह का इत्मीनान पैदा होता है। दुआ इसमें एक रूहानी पुल का काम करती है, जो बंदे के इरादे को मज़बूत करती है और उसे मुश्किल रास्तों पर भी साबित-क़दम (firm) रखती है।
Pardadari Aur Pakdamani Ke Liye Padhi Jane Wali Masnoon Dua
रसूलुल्लाह (ﷺ) अपनी दुआओं में अक्सर अल्लाह तआला से हिदायत और पाकीज़गी माँगा करते थे। यह दुआ नफ़्स की इस्लाह और दिल की पाकीज़गी के लिए सबसे जामे (comprehensive) और मोतबर दुआ मानी जाती है।
Arabic Dua
اللَّهُمَّ إِنِّي أَسْأَلُكَ الْهُدَى وَالتُّقَى وَالْعَفَافَ وَالْغِنَى
तलफ़्फ़ुज़
अल्लाहुम्मा इन्नी असअलुकल-हुदा, वत-तुक़ा, वल-अफ़ाफ़ा, वल-ग़िना।
Roman (Hinglish)
Allahumma inni as’aluka al-huda wat-tuqa wal-‘afaafa wal-ghina.
तर्जुमा
“ऐ अल्लाह! मैं तुझसे हिदायत (सही रास्ता), तक़वा (तेरा डर), अफ़ाफ़ (पाकदामनी/चैस्टिटी) और ग़िना (दिल की बे-नियाज़ी) माँगता हूँ।”
Masdar (Reference)
सहीह मुस्लिम: 2721 (Sahih Muslim: 2721)
Dua Ke Saath Andarooni Taqat Ka Safar
दुआ सिर्फ माँग लेने का नाम नहीं है, बल्कि यह एक अंदरूनी सफ़र है। जब हम “अफ़ाफ़” (पाकदामनी) की दुआ करते हैं, तो हम अल्लाह से वह ज़हनी ताक़त माँग रहे होते हैं जो हमें हर तरह की बे-हयाई से दूर रखे। यह सफ़र सब्र और इल्म से मुकम्मल होता है।
अपने आप को नेक सोहबत में रखना, अच्छी बातें सीखना और अपने वक़्त को मुफ़्त (productive) कामों में लगाना हमें उस पाकीज़ा रास्ते पर चलने में मदद देता है। यह समझना ज़रूरी है कि हर इंसान से ग़लती हो सकती है, लेकिन अल्लाह का दर वह है जहाँ हमेशा तौबा और वापसी का रास्ता खुला रहता है। दुआ हमारे दिल को नरम करती है और हमें वह हौसला देती है जिससे हम अपनी इज़्ज़त और हया की हिफ़ाज़त कर सकें।
मुख़्तसर सवाल-जवाब
सवाल 1: क्या पर्दादारी सिर्फ लिबास तक महदूद है?
जवाब: जी नहीं। पर्दादारी एक वसीअ (व्यापक) मफहूम है। इसमें नज़र की हया, बातचीत की तहज़ीब और सोच की पाकीज़गी शामिल है। लिबास उस अंदरूनी हया का एक बाहरी इज़हार है।
सवाल 2: क्या पाकदामनी के लिए दुआ हर उम्र के लोग कर सकते हैं?
जवाब: बिलकुल। यह दुआ हर उम्र के मर्द और औरत के लिए है। चाहे वह नौजवान हो जो फ़ितनों से बचना चाहता हो, या बड़े-बुजुर्ग जो अपने किरदार की बुलंदी चाहते हों। यह रूह की पाकीज़गी की दुआ है।
आख़िरी बात
पर्दादारी और पाकदामनी का असल मक़सद इंसान को पाबंद करना नहीं, बल्कि उसे आज़ाद और बा-इज़्ज़त बनाना है। जब हम pardadari aur pakdamani ki dua को अपनी ज़िंदगी का हिस्सा बनाते हैं, तो हम असल में अल्लाह पर अपने कामिल भरोसे का इज़हार करते हैं। हया वह ज़ेवर है जो इंसान के ईमान को मुकम्मल करता है और उसे समाज में एक बा-वक़ार मक़ाम देता है।
अल्लाह तआला से दुआ है कि वह हमारे दिलों को नूर-ए-ईमान से मुनव्वर फरमाए और हमें हया और पाकीज़गी वाली ज़िंदगी अता करे। आमीन।

