Jumma Mubarak Dua | जुम्मा मुबारक दुआ

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मुख़्तसर रहनुमाई

जुम्मा मुबारक दुआ

اللَّهُمَّ اجْعَلْ هَذَا الْيَوْمَ مُبَارَكًا وَاغْفِرْ لَنَا ذُنُوبَنَا وَارْحَمْنَا يَا أَرْحَمَ الرَّاحِمِينَ
तलफ़्फ़ुज़:
Allahumma-j‘al hadha al-yawma mubārakan, waghfir lana dhunubana, warhamna ya arhamar rahimeen
तर्जुमा:
ऐ अल्लाह! इस दिन को हमारे लिए मुबारक बना दे, हमारे गुनाह माफ़ कर दे और हम पर रहम फरमा, ऐ सबसे बढ़कर रहम करने वाले।
मसदर: 
रिवायती दुआ
jummah mubarak dua in hindi

Table of Content

जुम्मा का दिन हम सब के लिए सिर्फ़ एक दिन नहीं, बल्कि एक छोटी ईद की तरह होता है। हफ़्ते भर की भागदौड़ के बाद, यह दिन हमें सुकून और ठहराव का एहसास दिलाता है। साफ़-सुथरे कपड़े पहनना, ख़ुश्बू लगाना और मस्जिद में अज़ान की आवाज़ पर जमा होना—यह सब एक अलग ही रूहानी माहौल बनाता है।

अक्सर हम अपने दोस्तों और रिश्तेदारों को जुम्मा मुबारक कहते हैं, लेकिन असल ख़ूबसूरती तब है जब इसके साथ हम उनके लिए दिल से jumma mubarak dua भी करें। यह दिन सिर्फ़ रस्म निभाने का नहीं, बल्कि अल्लाह की रहमतें समेटने का है।

जुम्मा पर दुआ की अहमियत

जुम्मा के दिन दुआ मांगने की एक ख़ास फ़ज़ीलत है। हदीस शरीफ़ में आता है कि जुम्मा के दिन एक ऐसी ख़ास घड़ी (वक़्त) आती है, जिसमें बंदा अल्लाह से जो भी जायज़ चीज़ मांगता है, वह ज़रूर पूरी होती है।

बुज़ुर्गों और उलेमा का कहना है कि यह वक़्त इमाम के ख़ुतबे के लिए बैठने से लेकर नमाज़ ख़त्म होने तक, या फिर असर की नमाज़ के बाद से मगरिब तक हो सकता है। इसलिए सिर्फ़ मैसेज भेजने के बजाय, इस दिन अपने और अपनी उम्मत के लिए ख़ैरो-बरकत की दुआ ज़रूर मांगनी चाहिए।

मसनून जुम्मा दुआ | Masnoon Jumma Duas

जुम्मा के दिन सबसे बेहतरीन अमल नबी-ए-करीम (सल्ल.) पर कसरत से दुरूद शरीफ़ भेजना है। यह ख़ुद आप (सल्ल.) का हुक्म है।

1. दुरूद-ए-इब्राहीमी (Durood-e-Ibrahim)

(हर नमाज़ और ख़ासतौर पर जुम्मा के लिए)

Arabic Text:

اللَّهُمَّ صَلِّ عَلَى مُحَمَّدٍ وَعَلَى آلِ مُحَمَّدٍ كَمَا صَلَّيْتَ عَلَى إِبْرَاهِيمَ وَعَلَى آلِ إِبْرَاهِيمَ إِنَّكَ حَمِيدٌ مَجِيدٌ، اللَّهُمَّ بَارِكْ عَلَى مُحَمَّدٍ وَعَلَى آلِ مُحَمَّدٍ كَمَا بَارَكْتَ عَلَى إِبْرَاهِيمَ وَعَلَى آلِ إِبْرَاهِيمَ إِنَّكَ حَمِيدٌ مَجِيدٌ

तलफ़्फ़ुज़ (Devanagari):

अल्लाहुम्मा सल्ली अला मुहम्मदिन व-अला आलि मुहम्मदिन कमा सल्लय्-त अला इब्राहीम व-अला आलि इब्राहीम इन्नक हमीदुम मजीद।

अल्लाहुम्मा बारिक अला मुहम्मदिन व-अला आलि मुहम्मदिन कमा बारक-त अला इब्राहीम व-अला आलि इब्राहीम इन्नक हमीदुम मजीद।

Talaffuz (Roman):

Allahumma Salli Ala Muhammadin Wa-Ala Aali Muhammadin Kama Sallaita Ala Ibrahima Wa-Ala Aali Ibrahima Innaka Hamidum Majeed.

