इंसान की रोज़ाना की ज़िंदगी में आईना (शीशा) एक ऐसी चीज़ है जिससे हमारा साबक़ा कई बार पड़ता है। सुबह तैयार होते वक़्त, वज़ू करते हुए या घर से बाहर निकलते समय हम अपनी ज़ाहिरी सूरत को देखते हैं। इस्लाम हमें सिखाता है कि यह मामूली सा दिखने वाला अमल भी अल्लाह की याद और शुक्र का ज़रिया बन सकता है।
जब हम आईना देखते हैं, तो असल में हम अल्लाह की बनाई हुई एक बेहतरीन मख्लूक (insaan) को देख रहे होते हैं। यह लम्हा अपनी तारीफ़ में खो जाने का नहीं, बल्कि उस रब्बे करीम का अहसान मानने का है जिसने हमें मुकम्मल और मुतवाज़िन (balanced) बनाया है।
रोज़मर्रा ज़िंदगी और आईना
आज की भागदौड़ भरी ज़िंदगी में हम अक्सर आईने के सामने खड़े होकर अपनी कमियां तलाशने लगते हैं। कभी चेहरे की थकान तो कभी बढ़ती उम्र के निशान हमें परेशान करते हैं। लेकिन एक मोमिन के लिए आईना देखना ‘खुद से मुलाक़ात’ का एक सुकून भरा वक़्त है।
यह वह वक़्त है जब हम अपनी भागती हुई ज़िंदगी में कुछ पलों के लिए ठहरते हैं। सुन्नत का तरीक़ा हमें यह एहसास दिलाता है कि हमारी शक्ल-ओ-सूरत अल्लाह की दी हुई एक अमानत है। जब हम आईने में खुद को देखें, तो हमारा ध्यान इस बात पर होना चाहिए कि अल्लाह ने हमें कितनी रहमतों से नवाज़ा है। यह महज़ एक आदत नहीं, बल्कि एक रूहानी अहसास होना चाहिए।
इस्लाम आईना देखने का अदब क्या सिखाता है
इस्लाम हर छोटे-बड़े अमल में ‘एतदाल’ यानी संतुलन और सादगी की तालीम देता है। आईना देखते वक़्त भी हमारे ज़हन में दो चीज़ें होनी चाहिए: शुक्र और आज़िज़ी (Humility)।
- शुक्र: इस बात का कि अल्लाह ने हमें एक बेहतर वजूद अता किया।
- एतदाल: यानी हम अपनी ज़ाहिरी बनावट पर न तो फख्र (घमंड) करें और न ही हीन भावना (inferiority complex) का शिकार हों।
- अल्लाह की याद: आईना देखते वक़्त अपनी ज़ाहिरी खूबसूरती से ज़्यादा अपनी रूहानी और अख़्लाक़ी खूबसूरती की फिक्र करना ही असल इस्लामी अदब है।
आईना देखते वक़्त पढ़ी जाने वाली सुन्नत दुआ
नबी-ए-करीम ﷺ ने हमें हर मौके के लिए बेहतरीन दुआएं सिखाई हैं। आईना देखते वक़्त की यह दुआ हमें अपनी ज़ाहिरी शक्ल के साथ-साथ अपने अख़्लाक़ (चरित्र) को संवारने की तरफ मुतवज्जे करती है।
Arabic Dua
اللَّهُمَّ كَمَا حَسَّنْتَ خَلْقِي فَحَسِّنْ خُلُقِي
तलफ़्फ़ुज़
अल्लाहुम्मा कमा हस्सन-त खल-क़ी फ-हस्सिन खुलु-क़ी।
Roman (Hinglish)
Allahumma kamaa hassanta khalqi fa-hassin khuluqi
तर्जुमा
“ऐ अल्लाह! जिस तरह तूने मेरी शक्ल-ओ-सूरत (बनावट) को अच्छा बनाया है, उसी तरह मेरे अख़्लाक़ (किरदार) को भी अच्छा बना दे।”
इस दुआ का मफ़हूम बेहद गहरा है। इसमें बंदा अल्लाह से अर्ज़ करता है कि या अल्लाह, तूने बाहर से तो मुझे मुकम्मल और खूबसूरत बनाया ही है, अब मेरे अंदर की दुनिया यानी मेरे व्यवहार और नीयत को भी वैसा ही पाक और साफ़ बना दे।
Masdar (Hadith Reference)
यह दुआ सहीह सनद के साथ रिवायत की गई है।
- मस्दर: मुस्नद अहमद (हदीस नंबर: 24392), सहीह इब्ने हिब्बान। इसे इमाम नववी ने भी अपनी किताबों में ज़िक्र किया है।
इस सुन्नत से दिल को क्या याद आता है
जब हम यह दुआ पढ़ते हैं, तो हमारे दिल में एक अजीब सा सुकून और आज़िज़ी पैदा होती है। यह दुआ हमें याद दिलाती है कि इंसान की असल पहचान उसकी शक्ल से नहीं, बल्कि उसके अख़्लाक़ और किरदार से होती है।
- खुद की क़द्र (Self-Acceptance): यह दुआ हमें सिखाती है कि हम अल्लाह की बनाई हुई सूरत पर राज़ी रहें। जब हम कहते हैं कि “तूने मुझे अच्छा बनाया,” तो हम अल्लाह के फैसले पर शुक्र अदा कर रहे होते हैं।
- किरदार की अहमियत: चेहरे की चमक वक़्त के साथ ढल सकती है, लेकिन अच्छे अख़्लाक़ की चमक हमेशा बनी रहती है। यह दुआ हमें हर रोज़ अपने व्यवहार को बेहतर बनाने की याद दिलाती है।
- तवाज़ु (Humility): यह हमें घमंड से बचाती है। जब हमें यह एहसास होता है कि यह सब अल्लाह की अता है, तो दिल से ‘मैं’ खत्म हो जाती है और अल्लाह की बड़ाई घर कर लेती है।
Short Q&A
सवाल: क्या हर बार आईना देखते वक़्त यह दुआ पढ़ना सुन्नत है?
जवाब: जी हां, जब भी आप अपनी सूरत आईने में देखें या किसी भी अक्स (reflection) में खुद को देखें, तो यह दुआ पढ़ना मसनून और मुस्तहब है। इससे हमारा हर दिन सुन्नत के मुताबिक गुज़रता है।
सवाल: क्या यह दुआ सिर्फ सुबह के लिए है या हर वक़्त?
जवाब: इस दुआ का कोई ख़ास वक़्त मुक़र्रर नहीं है। दिन हो या रात, जब भी आप आईना इस्तेमाल करें, आप यह दुआ पढ़ सकते हैं। यह हर वक़्त के लिए मौज़ूं है।
आख़िरी बात
आईना देखना महज़ ज़ाहिरी सजने-संवरने का नाम नहीं है, बल्कि यह अपने आप को अल्लाह की एक नेमत के तौर पर देखने का वक़्त है। जब हम सुन्नत दुआ के साथ आईना देखते हैं, तो हमारा ज़हन दुनियावी पैमानों से हटकर रूहानी सुकून की तरफ चला जाता है।
अल्लाह से दुआ है कि वह हमें अपनी दी हुई तमाम नेमतों पर शुक्र करने की तौफीक अता फरमाए और हमारे अख़्लाक़ को वैसा ही खूबसूरत बना दे जैसा उसने हमें ज़ाहिरी तौर पर बनाया है। सुन्नत से मुहब्बत ही हमें दुनिया और आख़िरत में कामयाबी दिला सकती है।


