अमानत इस्लाम का एक ऐसा सुतून है जो इंसान के किरदार और उसके ईमान की गहराई को ज़ाहिर करता है। ‘सय्यदुल इस्तिग़फ़ार’ को सबसे अफ़ज़ल और आला दुआ माना जाता है। इसके अलावा एक छोटी और जामे दुआ भी है जो आम तौर पर कसरत से पढ़ी जाती है। अमानत की हिफ़ाज़त का असली मक़सद सिर्फ चीज़ों को महफ़ूज़ रखना नहीं, बल्कि उस भरोसे को कायम रखना है जो अल्लाह और उसके बंदों ने हम पर किया है।
Amanat Ka Matlab Kya Hai
अमानत सिर्फ किसी की दी हुई चीज़ को संभाल कर रख लेना ही नहीं है, बल्कि यह एक मुकम्मल ज़िम्मेदारी (zimmedari) है। इसमें लोगों के राज़, उनकी दी हुई सलाह, दफ़्तर की ज़िम्मेदारियां, और यहां तक कि हमारे अपने जिस्म और वक़्त भी शामिल हैं। अगर कोई शख्स आप पर भरोसा करके अपनी कोई बात बताता है, तो वह बात आपके पास एक अमानत है।
दीन-ए-इस्लाम में अमानत का सीधा ताल्लुक़ इंसान के ईमान से जोड़ा गया है। अमानत की हिफ़ाज़त का मतलब है उस भरोसे (bharosa) की हिफ़ाज़त करना जो समाज के निज़ाम को मज़बूत बनाता है। यह एक ऐसा हक़ है जिसे अदा करना इंसानियत की पहचान है।
Amanat Aur Insaan Ka Imtihaan
दुनिया की ज़िंदगी में अमानत असल में इंसान का इम्तिहान है। अल्लाह ताला ने इंसान को ज़मीन पर अपना नायब बनाया और उसे कई तरह की ज़िम्मेदारियां सौंपीं। जब हम किसी काम का ज़िम्मा लेते हैं या कोई हमसे मदद की उम्मीद रखता है, तो वहां हमारी ईमानदारी की परख होती है।
अमानत की अदायगी में कोताही करना या खयानत करना सिर्फ एक समाजी बुराई नहीं है, बल्कि यह अल्लाह के सामने जवाब-देही का मामला भी है। एक सच्चा मोमिन वही है जिसके हाथ और ज़बान से दूसरे महफ़ूज़ रहें और जिसकी ईमानदारी पर सबको कामिल यक़ीन हो। यह एहसास कि अल्लाह हमें देख रहा है, हमें अमानत को सही तरह निभाने की तौफ़ीक़ देता है।
Amanat Ki Hifazat Ke Liye Masnoon Duas
अमानत की ज़िम्मेदारी को सही तरीक़े से पूरा करने और खयानत से बचने के लिए सुन्नत में बहुत प्यारी दुआएं मौजूद हैं। ये दुआएं हमें रूहानी सुकून और ईमानदारी पर डटे रहने की ताक़त देती हैं।
Arabic Dua
اللَّهُمَّ إِنِّي أَعُوذُ بِكَ مِنَ الْجُوعِ، فَإِنَّهُ بِئْسَ الضَّجِيعُ، وَأَعُوذُ بِكَ مِنَ الْخِيَانَةِ، فَإِنَّهَا بِئْسَتِ الْبِطَانَةُ
तलफ़्फ़ुज़
अल्लाहुम्मा इन्नी अऊज़ु बिका मिनल जूइ, फ़ इन्नहू बिअसद-दजीउ, व अऊज़ु बिका मिनल खियानती, फ़ इन्नहा बिअसतुल बितानह।
Roman (Hinglish)
Allahumma inni a’udhu bika minal joo’i, fa-innahu bi’sad-dajee’u, wa a’udhu bika minal khiyanati, fa-innaha bi’satil bitanah.
तर्जुमा
ऐ अल्लाह, मैं भूख से तेरी पनाह मांगता हूं क्योंकि वह लेटने का बुरा साथी है और मैं खयानत से तेरी पनाह मांगता हूं क्योंकि वह बदतरीन अंदरूनी सिफ़त है।
Masdar
Sunan Abi Dawood (Sahih)
Arabic Dua
اللَّهُمَّ إِنِّي أَسْتَوْدِعُكَ دِينِي وَأَمَانَتِي وَخَوَاتِيمَ عَمَلِي
तलफ़्फ़ुज़
अल्लाहुम्मा इन्नी अस्तौदि-उका दीनी व अमानती व खवाती-म अमली।
Roman (Hinglish)
Allahumma inni astawdi’uka deeni wa amanati wa khawatima ‘amali.
