माँ बनना दुनिया के सबसे हसीन और रूहानी एहसासों में से एक है। एक नन्ही सी जान का इस दुनिया में आना और फिर अपनी गिज़ा (nourishment) के लिए अपनी माँ पर मुकम्मल भरोसा करना, अल्लाह की कुदरत की एक बहुत बड़ी निशानी है। इस सफ़र में कई उतार-चढ़ाव आते हैं, कभी थकान होती है तो कभी घबराहट, लेकिन इन सब के बीच अल्लाह का ज़िक्र और दुआ एक ऐसी चीज़ है जो दिल को सुकून और रूह को ताक़त देती है।
माँ और बच्चे का ख़ामोश रिश्ता
जब एक माँ अपने बच्चे को सीने से लगाकर उसे दूध पिलाती है, तो वह सिर्फ़ उसकी भूख नहीं मिटा रही होती, बल्कि वह उसे अपनी ममता, अपनी हिफ़ाज़त और अपना सुकून भी दे रही होती है। यह एक ऐसा ख़ामोश रिश्ता है जहाँ लफ़्ज़ों की ज़रूरत नहीं पड़ती। बच्चे की आँखें और माँ का अपने बच्चे को देखना, मुहब्बत की एक ऐसी ज़ुबान है जिसे सिर्फ़ दिल महसूस कर सकता है।
इस ख़ास वक़्त में जब माँ और बच्चा एक-दूसरे के इतने क़रीब होते हैं, तो अल्लाह की रहमत का साया उन पर होता है। यह वक़्त सिर्फ़ बच्चे की परवरिश का नहीं, बल्कि माँ के अपने ज़हन और दिल को सुकून पहुँचाने का भी है। इस वक़्त में की गई दुआ और अल्लाह का ज़िक्र उस लम्हे को और भी बा-बरकत बना देता है।
इस्लाम में माँ और परवरिश का मकाम
इस्लाम में माँ के रुतबे को इतना बुलन्द रखा गया है कि उसके कदमों तले जन्नत बताई गई है। एक माँ जब अपने बच्चे की परवरिश की मुश्किलों को सहती है, रातों को जागती है और अपनी सेहत का ख्याल रखते हुए बच्चे का पेट भरती है, तो अल्लाह के यहाँ उसका बहुत बड़ा अज्र (reward) है।
हर माँ की यह दिली तमन्ना होती है कि उसका बच्चा सेहतमंद रहे और उसे पालने में कोई मुश्किल न आए। इस्लाम हमें सिखाता है कि हम अपनी हर छोटी-बड़ी ज़रूरत के लिए अपने रब की तरफ़ रुजू करें। Doodh pilane ki dua और ज़िक्र के ज़रिए माँ न सिर्फ़ अपने बच्चे के लिए दुआ करती है, बल्कि अपने लिए भी सब्र और कुव्वत (strength) माँगती है। यह यकीन रखना ज़रूरी है कि अल्लाह माँ की हर तकलीफ़ को देख रहा है और वह उसकी मेहनत को ज़ाया नहीं करेगा।
दूध पिलाते वक़्त पढ़ी जाने वाली मसनून दुआएं
इस्लाम में हर नेक काम की शुरुआत अल्लाह के पाक नाम से करने की हिदायत दी गई है। दूध पिलाना भी एक बहुत बड़ी इबादत और ज़िम्मेदारी है। यहाँ कुछ ऐसी दुआएं और ज़िक्र दिए जा रहे हैं जो आप इस वक़्त में पढ़ सकती हैं:
1. बिस्मिल्लाह (शुरुआत के लिए)
किसी भी काम को शुरू करने से पहले अल्लाह का नाम लेना उसमें बरकत पैदा करता है।
अरबी दुआ:
بِسْمِ اللَّهِ
तलफ़्फ़ुज़:
बिस्मिल्लाह
तर्जुमा:
अल्लाह के नाम से (मैं शुरू करती हूँ)।
माहज़ (Source):
यह एक आम सुन्नत है कि हर जायज़ और नेक काम की शुरुआत बिस्मिल्लाह से की जाए (सहीह बुख़ारी व मुस्लिम)।
2. दूध पीने के बाद या पिलाते वक़्त बरकत की दुआ
हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने दूध के ताल्लुक़ से यह ख़ास दुआ सिखाई है। हालाँकि यह पीने वाले के लिए है, लेकिन माँ इसे बरकत की नीयत से पढ़ सकती है।
