इंसानी ज़िंदगी में कभी-कभी ऐसी छोटी-बड़ी तकलीफ़ें आती हैं जो हमें बेचेन कर देती हैं। सिर दर्द भी उन्हीं में से एक है। जब सिर में भारीपन या दर्द महसूस होता है, तो इंसान का किसी काम में मन नहीं लगता और वह सिर्फ सुकून की तलाश करता है। एक मुसलमान होने के नाते, हमारा यह मानना है कि हर छोटी-बड़ी मुश्किल में अल्लाह की तरफ़ रुजू करना और उससे पनाह मांगना ही असल कामयाबी है।
सिर दर्द और इंसान की बेचैनी
आज की भागदौड़ भरी ज़िंदगी में सिर दर्द एक आम बात हो गई है। कभी दिन भर की थकान, कभी काम का बढ़ता हुआ दबाव, तो कभी ज़हनी तनाव (Stress) इंसान को थका देता है। सिर का दर्द सिर्फ एक जिस्मानी अहसास नहीं है, बल्कि यह इंसान को उसकी कमज़ोरी की याद दिलाता है। यह बताता है कि इंसान चाहे कितना भी ताक़तवर क्यों न हो जाए, एक हल्की सी तकलीफ़ उसे बेबस कर सकती है।
ऐसी सूरत में इंसान अक्सर घबरा जाता है या चिड़चिड़ा हो जाता है। लेकिन यह वक़्त अपनी बेबसी को अल्लाह के सामने ज़ाहिर करने का होता है। सिर दर्द के दौरान जो बेचैनी महसूस होती है, उसे अगर सब्र और अल्लाह के ज़िक्र से जोड़ा जाए, तो वह रूहानी सुकून का ज़रिया बन सकती है।
तकलीफ़ के वक़्त इस्लाम क्या सिखाता है?
इस्लाम हमें हर हाल में अल्लाह पर भरोसा (तवक्कुल) करने का दर्स देता है। जब भी कोई तकलीफ़ आए, तो सबसे पहला नज़रिया ‘सब्र’ का होना चाहिए। नबी करीम ﷺ की सुन्नत हमें सिखाती है कि बीमारी या दर्द सिर्फ़ एक आज़माइश नहीं है, बल्कि यह गुनाहों की माफ़ी और अल्लाह के क़रीब होने का एक रास्ता भी है।
तकलीफ़ के वक़्त दुआ माँगना अल्लाह की बंदगी का एक अहम हिस्सा है। दुआ का मक़सद अल्लाह से अपना रिश्ता मज़बूत करना और उसकी कुदरत पर यकीन ज़ाहिर करना है। जब हम सिर दर्द की दुआ सुन्नत के मुताबिक़ पढ़ते हैं, तो हमें यह एहसास होता है कि हम अकेले नहीं हैं, बल्कि अल्लाह की पनाह हमारे साथ है। यह रूहानी सहारा इंसान के दिल को मज़बूत करता है और उसे तकलीफ़ बर्दाश्त करने की हिम्मत देता है।
सिर दर्द के वक़्त पढ़ी जाने वाली सुन्नत दुआ
नबी करीम ﷺ ने जिस्मानी तकलीफ़ और दर्द के वक़्त के लिए बहुत ही जामे (Comprehensive) और मुअसर दुआएं सिखाई हैं। यह दुआएं सहीह अहादीस से साबित हैं और एक मोमिन के लिए बेहतरीन रूहानी सहारा हैं।
जब भी सिर में दर्द या जिस्म के किसी हिस्से में तकलीफ़ महसूस हो, तो उस्मान बिन अबी अल-आस (रज़ियल्लाहु अन्हु) वाली हदीस पर अमल करना सुन्नत है।
Arabic Dua
بِسْمِ اللَّهِ (3 बार)
أَعُوذُ بِعِزَّةِ اللَّهِ وَقُدْرَتِهِ مِنْ شَرِّ مَا أَجِدُ وَأُحَاذِرُ (7 बार)
तलफ़्फ़ुज़
बिस्मिल्लाह (3 बार)
अऊज़ु बि-इज़्ज़तिल्लाहि व क़ुदरतिही मिन शर्रि मा अजिदु व उहाज़िरु (7 बार)
