आग से हिफ़ाज़त की दुआ | Aag Se Hifazat Ki Dua

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मुख़्तसर रहनुमाई

आग से हिफ़ाज़त की दुआ

اللَّهُمَّ أَجِرْنِي مِنَ النَّارِ
तलफ़्फ़ुज़:
अल्लाहुम्मा अजिरनी मिनन-नार
तर्जुमा:
ऐ अल्लाह! मुझे आग (के नुक़सान और अज़ाब) से पनाह दे।
मसदर: 
सनन अबी दाऊद: 5079, मुसनद अहमद: 18031 - सहीह हदीस

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इंसानी ज़िंदगी में सुकून और सलामती सबसे बड़ी नेमतों में से एक है। हम अपनी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में, चाहे घर पर हों या बाहर, हमेशा अपनी और अपने अपनों की सलामती चाहते हैं। इस्लाम हमें सिखाता है कि हम अपनी पूरी कोशिश और एहतियात बरतने के साथ-साथ हर मामले में अल्लाह रब्बुल आलमीन की पनाह हासिल करें। आग से हिफ़ाज़त की दुआ असल में अल्लाह पर उस गहरे भरोसे का नाम है, जो इंसान के दिल को डर से आज़ाद कर के उसे रूहानी सुकून अता करता है।


इंसान और हिफ़ाज़त की ज़रूरत

इंसान अपनी फ़ितरत में कमज़ोर है। हम अपने इर्द-गिर्द के माहौल को मुकम्मल तौर पर कंट्रोल नहीं कर सकते। आग जैसी चीज़ें, जो हमारी ज़रूरत भी हैं, कभी-कभी बेकाबू होकर नुक़सान का ज़रिया बन सकती हैं। ऐसे में एक मोमिन का दिल तड़पकर अपने ख़ालिक की तरफ़ मुतवज्जह होता है। हिफ़ाज़त का एहसास हमें सिर्फ़ दुनियावी चीज़ों से नहीं मिलता, बल्कि उस ज़ात के ज़िक्र से मिलता है जो हर चीज़ पर क़ादिर है। जब हम अल्लाह से हिफ़ाज़त मांगते हैं, तो हम अपनी बेबसी का इक़रार करते हैं और उसकी रहमत की छांव में आ जाते हैं।

इस्लाम हिफ़ाज़त और पनाह को कैसे समझता है

इस्लाम में ‘तवक्कुल’ (अल्लाह पर भरोसा) का मफ़हूम बहुत गहरा है। इसका मतलब यह नहीं कि हम अपनी ज़िम्मेदारियों से ग़ाफ़िल हो जाएं, बल्कि यह है कि हम अपनी तरफ़ से पूरी एहतियात बरतें और फिर नतीजा अल्लाह पर छोड़ दें। दुआ का मक़ाम हमारे दीन में बहुत ऊंचा है; इसे ‘इबादत का मग़ज़’ कहा गया है।

जब हम आग से हिफ़ाज़त की दुआ पढ़ते हैं, तो हम सिर्फ़ ज़ुबानी लफ़्ज़ नहीं दोहराते, बल्कि हम अल्लाह से यह दरख़्वास्त करते हैं कि ऐ अल्लाह! हमें हर उस तकलीफ़ से बचा जो हमारे बस से बाहर है। यह दुआ हमें एक ज़हनी इत्मीनान देती है कि हम तन्हा नहीं हैं, बल्कि अल्लाह की रहमत हमारे साथ है।

आग से हिफ़ाज़त के लिए पढ़ी जाने वाली मसनून दुआ

अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने हमें हर मोड़ पर दुआएं सिखाई हैं। हिफ़ाज़त के लिए ज़ैल में दी गई दुआएं निहायत जामे और असरदार हैं। याद रखें कि यह दुआएं अल्लाह की रूहानी पनाह हासिल करने का ज़रिया हैं।

1. आग और अज़ाब से पनाह की दुआ

यह दुआ जहन्नम की आग के साथ-साथ दुनिया की हर तरह की सख़्ती और आग के नुक़सान से बचने की एक जामे इल्तिजा है।

Arabic Dua

اللَّهُمَّ أَجِرْنِي مِنَ النَّارِ

तलफ़्फ़ुज़

अल्लाहुम्मा अजिरनी मिनन-नार

Roman (Hinglish)

Allahumma ajirni minan nar.