अरबी दुआ:
اللَّهُمَّ بَارِكْ لَنَا فِيهِ وَزِدْنَا مِنْهُ
तलफ़्फ़ुज़:
अल्लाहुम्मा बारिक लना फ़ीहि व ज़िदना मिन्हु
Roman/Hinglish:
Allahumma barik lana fihi wa zidna minhu
तर्जुमा:
ऐ अल्लाह! हमारे लिए इसमें बरकत अता फ़रमा और हमें इससे ज़्यादा इनायत फ़रमा।
माहज़ (Source):
सुनन तिर्मिज़ी (3455), सुनन अबू दाऊद (3730)
ज़ूरी नोट: यह दुआएं बरकत, शुक्र और रूहानी सुकून के लिए हैं। अगर आपको दूध पिलाने में कोई जिस्मानी (physical) तकलीफ़ हो रही है या बच्चा सही से दूध नहीं पी पा रहा है, तो डॉक्टर से मशविरा करना और घर वालों की मदद लेना भी ज़रूरी है।
दुआ के साथ माँ का इत्मिनान
अक्सर नई माएँ इस बात को लेकर फ़िक्रमंद रहती हैं कि क्या वे अपने बच्चे की ज़रूरतें पूरी कर पा रही हैं। इस फ़िक्र और तनाव (stress) का असर कभी-कभी माँ की सेहत पर भी पड़ता है। यहाँ यह समझना ज़रूरी है कि अल्लाह ने आपको इस बच्चे के लिए चुना है, तो वही आपकी मदद भी फ़रमाएगा।
Doodh pilane ki dua पढ़ते वक़्त अपने दिल में यह यकीन रखें कि:
- अल्लाह हर चीज़ पर क़ादिर है।
- शुक्र अदा करने से नेमतों में इज़ाफ़ा होता है।
- आपका सुकून आपके बच्चे के लिए भी राहत का ज़रिया है।
जब आप सुकून के साथ, ज़िक्र करते हुए बच्चे को दूध पिलाती हैं, तो बच्चा भी आपकी ममता और उस रूहानी सुकून को महसूस करता है। खुद पर ज़्यादा दबाव न डालें और न ही अपनी तुलना दूसरी माओं से करें। हर माँ का सफ़र अलग और अपनी जगह मुकम्मल होता है।
सवालों के जवाब
क्या दूध पिलाते वक़्त दुआ करना ज़रूरी होता है?
नहीं, यह फ़र्ज़ या वाजिब नहीं है, लेकिन ऐसा करना मुसतहब (बेहतर) है। अल्लाह का ज़िक्र करने से माँ के दिल को इत्मिनान मिलता है और उस वक़्त में बरकत आती है। अगर आप थकी हुई हैं और चुपचाप सिर्फ़ बच्चे को खिला रही हैं, तो उसमें भी कोई गुनाह नहीं है।
अगर माँ बहुत ज़्यादा थकी हुई हो, तो क्या सिर्फ़ दिल में दुआ करना काफ़ी है?
बिल्कुल। अल्लाह दिलों के हाल बेहतर जानता है। अगर आप ज़ुबान से दुआ नहीं पढ़ पा रही हैं, तो सिर्फ़ दिल में अल्लाह का शुक्र अदा करना और उसकी रहमत की उम्मीद रखना भी काफ़ी है। दीन में हमारे लिए आसानी रखी गई है, बोझ नहीं।
आख़िरी बात
एक माँ के तौर पर आप जो कुछ भी कर रही हैं, वह बहुत अज़ीम (बड़ा) काम है। दूध पिलाने के लम्हे को एक बोझ या सिर्फ़ ज़िम्मेदारी न समझें, बल्कि इसे अल्लाह की रहमत का एक ज़रिया मानें। जब आप doodh pilane ki dua पढ़ती हैं, तो आप अल्लाह से अपने और अपने बच्चे के लिए ख़ैर माँग रही होती हैं।
अल्लाह तमाम माओं को हिम्मत, सेहत और सुकून अता फ़रमाए और उनके बच्चों को उनकी आँखों की ठंडक बनाए। याद रखिए, आपकी कोशिश अल्लाह के पास महफ़ूज़ है और उसका अज्र बहुत बड़ा है। बस अपने रब पर भरोसा रखें और अपनी सेहत का भी उतना ही ख्याल रखें जितना आप अपने बच्चे का रखती हैं।