Roman (Hinglish)
Bismillah (3 times)
A’udhu bi-izzatillahi wa qudratihi min sharri ma ajidu wa uhadhiru (7 times)
तर्जुमा
“अल्लाह के नाम के साथ (3 बार)। मैं अल्लाह की इज़्ज़त और उसकी कुदरत की पनाह चाहता हूँ उस चीज़ के शर (बुराई/तकलीफ़) से जिसे मैं महसूस कर रहा हूँ और जिससे मैं डरता हूँ (7 बार)।”
Masdar (Sahih Hadith Reference)
यह दुआ सहीह मुस्लिम (Sahih Muslim: 2202) में ज़िक्र की गई है। हदीस के मुताबिक़, नबी करीम ﷺ ने फ़रमाया कि जहाँ दर्द हो वहाँ हाथ रखकर पहले तीन बार ‘बिस्मिल्लाह’ कहें और फिर सात बार यह दुआ पढ़ें।
दुआ के साथ इंसान का रवैया
दुआ पढ़ने का मतलब यह नहीं है कि इंसान सिर्फ़ लफ़्ज़ों को दोहराए, बल्कि इसके साथ सही रवैया इख़्तियार करना भी ज़रूरी है।
- सब्र और शुक्र: तकलीफ़ में शोर मचाने या शिकायत करने के बजाय सब्र करें। यह सोचे कि यह वक़्त भी गुज़र जाएगा।
- अल्लाह पर तवक्कुल: दिल में यह मुकम्मल यकीन रखें कि सुकून देने वाली ज़ात सिर्फ़ अल्लाह की है।
- ज़िम्मेदारी और मदद: अगर दर्द ज़्यादा हो या बार-बार हो, तो यह इंसान की ज़िम्मेदारी है कि वह इसकी वजह तलाश करे और ज़रूरत पड़ने पर जानकारों (Experts) की मदद ले। इस्लाम में अपनी सेहत का ख़याल रखना और ज़रूरत पड़ने पर मदद लेना सुन्नत के ख़िलाफ़ नहीं है, बल्कि यह अपनी जान की हिफ़ाज़त का हिस्सा है।
मुख़्तसर सवाल-जवाब
सवाल: क्या सिर दर्द के लिए दुआ पढ़ना सुन्नत रवैया है?
जवाब: जी हाँ, नबी करीम ﷺ ने सहाबा को तकलीफ़ के वक़्त दुआएं सिखाई हैं। दुआ मांगना ख़ुद एक इबादत है और अल्लाह से ताल्लुक जोड़ने का ज़रिया है। यह सुन्नत के ऐन मुताबिक़ है कि हम अपनी हर तकलीफ़ में अल्लाह को पुकारें।
सवाल: क्या दुआ के साथ ज़रूरत पड़ने पर बाहरी मदद लेना ग़लत है?
जवाब: बिल्कुल नहीं। इस्लाम एक मुकम्मल दीन है जो दुआ और कोशिश (अस्बाब) दोनों का हुक्म देता है। जिस तरह भूख लगने पर दुआ के साथ खाना खाना ज़रूरी है, उसी तरह तकलीफ़ बढ़ने पर ज़रूरी तदबीरें इख़्तियार करना और मदद लेना सुन्नत के मुताबिक़ है।
आख़िरी बात
सिर दर्द या कोई भी जिस्मानी तकलीफ़ हमें अल्लाह के और क़रीब लाने का एक ज़रिया हो सकती है। जब हम ‘Sir dard ki dua sunnat’ के मुताबिक़ पढ़ते हैं, तो हम असल में अल्लाह की बड़ाई और अपनी बेबसी का इक़रार करते हैं। यह अमल हमें न सिर्फ़ ज़हनी सुकून देता है, बल्कि हमारे ईमान को भी ताज़गी बख्शता है।
याद रखें, अल्लाह अपने बंदों पर उनकी बर्दाश्त से ज़्यादा बोझ नहीं डालता। अपनी तकलीफ़ को अल्लाह के सुपुर्द कर दें, उसकी ज़ात पर भरोसा रखें और दुआओं के ज़रिए अपने दिल को मुतमइन रखें। अल्लाह पाक तमाम मोमिनों को सेहत और कामिल सुकून अता फ़रमाए। आमीन।


