नमाज़ हर मुसलमान के लिए अल्लाह की इबादत का सबसे ख़ास ज़रिया है। नमाज़ में पढ़ी जाने वाली हर चीज़ की अपनी एक अलग अहमियत होती है। Attahiyat dua namaz ka aham hissa है, जिसे तशह्हुद भी कहा जाता है। यह दुआ नमाज़ की हर दूसरी और आख़िरी रकअत में बैठकर पढ़ी जाती है।
हमारे प्यारे नबी हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने अपने सहाबा को यह दुआ वैसे ही सिखाई थी, जैसे वो क़ुरान की कोई सूरत सिखाते थे। हिंदुस्तान में अक्सर लोग इसे हिंदी में सीखना चाहते हैं ताकि वो इसका मतलब समझ सकें और नमाज़ में ख़ुशू (ध्यान) पैदा कर सकें। यहाँ हम आपको हदीस से साबित सही अत्तहियात बता रहे हैं।
अत्तहियात दुआ (सही तशह्हुद)
यह वही दुआ है जो हज़रत अब्दुल्लाह बिन मसूद रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है और इसे हनफ़ी मस्लक समेत ज़्यादातर उलमा सही मानते हैं।
التَّحِيَّاتُ لِلَّهِ وَالصَّلَوَاتُ وَالطَّيِّبَاتُ، السَّلَامُ عَلَيْكَ أَيُّهَا النَّبِيُّ وَرَحْمَةُ اللَّهِ وَبَرَكَاتُهُ، السَّلَامُ عَلَيْنَا وَعَلَى عِبَادِ اللَّهِ الصَّالِحِينَ، أَشْهَدُ أَنْ لَا إِلَهَ إِلَّا اللَّهُ وَأَشْهَدُ أَنَّ مُحَمَّدًا عَبْدُهُ وَرَسُولُهُ
अत्तहिय्यातु लिल्लाहि वस्सलवातु वत्तय्यिबातु, अस्सलामु अलैका अय्युहन नबिय्यु व रहमतुल्लाहि व बरकातुहु, अस्सलामु अलैना व अला इबादिल्लाहिस सालिहीन, अशहदु अन ला इलाहा इल्लल्लाहु व अशहदु अन्न मुहम्मदान अब्दुहु व रसूलुहु
हिंदी तर्जुमा (मतलब)
तमाम ज़ुबानी इबादतें (तारीफ़ें), तमाम बदनी इबादतें (नमाज़ें) और तमाम माली इबादतें (सदक़े वगैरह) अल्लाह ही के लिए हैं।
ऐ नबी! आप पर सलाम हो, और अल्लाह की रहमत और बरकतें हों।
हम पर और अल्लाह के नेक बंदों पर सलाम हो।
मैं गवाही देता हूँ कि अल्लाह के सिवा कोई माबूद नहीं, और मैं गवाही देता हूँ कि हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम अल्लाह के बंदे और उसके रसूल हैं।
माख़ज़ (सोर्स)
यह दुआ सही बुखारी (हदीस 1202) और सही मुस्लिम (हदीस 402) से साबित है।
अत्तहियात दुआ की फ़ज़ीलत
अत्तहियात दुआ नमाज़ की जान मानी जाती है। इसमें बंदा तीन बड़ी बातें करता है:
- अल्लाह की हम्द-ओ-सना (तारीफ़)।
- नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पर सलाम भेजना।
- अल्लाह की वहदानियत (तौहीद) और रिसालत की गवाही देना।
हदीस में आता है कि जब बंदा “अस्सलामु अलैना व अला इबादिल्लाहिस सालिहीन” कहता है, तो यह सलाम ज़मीन और आसमान के हर नेक बंदे तक पहुँच जाता है। इसलिए इस दुआ को पढ़ते वक़्त अल्फ़ाज़ पर ध्यान देना ज़रूरी है।
बुज़ुर्गों के मुताबिक, यह दुआ हमें शब-ए-मेराज की याद दिलाती है जब नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम अल्लाह तआला से मिले थे। यह नमाज़ में अल्लाह से गुफ़्तगू का एक बेहतरीन ज़रिया है।
अत्तहियात कब और कैसे पढ़ें?
नमाज़ सही होने के लिए ज़रूरी है कि तशह्हुद को सही तरीक़े और अदब से पढ़ा जाए।
- क़ायदा (बैठना): जब आप दो रकअत पूरी करके या आख़िरी रकअत में बैठते हैं, तो दोनों हाथ घुटनों पर रखें। उंगलियां सीधी क़िब्ला की तरफ़ हों।
- पढ़ने का तरीक़ा: बहुत तेज़ी में न पढ़ें। हर लफ़्ज़ को समझ कर और ठहर कर अदा करें।
- उंगली उठाना (इशारा): जब आप “अशहदु अन ला इलाहा” पर पहुँचें, तो दायें हाथ की शहादत की उंगली उठाएं और “इल्लल्लाहु” पर वापस नीचे रख लें। यह इस बात का इक़रार है कि अल्लाह एक है।
- कब पढ़ें:
- 2 रकअत वाली नमाज़ (फ़ज्र): एक बार आख़िर में।
- 3 या 4 रकअत वाली नमाज़ (ज़ुहर, अस्र, मगरिब, ईशा): दो बार (पहली बार दूसरी रकअत के बाद, और फिर आख़िरी रकअत में)।
अत्तहियात पढ़ने के फ़ायदे
- नमाज़ की तकमील: इसके बिना नमाज़ पूरी नहीं होती।
- ईमान की ताज़गी: हर नमाज़ में शहादत दोहराने से ईमान मज़बूत होता है।
- सुकून: अल्लाह और उसके रसूल का ज़िक्र दिल को राहत देता है।
- सुन्नत पर अमल: यह नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का सिखाया हुआ तरीक़ा है, जिस पर अमल करने से सवाब मिलता है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
- अगर अत्तहियात पढ़ना भूल जाएं तो क्या करें?
अगर आप भूल कर खड़े हो गए हैं, तो नमाज़ के आख़िर में सजदा-ए-सह्व (भूल-चूक का सजदा) करना होगा। इससे नमाज़ हो जाएगी। - क्या औरतें भी यही अत्तहियात पढ़ेंगी?
जी हाँ, मर्द और औरत दोनों के लिए दुआ के अल्फ़ाज़ बिल्कुल एक ही हैं। - क्या हम इसे हिंदी में पढ़ सकते हैं?
नमाज़ में अरबी में ही पढ़ना ज़रूरी है। हिंदी या इंग्लिश का इस्तेमाल सिर्फ़ सीखने और समझने के लिए करें। जब याद हो जाए, तो अरबी में ही अदा करें ताकि नमाज़ सही हो।
आख़िरी बात
अत्तहियात दुआ नमाज़ का एक बहुत ही ख़ूबसूरत हिस्सा है जो हमें सीधा अल्लाह और उसके रसूल से जोड़ता है। कोशिश करें कि “अत्तहिय्यातु लिल्लाहि…” पढ़ते वक़्त आपका ध्यान सिर्फ़ अल्लाह की तरफ़ हो।
अल्लाह तआला से दुआ है कि वो हम सबकी नमाज़ों को क़ुबूल फ़रमाए और हमें दीन की सही समझ दे। आमीन।


