इंसानी ज़िंदगी आज़माइशों और राहतों का एक सिलसिला है। कभी हम सेहत की नेमत से मालामाल होते हैं, तो कभी छोटी-बड़ी तकलीफ़ें हमें हमारी कमज़ोरी का एहसास दिलाती हैं। इन्हीं तकलीफ़ों में से एक दांत का दर्द (Toothache) है, जो अचानक उठ सकता है और इंसान की रोज़मर्रा की ज़िंदगी को मुतास्सिर कर सकता है।
जब ऐसी कोई जिस्मानी तकलीफ़ पेश आती है, तो एक मोमिन का ज़हन सबसे पहले अपने रब की तरफ़ मुतवज्जह होता है। दुआ एक ऐसा रूहानी सहारा है जो बेचैनी के वक़्त दिल को सुकून और ज़हन को सब्र अता करता है। duaindia.com के इस म़ज़मून में हम सुन्नत की रोशनी में उस दुआ और तरीक़े का ज़िक्र करेंगे, जिसे जिस्मानी दर्द के वक़्त पढ़ना साबित है।
Daant Dard Aur Rozmarrah Pareshani
दांत का दर्द अक्सर अचानक और बड़ी शिद्दत के साथ आता है। यह एक ऐसी तकलीफ़ है जो न सिर्फ़ खाने-पीने में दुश्वारी पैदा करती है, बल्कि इसके साथ आने वाली कसक इंसान को बेज़ार कर देती है। इस वक़्त इंसान बेसाख़्ता सुकून की तलाश करता है।
हक़ीक़त यह है कि बीमारी और तकलीफ़ अल्लाह की तरफ़ से एक आज़माइश होती है, और यह हमें इस बात का एहसास दिलाती है कि हम हर हाल में अल्लाह के मोहताज हैं। दांत के दर्द जैसी आम तकलीफ़ में भी जब बंदा अल्लाह को याद करता है, तो उसे एक ज़हनी और रूहानी इत्मीनान हासिल होता है। यह एहसास कि अल्लाह हमारे हाल से वाक़िफ़ है और वही तकलीफ़ों को टालने वाला है, इंसान के अंदर सब्र (Patience) पैदा करता है।
Takleef Ke Waqt Islam Kya Sikhata Hai
इस्लाम एक मुकम्मल दीन है जो हमें ज़िंदगी के हर मोड़ पर रहनुमाई देता है। जब भी हमें कोई जिस्मानी दुख या तकलीफ़ पहुँचे, तो इस्लाम हमें दो अहम चीज़ों की तालीम देता है:
- सब्र और रज़ा: तकलीफ़ पर शोर मचाने के बजाय सब्र करना और इसे अल्लाह की मर्जी समझना। हदीस के मुताबिक़, एक मोमिन को पहुँचने वाली हर छोटी-बड़ी तकलीफ़, यहाँ तक कि एक कांटा चुभने पर भी उसके गुनाह झाड़ दिए जाते हैं।
- दुआ और अल्लाह पर भरोसा: दुआ मांगना इबादत का मग़ज़ (निचोड़) है। अपनी तकलीफ़ को अल्लाह के सामने पेश करना और उसी से सुकून की दरख्वास्त करना बंदगी की अलामत है।
दुआ का मक़सद कोई जादुई चमत्कार नहीं, बल्कि अल्लाह की पनाह (Refuge) हासिल करना है। सुन्नत का तरीक़ा यह है कि बंदा अपनी पूरी कोशिश भी करे और अपना दिल अल्लाह से भी जोड़े रखे।
Daant Dard Ke Waqt Padhi Jane Wali Masnoon Dua
अगर आपके दांत में दर्द या जिस्म के किसी भी हिस्से में तकलीफ़ हो, तो आप सुन्नत से साबित यह दुआ पढ़ सकते हैं। यह दुआ नबी-ए-करीम ﷺ ने अपने एक सहाबी, उस्मान बिन अबी अल-आस (रज़ि.) को उस वक़्त सिखाई थी जब उन्होंने अपने जिस्म में दर्द की शिकायत की थी।
दुआ पढ़ने का सुन्नत तरीक़ा:
जिस जगह दर्द हो (जैसे दांत या गाल पर), वहां अपना हाथ रखें और:
- तीन बार कहें: بِسْمِ اللهِ (बिस्मिल्लाह)
- सात बार नीचे दी गई दुआ पढ़ें।
Arabic Dua
أَعُوذُ بِاللهِ وَقُدْرَتِهِ مِنْ شَرِّ مَا أَجِدُ وَأُحَاذِرُ
तलफ़्फ़ुज़ (Hindi)
अऊज़ु बिल्लाहि व कु़दरतिही मिन शर्रि मा अजिदु व उहाज़िरु।
Roman / Hinglish Pronunciation
A’udhu billahi wa qudratihi min sharri ma ajidu wa uhadhiru.
