इंसान अपनी फ़ितरत में कमज़ोर पैदा किया गया है। ज़िंदगी के सफ़र में कई बार हम ऐसी आदतों का शिकार हो जाते हैं जो न सिर्फ हमारे अख़लाक़ को मुतासिर करती हैं, बल्कि हमारे ईमान और नफ़्स पर काबू को भी कमज़ोर कर देती हैं। इस्लाम हमें सिखाता है कि इंसान से ग़लती होना मुमकिन है, लेकिन सबसे बेहतर वह है जो अपनी ग़लती को समझे और उसकी इस्लाह की कोशिश करे।
Buri Aadatein Aur Insaan Ki Kamzori
आदतें एक दिन में नहीं बनतीं और न ही ये एक दिन में खत्म होती हैं। अक्सर हम अपनी किसी ग़लत आदत को छोड़ना चाहते हैं, नीयत भी करते हैं, लेकिन कुछ वक़्त बाद फिर उसी मोड़ पर खड़े होते हैं। यह कशमकश इंसान को ज़हनी तौर पर थका देती है। यहाँ यह समझना ज़रूरी है कि बार-बार गिरना आपकी नाकामी नहीं है, बल्कि गिर कर दोबारा न उठना असल मसला है। अल्लाह तआला हमारी नीयत और हमारी कोशिशों को देखता है, न कि सिर्फ हमारे नतीजों को। जब तक आपके दिल में अपनी इस्लाह की तड़प है, तब तक बेहतरी के दरवाज़े खुले हैं।
Islam Aadaton Ko Kaise Sudharta Hai
इस्लाम में तब्दीली का रास्ता सख़्ती या शर्मिंदगी का नहीं, बल्कि सब्र और दुआ का है। नफ़्स की तरबियत एक तवील अमल है जिसमें इंसान को अपने आप पर ज़बरदस्ती करने के बजाय नरमी से काम लेना चाहिए। अल्लाह की रहमत बहुत वसीअ है; वह हमें अपनी आदतों से लड़ने के लिए अकेला नहीं छोड़ता। जब हम दुआ के ज़रिए अल्लाह से मदद माँगते हैं, तो हमारे अंदर वह रूहानी कूवत पैदा होती है जो हमें बुरी चीज़ों से दूर रहने का हौसला देती है। इस्तेक़ामत (जमे रहना) और धीरे-धीरे कोशिश ही वह ज़रिया है जिससे बड़ी से बड़ी आदत बदली जा सकती है।
Buri Aadaton Se Bachne Ke Liye Masnoon Duas
उत्तर भारत और दुनिया भर के मुसलमानों में बुरी आदतों से तौबा और हिफ़ाज़त के लिए ‘सय्यदुल इस्तिग़फ़ार’ को सबसे अफ़ज़ल और मुस्तनद माना गया है। यह दुआ न सिर्फ पिछले गुनाहों की माफ़ी दिलाती है बल्कि नफ़्स की बुराई से पनाह भी देती है।
Arabic Dua
اللَّهُمَّ أَنْتَ رَبِّي لاَ إِلَهَ إِلاَّ أَنْتَ، خَلَقْتَنِي وَأَنَا عَبْدُكَ، وَأَنَا عَلَى عَهْدِكَ وَوَعْدِكَ مَا اسْتَطَعْتُ، أَعُوذُ بِكَ مِنْ شَرِّ مَا صَنَعْتُ، أَبُوءُ لَكَ بِنِعْمَتِكَ عَلَيَّ، وَأَبُوءُ لَكَ بِذَنْبِي فَاغْفِرْ لِي فَإِنَّهُ لاَ يَغْفِرُ الذُّنُوبَ إِلاَّ أَنْتَ
तलफ़्फ़ुज़
अल्लाहुम्मा अंता रब्बी ला इलाहा इल्ला अंता, ख़लक़्तनी व अना अबदुका, व अना अला अहदिका व वअ़दिका मस्तातअ़्तु, अऊज़ु बिका मिन शर्री मा सनअ़्तु, अबू-उ लका बि निअ़्मतिका अ़लैया, व अबू-उ लका बिज़न्बी फ़ग़फ़िरली फ़इन्नहू ला यग़फ़िरुज़ ज़ुनूबा इल्ला अंता।
Roman (Hinglish)
Allahumma anta Rabbi la ilaha illa anta, khalaqtani wa ana ‘abduka, wa ana ‘ala ‘ahdika wa wa’dika mastata’tu, a’udhu bika min sharri ma sana’tu, abu’u laka bi ni’matika ‘alayya, wa abu’u laka bidhanbi faghfirli fa-innahu la yaghfirudh-dhunuba illa anta.
