फ़क़ीरी दूर करने की दुआ | फ़क़ीरी से राहत के लिए दुआ

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मुख़्तसर रहनुमाई

फ़क़ीरी दूर करने की दुआ

اللَّهُمَّ إِنِّي أَعُوذُ بِكَ مِنَ الْكُفْرِ وَالْفَقْرِ، وَأَعُوذُ بِكَ مِنْ عَذَابِ الْقَبْرِ، لَا إِلَهَ إِلَّا أَنْتَ
तलफ़्फ़ुज़:
अल्लाहुम्मा इन्नी अऊज़ु बिका मिनल कुफ़्रि वल फ़क़्रि, व अऊज़ु बिका मिन अज़ाबिल क़ब्रि, ला इलाहा इल्ला अंता।
तर्जुमा:
ऐ अल्लाह! मैं कुफ़्र और फ़क़ीरी (मुफ़लिसी) से तेरी पनाह माँगता हूँ, और मैं क़ब्र के अज़ाब से तेरी पनाह माँगता हूँ, तेरे सिवा कोई माबूद नहीं।
मसदर: 
सुनन अन-नसाई, हदीस नंबर 1347 (सहीह)

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इंसानी ज़िंदगी में उतार-चढ़ाव आना एक फ़ितरी अमल है। कभी वक़्त बहुत आसान होता है, तो कभी आर्थिक तंगी (Financial hardship) इंसान के सब्र और हौसले का इम्तिहान लेती है। इस्लाम में माली तंगी या फ़क़ीरी को किसी की ज़िल्लत का ज़रिया नहीं माना गया है, बल्कि इसे एक आज़माइश कहा गया है।

जब एक मोमिन आर्थिक दबाव महसूस करता है, तो उसका सबसे बड़ा सहारा अल्लाह की ज़ात होती है। Faqeeri dur karne ki dua असल में वह पुकार है जिसमें एक बंदा अपने रब से मोहताजी, बेबसी और फ़क़्र (Poverty) से पनाह माँगता है, ताकि वह इज़्ज़त और सुकून के साथ अपनी और अपने अहल-ओ-अयाल (परिवार) की ज़िम्मेदारी पूरी कर सके।


फ़क़ीरी और इंसान की इज़्ज़त

आर्थिक तंगी केवल पैसों की कमी का नाम नहीं है, बल्कि यह इंसान के स्वाभिमान (Self-respect) और उसकी दिमागी शांति पर भी असर डालती है। इस्लाम हर इंसान की इज़्ज़त-ए-नफ़्स (Dignity) को बहुत अहमियत देता है। फ़क़ीरी का मतलब यह हरगिज़ नहीं है कि इंसान की कद्र कम हो गई है।

ज़िंदगी के मुश्क़िल दौर में अपनी इज़्ज़त को महफ़ूज़ रखना और अपनी ज़रूरतों के लिए सिर्फ़ अल्लाह की तरफ़ रुजू करना ही मोमिन की शान है। दुआ हमें वह रूहानी ताक़त देती है जिससे हम तंगी के बावजूद मायूस नहीं होते और अपनी मेहनत जारी रखते हैं।

इस्लाम रिज़्क़ और फ़क़ीरी को कैसे समझता है?

इस्लामी नज़रिए के मुताबिक, रिज़्क़ देने वाली ज़ात सिर्फ़ अल्लाह की है। क़ुरान और सुन्नत हमें यह सिखाते हैं कि इंसान को अपनी कोशिश (Mehnat) पूरी करनी चाहिए, लेकिन नतीजे के लिए अल्लाह पर भरोसा रखना चाहिए।

रिज़्क़ के मामले में ‘क़नाअत’ (Contentment) एक बहुत बड़ी दौलत है। इसका मतलब है कि जो अल्लाह ने दिया है, उस पर दिल का मुतमइन (Satisfied) होना और मजीद बरकत के लिए अल्लाह से दुआ करना। दुआ और कोशिश का रिश्ता बहुत गहरा है; जहाँ कोशिश हमारा अख़लाक़ी फ़र्ज़ है, वहीं दुआ हमारे ईमान की अलामत है कि हम सिर्फ़ अल्लाह के मोहताज हैं।