तर्जुमा (Translation)
“मैं अल्लाह की और उसकी कु़दरत की पनाह मांगता हूँ उस चीज़ की बुराई (तकलीफ़) से जो मैं महसूस कर रहा हूँ और जिससे मैं डरता हूँ।”
Masdar (Source)
यह हदीस सहीह मुस्लिम (Sahih Muslim, Hadith: 2202) में दर्ज है। यह एक मोतबर और सहीह रिवायत है जिसे दर्द और तकलीफ़ के वक़्त रूहानी सहारे के तौर पर पढ़ा जाना चाहिए।
Dua Ke Saath Banday Ka Rawaiya
दुआ पढ़ना अल्लाह से ताल्लुक़ मज़बूत करने का ज़रिया है। लेकिन इसके साथ-साथ इस्लाम हमें तवक्कुल (Reliance on Allah) का सही मफ़हूम भी समझाता है। तवक्कुल का मतलब यह है कि:
- ज़हनी सुकून: दुआ को पूरे यक़ीन के साथ पढ़ें कि अल्लाह सुब्हानहु व तआला आपकी पुकार सुन रहा है। यह यक़ीन आपके अंदर की बेचैनी को कम करता है।
- अल्लाह की पनाह: जब हम दुआ पढ़ते हैं, तो हम खुद को अल्लाह की हिफ़ाज़त में दे देते हैं। यह एहसास कि हम अकेले नहीं हैं, दर्द सहने की हिम्मत देता है।
- तदबीर का इस्तेमाल: इस्लाम में ज़रूरत के वक़्त सही मशवरा लेना या मदद हासिल करना सुन्नत के ख़िलाफ़ नहीं है। जिस तरह हम भूख लगने पर खाना खाते हैं, वैसे ही तकलीफ़ के वक़्त ज़रूरी कदम उठाना हिकमत और सुन्नत का हिस्सा है।
एक मोमिन का रवैया यह होना चाहिए कि ज़बान पर दुआ हो, दिल में अल्लाह पर भरोसा हो और वह अल्लाह की दी हुई अक़्ल का इस्तेमाल करते हुए अपनी मुश्किल को हल करने की कोशिश करे।
मुख़्तसर सवाल-जवाब
सवाल 1: क्या दांत दर्द के लिए दुआ पढ़ना जाइज़ है?
जी हाँ, बिल्कुल। अल्लाह ताआला से अपनी हर छोटी-बड़ी ज़रूरत और तकलीफ़ के लिए दुआ करना न सिर्फ़ जाइज़ है बल्कि यह एक पसन्दीदा अमल (इबादत) है। सुन्नत दुआएं पढ़ना इंसान को रूहानी मज़बूती अता करता है।
सवाल 2: क्या दुआ के साथ ज़रूरत पड़ने पर किसी माहिर की मदद लेना ग़लत है?
जी नहीं, यह बिल्कुल ग़लत नहीं है। सुन्नत हमें सिखाती है कि हम अल्लाह पर भरोसा भी रखें और ज़रूरत पड़ने पर सही रास्तों और तदबीरों का इस्तेमाल भी करें। तकलीफ़ की सूरत में ज़रूरी मदद लेना हिकमत का रास्ता है।
Aakhiri Baat
दांत का दर्द हो या कोई और आज़माइश, एक मुसलमान के लिए सबसे बड़ी राहत अल्लाह का ज़िक्र है। Daant dard ki dua पढ़ना सुन्नत से साबित एक ज़रिया है जिससे हम अल्लाह की कु़दरत और उसकी पनाह को पुकारते हैं। यह दुआ हमें याद दिलाती है कि हर हाल में राहत देने वाली ज़ात सिर्फ़ अल्लाह की है।
जब आप यह दुआ पढ़ें, तो दिल में यह यक़ीन रखें कि अल्लाह आपकी पुकार सुन रहा है और वह आपके सब्र को जाया नहीं करेगा। दुआ के ज़रिए मिलने वाला सुकून और अल्लाह पर कामिल यक़ीन ही एक मोमिन की सबसे बड़ी दौलत है। अल्लाह तमाम मुसल्मानों को सेहत, सुकून और अफ़ियत अता फरमाए। आमीन।