तर्जुमा

“ऐ अल्लाह! मुझे आग से महफ़ूज़ रख।”

Masdar (Reference)

(सनन अबी दाऊद: 5079, मुसनद अहमद: 18031 – सहीह हदीस)


2. हर क़िस्म के नुक़सान से हिफ़ाज़त की दुआ

यह दुआ सुबह और शाम पढ़ने की ताकीद की गई है ताकि इंसान अल्लाह के नाम की बरकत से हर तरह की नागहानी आफ़तों और नुक़सान से महफ़ूज़ रहे।

Arabic Dua

بِسْمِ اللَّهِ الَّذِي لَا يَضُرُّ مَعَ اسْمِهِ شَيْءٌ فِي الْأَرْضِ وَلَا فِي السَّمَاءِ وَهُوَ السَّمِيعُ الْعَلِيمُ

तलफ़्फ़ुज़

बिस्मिल्लाहिल्लज़ी ला यदुर्रु मअस्मिही शैउन फ़िल-अर्दि वला फ़िस-समा-इ वहुवस-समीउल अलीम

Roman (Hinglish)

Bismillahilladhi la yadurru ma’asmihi shai’un fil-ardi wa la fis-sama’i wa huwas-sami’ul ‘aleem.

तर्जुमा

“अल्लाह के नाम से (मैं हिफ़ाज़त चाहता हूँ) जिसके नाम के साथ ज़मीन और आसमान की कोई चीज़ नुक़सान नहीं पहुँचा सकती और वह सुनने वाला (और) जानने वाला है।”

Masdar (Reference)

(सनन अबी दाऊद: 5088, तिर्मिज़ी: 3388 – हसन सहीह)


दुआ के साथ एहतियात और तवक्कुल

इस्लाम हमें यह सिखाता है कि दुआ और एहतियात दोनों साथ-साथ चलते हैं। हदीस-ए-मुबारका में आता है कि “पहले ऊंट को बांधो, फिर अल्लाह पर तवक्कुल करो।” इसका मतलब यह है कि घर में आग से बचाव के जो भी ज़रूरी और अक़्ली इंतज़ामात हो सकते हैं, उन्हें पूरी ज़िम्मेदारी के साथ पूरा करना चाहिए।

जब हम एहतियात बरतते हैं, तो हम अल्लाह के दिए हुए अक़्ल और वसाइल का सही इस्तेमाल कर रहे होते हैं। और जब हम दुआ पढ़ते हैं, तो हम यह मान लेते हैं कि तमाम कोशिशों के बावजूद असली हिफ़ाज़त करने वाली ज़ात सिर्फ़ अल्लाह की है। यह तवाज़ुन (balance) एक मुसलमान को डर और खौफ से दूर रखकर एक पुरसुकून रवैया अता करता है।

मुख़्तसर सवाल-जवाब

क्या आग से हिफ़ाज़त की दुआ डर के साथ पढ़नी चाहिए?
नहीं, दुआ हमेशा उम्मीद, अल्लाह पर कामिल यक़ीन और सुकून के साथ पढ़नी चाहिए। डर इंसान को कमज़ोर करता है, जबकि अल्लाह का ज़िक्र दिल को मज़बूत और पुरसुकून बनाता है।

क्या हिफ़ाज़त की दुआ रोज़ाना पढ़ना जाइज़ है?
जी हाँ, सुबह और शाम के अज़कार में हिफ़ाज़त की दुआएं शामिल करना सुन्नत है। यह इंसान के इर्द-गिर्द अल्लाह की रहमत का एक रूहानी हिसार (protection) बना देती हैं।

आख़िरी बात

सलामती और आफ़ियत अल्लाह की बहुत बड़ी अता है। आग से हिफ़ाज़त की दुआ हमें याद दिलाती है कि हम हर लम्हा अपने रब के मोहताज हैं। जब हम इन मसनून दुआओं को अपनी ज़िंदगी का हिस्सा बनाते हैं, तो हमारे दिलों से अनजाना खौफ निकल जाता है और उसकी जगह अल्लाह की पनाह का सुकून ले लेता है। अल्लाह हम सबको, हमारे घरों को और हमारी औलादों को हर तरह के नुक़सान से महफ़ूज़ रखे और हमें अपनी रहमत के साये में जगह अता फ़रमाए। आमीन।