इंसानी ज़िंदगी में उतार-चढ़ाव आते रहते हैं, और इनमें जिस्मानी या ज़ेहनी दर्द का आना भी एक हिस्सा है। दर्द चाहे कैसा भी हो—हल्का हो या बहुत ज़्यादा—वह इंसान को बेबस कर देता है। ऐसे मुश्किल लम्हों में जब जिस्म थकने लगता है और दिल बेचैन हो जाता है, तब एक मोमिन का सबसे बड़ा सहारा अल्लाह की ज़ात होती है। दर्द से छुटकारा पाने की दुआ दरअस्ल अल्लाह से राहत माँगने और अपनी बेबसी को उसके सामने ज़ाहिर करने का एक ज़रिया है।
यह मज़मून आपको उन मसनून दुआओं और रूहानी रास्तों की तरफ ले जाएगा जो तकलीफ़ के वक़्त दिल को सुकून और रूह को ताक़त देते हैं।
दर्द और इंसानी बेबसी
जब जिस्म के किसी हिस्से में दर्द होता है, तो उसका असर सिर्फ हमारे शरीर पर नहीं बल्कि हमारी सोच और जज़्बात पर भी पड़ता है। दर्द इंसान को कमज़ोर महसूस कराता है और कभी-कभी वह खुद को अकेला समझने लगता है। ऐसे में यह याद रखना ज़रूरी है कि तकलीफ़ के इन लम्हों में अल्लाह हमारे बहुत करीब होता है।
अल्लाह की तरफ रुजू करना या उससे बातें करना इंसान के अंदरूनी बोझ को कम कर देता है। दुआ हमें यह एहसास दिलाती है कि हम अकेले नहीं हैं और एक ऐसी ताक़त है जो हमारी हर कराह और हर आह को सुन रही है। यह रूहानी सहारा हमें दर्द को सहने का हौसला और राहत की उम्मीद देता है।
इस्लाम में तकलीफ़ और सब्र का तसव्वुर
इस्लाम में तकलीफ़ को सिर्फ एक बीमारी के तौर पर नहीं देखा जाता, बल्कि इसे आज़माइश और अल्लाह की रहमत की तरफ लौटने का एक मौक़ा माना जाता है। नबी करीम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने सिखाया है कि एक मोमिन को पहुँचने वाली हर छोटी-बड़ी तकलीफ़, यहाँ तक कि एक कांटा चुभना भी, उसके लिए अज्र (सवाब) का ज़रिया बन सकता है।
- सबर: सबर का मतलब हाथ पर हाथ रखकर बैठना नहीं, बल्कि मुश्किल वक़्त में अपने जज़्बात पर क़ाबू रखना और अल्लाह से उम्मीद न छोड़ना है।
- तवक्कुल: अल्लाह पर पूरा भरोसा रखना कि वही शिफ़ा देने वाला है और वही हालतों को बदलने वाला है।
- दुआ और सुकून: दुआ दिल की घबराहट को कम करती है और इंसान को इस बात पर राज़ी करती है कि जो कुछ हो रहा है, वह अल्लाह की हिकमत से बाहर नहीं है।
दर्द और तकलीफ़ में पढ़ी जाने वाली मसनून दुआएँ
जब आप दर्द महसूस करें, तो इन दुआओं को दिल के यक़ीन के साथ पढ़ सकते हैं। ये दुआएँ नबी करीम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की सुन्नत से साबित हैं और राहत के लिए बेहतरीन ज़रिया हैं।
1. जिस्मानी दर्द के लिए नबवी दुआ
एक सहाबी हज़रत उस्मान बिन अबुल आस (रज़ि.) ने नबी करीम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) से अपने दर्द की शिकायत की, तो आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने उन्हें यह तरीक़ा सिखाया:
तरीक़ा: अपने जिस्म के उस हिस्से पर हाथ रखें जहाँ दर्द है, फिर 3 बार “बिस्मिल्लाह” कहें और फिर 7 बार नीचे दी गई दुआ पढ़ें:
أَعُوذُ بِاللَّهِ وَقُدْرَتِهِ مِنْ شَرِّ مَا أَجِدُ وَأُحَاذِرُ
तलफ़्फ़ुज़ (Hindi):
अऊज़ु बिल्लाहि व कु़दरतिही मिन शर्रि मा अजिदु व उहाज़िरु
तलफ़्फ़ुज़ (Roman):
A’udhu billahi wa qudratihi min sharri ma ajidu wa uhadhiru.
