शादी के कुछ साल बाद जब घर की खामोशी गहरी होने लगती है, तो इंसान के दिल में कई अनकहे सवाल सर उठाने लगते हैं। कभी-कभी अपनों की नजरें और कभी तन्हाई में खुद की सोच दिल पर बोझ बन जाती है। यह इंतज़ार, यह ‘ख़ामोश दर्द’ और दुआ के लिए उठे हुए हाथों की बेकरारी—इसे सिर्फ वही समझ सकता है जो इस राह से गुजर रहा हो।
आपकी इस चाहत और इस इंतज़ार में दुआ इंडिया आपके साथ है। हम जानते हैं कि यह सिर्फ एक तमन्ना नहीं, बल्कि रूह की एक पुकार है।
इस्लाम और औलाद का फैसला
इस्लाम में औलाद को अल्लाह की एक अज़ीम नेमत और ‘अता’ माना गया है। कुरआन-ए-करीम हमें सिखाता है कि किसी को बेटे देना, किसी को बेटियां देना, या किसी को आज़माना—यह सब खालिक की हिकमत और उसके फैसले पर मुनहसिर है। देर होने का मतलब यह हरगिज़ नहीं कि अल्लाह नाराज़ है, बल्कि कभी-कभी यह सब्र की आज़माइश और अल्लाह से और करीब होने का ज़रिया होता है।
अल्लाह के फैसले में यकीन रखना ही मोमिन का सुकून है।
Aulad Hone Ki Dua
जब हम औलाद की तलब करते हैं, तो हमें उन अंबिया-ए-किराम की याद आती है जिन्होंने बुढ़ापे और नामुनासिब हालात में भी अल्लाह की रहमत से उम्मीद नहीं छोड़ी थी।
1. हज़रत ज़करिया (अलैहिस्सलाम) की दुआ
यह दुआ उस वक्त मांगी गई थी जब ज़ाहिरी तौर पर असबाब खत्म हो चुके थे, लेकिन अल्लाह की कुदरत पर मुकम्मल यकीन था।
رَبِّ لَا تَذَرْنِي فَرْدًا وَأَنتَ خَيْرُ الْوَارِثِينَ
तलफ़्फ़ुज़: रब्बी ला तज़रनी फ़रदंव-व-अंता खैरुल वारिसीन
(Rabbi la tazarni fardan wa anta khairul wariseen)
तर्जुमा: “ऐ मेरे रब! मुझे अकेला न छोड़ और तू सबसे बेहतर वारिस है।”
सियाक-ओ-सबक़: सूरह अल-अंबिया, आयत नंबर 89
2. नेक और सालेह औलाद की दुआ
यह दुआ नेक नस्ल और पाक दामन औलाद की दरख्वास्त के लिए बेहतरीन है।
رَبِّ هَبْ لِي مِن لَّدُنكَ ذُرِّيَّةً طَيِّبَةً ۖ إِنَّكَ سَمِيعُ الدُّعَاءِ
तलफ़्फ़ुज़: रब्बी हब ली मिल लदुनका ज़ुर्रिय्यतन तय्यिबह, इन्नका समीउद दुआ
(Rabbi hab li mil ladunka zurriyyatan tayyibatan, innaka samee’ud du’aa)
तर्जुमा: “ऐ मेरे रब! मुझे अपने पास से नेक औलाद अता फरमा, बेशक तू दुआ सुनने वाला है।”
सियाक-ओ-सबक़: सूरह आले-इमरान, आयत नंबर 38
दुआ के साथ इख़्लाक़ और सब्र
दुआ सिर्फ लफ़्ज़ों का नाम नहीं, बल्कि दिल की कैफियत का नाम है। जब आप ये दुआएं पढ़ें, तो इन बातों का ख्याल रखें:
- हुस्न-ए-ज़न बिल्लाह: अल्लाह की ज़ात से हमेशा अच्छी उम्मीद रखें कि वह जो करेगा, उसमें हमारी बेहतरी होगी।
- तवक्कुल: अपनी कोशिशें जारी रखें लेकिन भरोसा सिर्फ अल्लाह की ज़ात पर रखें।
- इस्तग़फ़ार की कसरत: अल्लाह से माफी मांगते रहना रहमत के दरवाज़े खोलता है।
- अदब: दुआ मांगते वक्त दिल में आज़िज़ी और यकीन रखें, जल्दबाज़ी न करें।
अगर देर हो रही हो तो?
इंसानी ज़हन में अक्सर यह ख्याल आता है कि “क्या मेरी दुआ में कोई कमी है?” या “क्या अल्लाह मुझसे नाराज़ है?”
याद रखिए, अल्लाह की खामोशी का मतलब इंकार नहीं होता। वह हमारे जज्बात से वाकिफ है। कुरआन में हज़रत ज़करिया और हज़रत इब्राहिम (अलैहिस्सलाम) की मिसालें हमें बताती हैं कि अल्लाह के यहाँ कोई भी चीज़ नामुमकिन नहीं है। अगर देर हो रही है, तो शायद अल्लाह आपको और ज़्यादा अजर देना चाहता है या किसी बड़े इम्तिहान से गुज़ार कर आपकी रूह को मज़बूत कर रहा है।
सवालात और जवाबात (Q&A)
क्या ये दुआएं मियां-बीवी दोनों साथ पढ़ सकते हैं?
जी हां, बेहतर यह है कि दोनों मिलकर अल्लाह से रुजू करें। एक-दूसरे का सहारा बनें और साथ मिलकर दुआ मांगें।
क्या हर नमाज़ के बाद पढ़ना बेहतर है?
नमाज़ के बाद का वक्त दुआ की कुबूलियत का होता है, इसलिए हर फ़र्ज़ नमाज़ के बाद और तहज्जुद के वक्त इन्हें पढ़ना बहुत मुफीद है।
क्या सिर्फ एक ही दुआ पढ़ना काफी है?
आप इनमें से कोई भी एक या दोनों दुआएं पढ़ सकते हैं। असल चीज़ तादाद नहीं बल्कि आपके दिल का खुलूस और यकीन है।
उम्मीद और भरोसे की राह
औलाद की चाहत में किया गया इंतज़ार इबादत की एक शक्ल है। जब आप रात की तन्हाई में रोकर अल्लाह को पुकारते हैं, तो वह पुकार बेकार नहीं जाती। यकीन और सब्र का दामन थामे रखें। अल्लाह की रहमत बहुत वसीअ है, और वह अपने बंदों के टूटे हुए दिलों को जोड़ना जानता है।

