इंसान की पहचान उसकी बातों से होती है। हम क्या कहते हैं और किस अंदाज़ में कहते हैं, यह हमारे अख़लाक़ का आइना होता है। अक्सर लोग अपनी आवाज़ को और अपनी गुफ़्तगू को बेहतर बनाना चाहते हैं ताकि उनकी बात दूसरों के दिलों को सुकून पहुँचाए। Aawaz mein mithas ke liye dua असल में वह ज़रिया है जिससे हम अल्लाह से अपने लफ़्ज़ों में नर्मी और अपनी ज़बान में तासीर माँगते हैं।
आवाज़ और इंसानी असर
हमारी आवाज़ सिर्फ एक आवाज़ नहीं होती, बल्कि यह हमारे मिज़ाज का हिस्सा होती है। जब हम किसी से नर्मी और मिठास के साथ बात करते हैं, तो सामने वाले के दिल में हमारे लिए इज़्ज़त और मोहब्बत पैदा होती है। इसके उलट, अगर आवाज़ में सख़्ती या बद-तहज़ीबी हो, तो सच्ची बात भी कड़वी लगने लगती है।
आवाज़ में मिठास का मतलब यह नहीं है कि इंसान अपनी कुदरती आवाज़ को बदलकर कुछ और बना ले। इसका असल मतलब यह है कि हमारी बातों में अदब हो, हम चीख़-चिल्लाकर बात न करें और हमारे लहजे में ठहराव हो। जब इंसान का दिल साफ़ होता है और उसकी नीयत नेक होती है, तो उसकी आवाज़ में ख़ुद-ब-ख़ुद एक रूहानी सुकून और मिठास आ जाती है।
इस्लाम में गुफ़्तगू और अख़लाक़
दीन-ए-इस्लाम में ज़बान की ज़िम्मेदारी पर बहुत ज़ोर दिया गया है। हमारे प्यारे नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की ज़बान मुबारक से हमेशा मीठे और नर्म लफ़्ज़ ही निकलते थे। कुरआन-ए-पाक में भी अल्लाह तआला ने फ़रमाया है कि लोगों से अच्छी बात कहो।
अच्छी गुफ़्तगू सिर्फ एक हुनर नहीं है, बल्कि यह एक इबादत और सदका भी है। जब हम aawaz mein mithas ke liye dua करते हैं, तो हम असल में अल्लाह से उस अख़लाक़ की तौफ़ीक़ माँग रहे होते हैं जो हमें दूसरों की नज़रों में नहीं, बल्कि अल्लाह की नज़र में मोअज़्ज़िज़ (इज़्ज़त वाला) बना दे। नर्मी और सच्चाई के साथ की गई बात हमेशा दिलों पर असर करती है।
आवाज़ और गुफ़्तगू में बेहतरी के लिए मसनून दुआ
जब हम अपनी ज़बान की सख़्ती को दूर करना चाहते हैं और चाहते हैं कि हमारी बात दूसरों को आसानी से समझ आए और उसमें मिठास हो, तो हमें वही दुआ माँगनी चाहिए जो हज़रत मूसा (अलैहिस्सलाम) ने अल्लाह तआला से माँगी थी। यह दुआ कुरआन-ए-करीम की सबसे मुअसर और पाक दुआओं में से एक है।
दुआ
رَبِّ اشْرَحْ لِي صَدْرِي وَيَسِّرْ لِي أَمْرِي وَاحْلُلْ عُقْدَةً مِّن لِّسَانِي يَفْقَهُوا قَوْلِي
तलफ़्फ़ुज़ (Hindi):
रब्बि-शरह ली सदरी, व यस्सिर ली अमरी, वह-लुल उ़क़दतम-मिल-लिसानी, यफ़क़हू क़ौली।
तलफ़्फ़ुज़ (Roman Hinglish):
Rabbi-shrah li sadri, wa yassir li amri, wah-lul ‘uqdatam-mil-lisani, yafqahu qawli.1
तर्जुमा:
“ऐ मेरे रब! मेरे सीने को मेरे लिए खोल दे, और मेरे काम को मेरे लिए आसान कर दे, और मेरी ज़बान की गिरह (गाँठ) खोल दे ताकि लोग मेरी बात समझ सकें।”
माख़ज़ (Source):
कुरआन-ए-पाक, सूरह ता-हा (Surah Taha), आयत 25–28
दुआ और अमल का ताल्लुक़
दुआ एक बहुत बड़ी ताक़त है, लेकिन इसके साथ-साथ हमें अपने अमल पर भी ध्यान देना होता है। अल्लाह से aawaz mein mithas ke liye dua माँगने के साथ हमें इन बातों पर ग़ौर करना चाहिए:
- नीयत की पाकीज़गी: जब दिल में किसी के लिए नफ़रत या तक़ब्बुर (घमंड) नहीं होता, तो आवाज़ में अपने आप नर्मी आ जाती है। अपनी नीयत को हमेशा साफ़ रखें कि आप जो भी बोलें, वह दूसरों को तकलीफ़ पहुँचाने के लिए न हो।
- अदब और नर्मी: बोलने का अंदाज़ ऐसा रखें जैसे आप खुद सुनना पसंद करते हैं। धीमी आवाज़ और ठहराव के साथ बात करना सुन्नत है।
- कोशिश और सब्र: अगर आपका मिज़ाज सख़्त है, तो दुआ के साथ-साथ यह कोशिश करें कि ग़ुस्से की हालत में ख़ामोश रहें। धीरे-धीरे आपकी ज़बान और लहजे में तब्दीली आने लगेगी।
याद रखें कि आवाज़ की खूबसूरती सिर्फ उसकी बनावट में नहीं, बल्कि उसमें मौजूद सच्चाई और नर्मी में होती है। यह दुआ हमें ज़हनी सुकून देती है और हमारी बात में वह तासीर पैदा करती है जो दिलों को जोड़ती है।
दो मुख़्तसर सवाल
1. क्या आवाज़ में मिठास सिर्फ दुआ से आती है?
दुआ अल्लाह से मदद माँगने का एक ज़रिया है। अल्लाह हमारी दुआओं से हमारे दिल और लहजे को बदल सकता है, लेकिन इसके साथ हमें ख़ुद भी अपने अख़लाक़ को सुधारने की कोशिश करनी पड़ती है। दुआ और मेहनत मिलकर ही इंसान की गुफ़्तगू में बेहतरी लाते हैं।
2. अगर बोलने का अंदाज़ सख़्त हो, तो क्या धीरे-धीरे बदला जा सकता है?
जी हाँ, बिल्कुल। इंसान की आदतें बदली जा सकती हैं। जब हम मुसलसल अल्लाह से दुआ करते हैं और होशमंदी के साथ अपनी ज़बान पर कंट्रोल रखते हैं, तो वक़्त के साथ हमारे लहजे की सख़्ती नर्मी और मिठास में बदल जाती है।
आख़िरी बात
आवाज़ की मिठास और लहजे का अदब अल्लाह की तरफ़ से एक बहुत बड़ी नेमत है। हम अपनी बातों के ज़रिए किसी के टूटते हुए दिल को जोड़ भी सकते हैं और किसी को हमेशा के लिए ख़ुद से दूर भी कर सकते हैं। अपनी ज़बान को अल्लाह के ज़िक्र और नर्म बातों से तर रखें।
दुआ करें कि अल्लाह तआला हमारे लफ़्ज़ों में पाकीज़गी और आवाज़ में वह नर्मी अता फ़रमाए जो सुन्नत के मुताबिक़ हो। अल्लाह हम सबको बेहतरीन अख़लाक़ और मीठी ज़बान वाला बनाए।