तर्जुमा
ऐ अल्लाह, मैं अपनी दीनदारी, अपनी अमानत और अपने कामों के नतीजे को तेरी हिफ़ाज़त में देता हूं।
Masdar
Sunan Abi Dawood / Musnad Ahmad (Sahih)
Dua Ke Saath Apni Zimmedari
सिर्फ दुआ कर लेना काफ़ी नहीं है, बल्कि दुआ के साथ-साथ अमली कोशिश भी ज़रूरी है। अमानत की हिफ़ाज़त के लिए सबसे पहले अपनी नीयत को साफ़ रखना चाहिए। जब इंसान की नीयत में खोट नहीं होता, तो अल्लाह की मदद उसके साथ शामिल हो जाती है।
हकीकी ईमानदारी यह है कि हम अपने रवैये में तब्दीली लाएं। अगर हम किसी जगह मुलाज़िम (employee) हैं, तो हमारा वक़्त और हमारी मेहनत वहां की अमानत है। अगर हम कारोबार करते हैं, तो गाहक का भरोसा हमारी अमानत है। अल्लाह पर अटूट भरोसा रखते हुए जब हम अपनी पूरी कोशिश करते हैं, तब हमारी दुआएं बारगाह-ए-इलाही में क़बूलियत पाती हैं।
Rozmarrah Zindagi Mein Amanat Ka Ehsaas
हमारी रोज़ाना की ज़िंदगी अमानतों से घिरी हुई है। नौकरी के दौरान दफ़्तर के वक़्त को ज़ाया न करना, मालिक की दी हुई सहूलियतों का सही इस्तेमाल करना और काम को पूरी मेहनत से अंजाम देना अमानत है। इसी तरह घर के मामलात में एक-दूसरे के हक़ूक़ का ख्याल रखना और बच्चों की सही तरबियत करना भी एक बड़ी अमानत है।
कारोबार में नाप-तोल सही रखना और चीज़ की कमियां न छुपाना अमानतदारी की बेहतरीन मिसाल है। जब एक इंसान यह समझ लेता है कि उसे हर छोटी-बड़ी चीज़ का हिसाब देना है, तो उसकी ज़िंदगी में सुकून और इत्मीनान पैदा होता है। अमानत का सही अहसास हमें समाज का एक नेक और भरोसेमंद हिस्सा बनाता है।
मुख़्तसर सवाल-जवाब
क्या सिर्फ पैसा ही अमानत होता है?
जी नहीं, अमानत का मतलब बहुत वसी है। किसी का बताया हुआ राज़, आपकी नौकरी की ज़िम्मेदारियां, आपके पास मौजूद वक्त, और लोगों का आप पर भरोसा, यह सब अमानत के दायरे में आते हैं।
अगर अमानत का बोझ महसूस हो तो क्या करें?
अगर आपको ज़िम्मेदारी भारी महसूस हो, तो अल्लाह से तौफ़ीक़ और सब्र की दुआ करें। अपनी नीयत को ताज़ा करें कि आप यह काम अल्लाह की रज़ा के लिए कर रहे हैं। ईमानदारी से अपनी कोशिश जारी रखें और अल्लाह पर भरोसा रखें, वह मुश्किलों को आसान कर देता है।
आख़िरी बात
अमानत की हिफ़ाज़त दरअस्ल हमारे ईमान की हिफ़ाज़त है। जब हम ईमानदारी का रास्ता अपनाते हैं, तो अल्लाह की रहमत हमारे काम और हमारे दिल के सुकून में इज़ाफ़ा कर देती है। एक मोमिन की शान यही है कि वह हर हाल में अपने वादों को पूरा करे और दूसरों के भरोसे को ठेस न पहुंचाए। अल्लाह से दुआ है कि वह हमें अपनी तमाम अमानतों और ज़िम्मेदारियों को सही तरीक़े से निभाने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए और हमें खयानत के हर रास्ते से महफ़ूज़ रखे।