Allahumma Barik Ala Muhammadin Wa-Ala Aali Muhammadin Kama Barakta Ala Ibrahima Wa-Ala Aali Ibrahima Innaka Hamidum Majeed.

तर्जुमा:

ऐ अल्लाह! रहमत नाज़िल फ़रमा मुहम्मद (सल्ल.) पर और उनकी आल (औलाद/पैरोकारों) पर, जिस तरह तूने रहमत नाज़िल फ़रमाई इब्राहीम (अलै.) पर और उनकी आल पर, बेशक तू तारीफ़ के क़ाबिल और बुज़ुर्गी वाला है।

ऐ अल्लाह! बरकत नाज़िल फ़रमा मुहम्मद (सल्ल.) पर और उनकी आल पर, जिस तरह तूने बरकत नाज़िल फ़रमाई इब्राहीम (अलै.) पर और उनकी आल पर, बेशक तू तारीफ़ के क़ाबिल और बुज़ुर्गी वाला है।

मसदर (Source): सहीह बुख़ारी (Sahih Bukhari)

2. दुनिया और आख़िरत की भलाई की दुआ

(हर वक़्त और जुम्मा की क़ुबूलियत की घड़ी के लिए)

Arabic Text:

رَبَّنَا آتِنَا فِي الدُّنْيَا حَسَنَةً وَفِي الآخِرَةِ حَسَنَةً وَقِنَا عَذَابَ النَّارِ

तलफ़्फ़ुज़ (Devanagari):

रब्बना आतिना फ़िद्दूनिया हसनतंव-व-फ़िल आख़िरति हसनतंव-व-क़िना अज़ाबन्नार।

Talaffuz (Roman):

Rabbana Atina Fid-Dunya Hasanatan Wa Fil Aakhirati Hasanatan Wa Qina Azaban Naar.

तर्जुमा:

ऐ हमारे रब! हमें दुनिया में भी भलाई अता कर और आख़िरत में भी भलाई अता कर, और हमें आग (जहन्नम) के अज़ाब से बचा ले।

मसदर (Source): क़ुरान मजीद (सूरह बक़रह: 201)

जुम्मा मुबारक कहने का अदब

जब आप किसी को “जुम्मा मुबारक” कहें, तो इसे सिर्फ़ एक रटी-रटाई बात न बनाएं। इसके पीछे आपकी नीयत दुआ देने की होनी चाहिए। अदब यह है कि:

  • मुलाक़ात के वक़्त सलाम (अस्सलामु अलैकुम) पहले करें, फिर मुबारकबाद दें।
  • सिर्फ़ सोशल मीडिया पर पोस्ट डालने तक सीमित न रहें, घर वालों को भी याद दिलाएं।
  • मस्जिद में अगर ख़ुतबा शुरू हो चुका हो, तो बोलना या मुबारकबाद देना मना है; उस वक़्त ख़ामोशी से ख़ुतबा सुनना लाज़िम है।12

आपके सवाल (Short Q&A)

Q1: क्या सिर्फ़ “जुम्मा मुबारक” कहना काफ़ी है?56

सिर्फ़ कहना काफ़ी नहीं है। जुम्मा का हक़ तब अदा होता है जब हम ग़ुस्ल करें, साफ़ कपड़े पहनें, ख़ुश्बू लगाएं और वक़्त पर मस्जिद पहुंचें। मु7बारकबाद एक भाईचा8रे का इज़हार है, असल चीज़ इबादत है।

Q2: जुम्मा की दुआ कब ज़्यादा बेहतर होती है?

असर की नमाज़ के बाद से लेकर मगरिब तक का वक़्त दुआओं की क़ुबूलियत के लिए बहुत ख़ास माना गया है। कोशिश करें कि यह वक़्त गपशप में न गुज़रे।

Q3: क्या जुम्मा की दुआ दूसरों के लिए भी की जा सकती है?

बिल्कुल। जब आप अपने भाई के लिए उसकी पीठ पीछे दुआ करते हैं, तो फ़रिश्ते कहते हैं “आमीन, और तुम्हें भी ऐसा ही मिले।” इसलिए, jumma mubarak dua में सबको शामिल करें।

दुआ और भाईचारे का एहसास

जुम्मा का दिन हमें याद दिलाता है कि हम सब एक उम्मत हैं। जब मस्जिद में सब कंधे से कंधा मिलाकर खड़े होते हैं, तो कोई छोटा या बड़ा नहीं होता। अपनी दुआओं में उन लोगों को ज़रूर याद रखें जो परेशान हैं, बीमार हैं या मुश्किल में हैं। अल्लाह हम सबकी इबादतों को क़ुबूल फ़रमाए।

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