तर्जुमा
ए अल्लाह! तू ही मेरा रब है, तेरे सिवा कोई माबूद नहीं। तूने ही मुझे पैदा किया और मैं तेरा बंदा हूँ। मैं अपनी ताकत के मुताबिक तेरे अहद और वादे पर कायम हूँ। मैंने जो भी बुराइयां (बुरी आदतें) की हैं, उनके शर से तेरी पनाह माँगता हूँ। मुझ पर तेरी जो नेमतें हैं उनका इक़रार करता हूँ और अपने गुनाहों का एतराफ़ करता हूँ, बस तू मुझे माफ़ कर दे, क्योंकि तेरे सिवा कोई गुनाहों को माफ़ करने वाला नहीं।
Masdar
सहीह बुखारी: 6306
Dua Ke Saath Andar Ki Koshish
“Bure aadaton se bachne ki dua” सिर्फ ज़बान से अदा किए जाने वाले अलफ़ाज़ नहीं हैं, बल्कि यह अल्लाह के साथ एक अहद है। दुआ हमारे इरादों को मज़बूत करती है। जब हम सच्चे दिल से दुआ करते हैं, तो हमारे दिल में उस बुरी आदत के लिए बेज़ारी पैदा होने लगती है। दुआ के साथ-साथ यह भी ज़रूरी है कि हम अपनी नीयत को साफ़ रखें और अल्लाह पर मुकम्मल भरोसा रखें। अगर कभी इरादा डगमगाने लगे, तो यह याद रखें कि अल्लाह आपकी हर छोटी कोशिश को देख रहा है और वह आपके साथ है।
Rozmarrah Zindagi Mein Behtari Ka Safar
बेहतरी का सफ़र हमेशा छोटे क़दमों से शुरू होता है। अपनी रोज़ाना की ज़िंदगी में दुआ के लिए खास लम्हे निकालें, जैसे नमाज़ के बाद या रात को सोने से पहले। जब भी ज़हन में पुरानी आदत का ख़्याल आए, फ़ौरन अल्लाह को याद करें और ऊपर दी गई दुआ पढ़ें। यह ज़रूरी नहीं कि आप रातों-रात बदल जाएं, बल्कि ज़रूरी यह है कि आप अपनी कोशिशों में मुस्तकिल रहें। अपनी छोटी-छोटी कामयाबियों पर अल्लाह का शुक्र अदा करें और मायूसी को अपने करीब न आने दें।
मुख़्तसर सवाल-जवाब
क्या सिर्फ दुआ से बुरी आदत छूट सकती है?
दुआ अल्लाह की मदद हासिल करने का सबसे बड़ा ज़रिया है, लेकिन इसके साथ अपनी तरफ से मुमकिन कोशिश करना भी सुन्नत है। दुआ हमारे इरादे को ज़ोर देती है और अल्लाह के फ़ज़ल से रास्ते आसान हो जाते हैं।
अगर फिर से ग़लती हो जाए तो क्या करें?
अगर पुरानी आदत दोबारा लौट आए, तो मायूस होकर कोशिश न छोड़ें। दोबारा अल्लाह की तरफ रुजू करें, तौबा करें और नए सिरे से दुआ शुरू करें। अल्लाह तआला बार-बार तौबा करने वालों को पसंद फरमाता है।
आख़िरी बात
अल्लाह की रहमत से कभी मायूस नहीं होना चाहिए। वह “ग़फ़ूरुर रहीम” है, जो अपने बंदों की तड़प और उनकी मेहनत को ज़ाया नहीं करता। बुरी आदतों से पीछा छुड़ाना एक जिहाद है, और इस रास्ते में होने वाली हर तकलीफ़ पर आपको अजर मिलता है। आज का दिन एक नई शुरुआत का मौका है। अल्लाह से हिदायत और इस्तेक़ामत मांगते रहें, वह यक़ीनन आपके लिए बेहतरी के रास्ते खोल देगा और आपके नफ़्स को पाकीज़गी अता फरमाएगा।