तर्जुमा:
“मैं अल्लाह की और उसकी कु़दरत की पनाह माँगता हूँ उस (दर्द) की बुराई से जिसे मैं महसूस करता हूँ और जिससे मैं डरता हूँ।”
मस्दर (Source):
सहीह मुस्लिम (हदीस नम्बर: 2202)
2. हज़रत अय्यूब (अलैहि.) की दुआ
जब हज़रत अय्यूब (अलैहि.) लम्बी बीमारी और सख़्त तकलीफ़ में थे, तो उन्होंने अल्लाह को इन लफ़्ज़ों से पुकारा था। यह दुआ अल्लाह की रहमत को पुकारने का बहुत ही आज़माया हुआ ज़रिया है।
أَنِّي مَسَّنِيَ الضُّرُّ وَأَنْتَ أَرْحَمُ الرَّاحِمِينَ
तलफ़्फ़ुज़ (Hindi):
अन्नी मस्स-नियद-दुर्रु व अन्ता अरह-मुर-राहिमीन
तलफ़्फ़ुज़ (Roman):
Anni massaniyad-durru wa Anta Arhamur-rahimin.
तर्जुमा:
“(ऐ मेरे रब) मुझे तकलीफ़ पहुँची है और तू सबसे ज़्यादा रहम करने वाला है।”
मस्दर (Source):
क़ुरआन मजीद (सूरह अल-अम्बिया, आयत: 83)
दुआ और इलाज का तवाज़ुन
इस्लाम एक मुकम्मल दीन है जो हमें रूहानी और जिस्मानी दोनों तरह के एहतियात की हिदायत देता है। दुआ और दवा एक-दूसरे के उलट नहीं हैं, बल्कि ये दोनों अल्लाह के बनाए हुए निज़ाम का हिस्सा हैं।
- दवा लेना सुन्नत है: नबी करीम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने बीमार होने पर इलाज करवाने का हुक्म दिया है। डॉक्टर के पास जाना और दवा इस्तेमाल करना अल्लाह पर भरोसे के ख़िलाफ़ नहीं है।
- दुआ शिफ़ा का ज़रिया है: हम दवा इस यक़ीन के साथ लेते हैं कि शिफ़ा देने वाली ज़ात सिर्फ अल्लाह की है। दवा सिर्फ एक ज़रिया (means) है, जबकि असर अल्लाह के हुक्म से होता है।
- दिमाग़ी सुकून: जब हम इलाज के साथ दुआ करते हैं, तो हमारा दिल पुर-सुकून रहता है। इससे जिस्म की रिकवरी में भी मदद मिलती है क्योंकि इंसान ज़ेहनी तौर पर मज़बूत महसूस करता है।
दो मुक़्तसर सवाल
क्या दर्द के वक़्त बार-बार दुआ की जा सकती है?
जी हाँ, अल्लाह को अपने बंदों का गिड़गिड़ाकर माँगना बहुत पसंद है। आप जितनी बार चाहें अल्लाह से रहमत और राहत की दुआ माँग सकते हैं। बार-बार दुआ करना अल्लाह पर आपके अटूट यक़ीन को ज़ाहिर करता है।
अगर दर्द ज़्यादा हो, तो क्या मदद लेना ग़लत है?
बिल्कुल नहीं। अगर दर्द बर्दाश्त से बाहर हो या लगातार बना रहे, तो डॉक्टर या घर के लोगों से मदद लेना बिल्कुल दुरुस्त है। अपनी तकलीफ़ को साझा करना और इलाज तलाशना सुन्नत के मुताबिक़ है।
आख़िरी बात
दर्द की हालत में बेक़रार होना एक इंसानी फ़ितरत है, लेकिन एक मोमिन की शान यह है कि वह ऐसे वक़्त में भी अपने रब की रहमत से मायूस नहीं होता। दर्द से छुटकारा पाने की दुआ दरअस्ल अल्लाह की बारगाह में एक अर्ज़ी है कि “ऐ अल्लाह, मैं कमज़ोर हूँ और तू ही राहत देने वाला है।”
याद रखें, दुआ दिल को सुकून देती है और सबर इंसान को बुलंद मक़ाम देता है। अल्लाह से शिफ़ा की उम्मीद रखें, अपना इलाज कराएं और उसकी रज़ा में राज़ी रहने की कोशिश करें। बेशक, हर मुश्किल के साथ आसानी है।