फ़क़ीरी से पनाह और आसानी के लिए मसूून दुआ

यहाँ एक ऐसी दुआ पेश की जा रही है जो सहीह अहादीस से साबित है। इस दुआ में नबी-ए-करीम (ﷺ) ने फ़क़ीरी, कुफ़्र और क़र्ज़ के बोझ से पनाह माँगी है।

Arabic Dua

اللَّهُمَّ إِنِّي أَعُوذُ بِكَ مِنَ الْكُفْرِ وَالْفَقْرِ، وَأَعُوذُ بِكَ مِنْ عَذَابِ الْقَبْرِ، لَا إِلَهَ إِلَّا أَنْتَ

तलफ़्फ़ुज़ (Hindi)

अल्लाहुम्मा इन्नी अऊज़ु बिका मिनल कुफ़्रि वल फ़क़्रि, व अऊज़ु बिका मिन अज़ाबिल क़ब्रि, ला इलाहा इल्ला अंता।

Roman (Hinglish)

Allahumma inni a’udhu bika minal kufri wal faqri, wa a’udhu bika min ‘adhabil qabri, la ilaha illa Anta.

तर्जुमा

“ऐ अल्लाह! मैं कुफ़्र और फ़क़ीरी (मुफ़लिसी) से तेरी पनाह माँगता हूँ, और मैं क़ब्र के अज़ाब से तेरी पनाह माँगता हूँ, तेरे सिवा कोई माबूद नहीं।”

म़सदर (Reference)

सुनन अन-नसाई, हदीस नंबर 1347 (सहीह)


दुआ के साथ दिल का इत्मिनान

दुआ माँगने का मक़सद सिर्फ़ माँगना नहीं होता, बल्कि यह अल्लाह के साथ अपने ताल्लुक़ को मज़बूत करना भी है। जब हम दिल से दुआ करते हैं, तो हमारे अंदर ‘सब्र’ पैदा होता है। माली तंगी के वक़्त इंसान अक्सर दूसरों से अपनी तुलना (Comparison) करने लगता है, जिससे दुख बढ़ता है।

इस्लाम हमें सिखाता है कि हम अपने से नीचे वालों को देखें ताकि हम ‘शुक्र’ करना सीख सकें। जब दिल में शुक्र और अल्लाह पर कामिल भरोसा होता है, तो हालात चाहे जैसे भी हों, इंसान के चेहरे पर शिकन नहीं आती। यह दुआ इंसान को लालच नहीं, बल्कि ‘ग़िना’ (Self-sufficiency) और किफ़ायत सिखाती है।


मुख़्तसर सवाल-जवाब

1. क्या फ़क़ीरी से बचने की दुआ रोज़ पढ़ सकते हैं?
जी हाँ, नबी-ए-करीम (ﷺ) सुबह और शाम के अज़कार में अल्लाह से फ़क़ीरी और मोहताजी से पनाह माँगा करते थे। इसे रोज़ाना अपनी दुआओं का हिस्सा बनाना सुन्नत के मुताबिक है।

2. क्या रिज़्क़ की कमी ईमान की कमी की वजह से होती है?
नहीं, ऐसा सोचना ग़लत है। दुनिया में कई नेक बंदों और अंबिया-ए-किराम (Prophets) पर भी तंगी का वक़्त आया है। रिज़्क़ की कमी और ज़्यादती अल्लाह की तरफ़ से आज़माइश और उसकी हिकमत (Wisdom) का हिस्सा होती है, इसे ईमान की मज़बूती या कमज़ोरी का पैमाना नहीं बनाना चाहिए।


आख़िरी बात

ज़िंदगी के माली हालात चाहे कैसे भी हों, एक मोमिन कभी भी अल्लाह की रहमत से मायूस नहीं होता। फ़क़ीरी से राहत के लिए माँगी गई दुआ हमें यह एहसास दिलाती है कि हमारे पास जो कुछ भी है, वह अल्लाह की अता है और जो हमें चाहिए, वह भी अल्लाह ही दे सकता है। अपनी हलाल कोशिशें जारी रखें, इज़्ज़त के साथ ज़िंदगी गुज़ारें और हमेशा अल्लाह से रिज़्क़ में बरकत और दिल के इत्मिनान की दुआ करते रहें।