Dua-E-Masura In Hindi | दुआ-ए-मसूरा हिंदी में

By Rokaiya

dua e masura hindi

Quick Summary

Dua Name

Dua-E-Masura

Arabic Text

اللَّهُمَّ إِنِّي ظَلَمْتُ نَفْسِي ظُلْمًا كَثِيرًا وَلَا يَغْفِرُ الذُّنُوبَ إِلَّا أَنْتَ فَاغْفِرْ لِي مَغْفِرَةً مِنْ عِنْدِكَ وَارْحَمْنِي إِنَّكَ أَنْتَ الْغَفُورُ الرَّحِيمُ

Hindi Transliteration

अल्लाहुम्मा इन्नी ज़लमतु नफ्सी ज़ुल्मन कसीरन, वला यग़्फिरुज़-ज़ुनूबा इल्ला अन्त, फग़्फिरली मग़्फिरतम-मिन 'इंदिक, वरहमनी इन्नका अन्तल ग़फूरुर रहीम।

English Transliteration

Allahumma inni zlamatu nafsi zulman kasiran, wala yaghfiruz-zunuba illa ant, faghfirali maghfiratam-min 'indik, warahamani innaka antal ghfurur rahim.

Source

सही बुखारी 834, सही मुस्लिम 2705

नमाज़ एक मोमिन की ज़िंदगी का सबसे अहम हिस्सा है। जब हम नमाज़ के आख़िर में पहुँचते हैं, तो अल्लाह से अपनी मग़फ़िरत (माफ़ी) तलब करते हैं। इसी मक़ाम पर Dua-E-Masura In Hindi को समझना और सही तरीक़े से पढ़ना हर नमाज़ी के लिए ज़रूरी है। यह दुआ न सिर्फ़ गुनाहों की माफ़ी का ज़रिया है, बल्कि यह बंदे को अपने रब के करीब करती है।

नीचे इस दुआ का सही अरबी मतन, तलफ़्फ़ुज़ और तर्जुमा आसान ज़ुबान में दिया गया है।

Dua-E-Masura Kya Hai

दुआ-ए-मसूरा वह मसनून दुआ है जो हमारे प्यारे नबी हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने अपने सहाबी हज़रत अबू बकर सिद्दीक़ (रज़ि.) को सिखाई थी। जब हज़रत अबू बकर ने नबी करीम (स.अ.व) से दरख्वास्त की कि उन्हें नमाज़ में पढ़ने के लिए कोई दुआ सिखाएं, तो आपने उन्हें यह दुआ तालीम फ़रमाई।

यह दुआ इंसान की आजिज़ी (humility) और अल्लाह की रहमत का बेहतरीन नमूना है। इसमें हम इक़रार करते हैं कि हम से गलतियाँ होती हैं और सिर्फ अल्लाह ही माफ़ करने वाला है।

Dua-E-Masura Kab Aur Kahan Padhi Jati Hai

नमाज़ के दौरान दुआ-ए-मसूरा पढ़ने की एक मख़सूस जगह मुक़र्रर है। इसे नमाज़ के आख़िरी क़ादा (जब हम नमाज़ पूरी करने के लिए बैठते हैं) में पढ़ा जाता है।

इसका सही तरीक़ा और तरतीब यह है:

  1. तशहहुद (अत्तहियात) पढ़ें।
  2. इसके बाद दुरूद-ए-इब्राहीम पढ़ें।
  3. दुरूद शरीफ़ के फ़ौरन बाद और सलाम फेरने से पहले दुआ-ए-मसूरा पढ़ी जाती है।

चाहे फ़र्ज़ नमाज़ हो, सुन्नत हो या नफ़िल, हर नमाज़ के आख़िर में इसे पढ़ना मसनून है।

Masnoon Dua-E-Masura (Arabic + Hindi)

यहाँ सही और मुस्तनद (authentic) दुआ दी गई है। कोशिश करें कि इसे सही तलफ़्फ़ुज़ के साथ याद करें।

Arabic Dua

اللَّهُمَّ إِنِّي ظَلَمْتُ نَفْسِي ظُلْمًا كَثِيرًا، وَلَا يَغْفِرُ الذُّنُوبَ إِلَّا أَنْتَ، فَاغْفِرْ لِي مَغْفِرَةً مِنْ عِنْدِكَ، وَارْحَمْنِي إِنَّكَ أَنْتَ الْغَفُورُ الرَّحِيمُ

तलफ़्फ़ुज़

अल्लाहुम्मा इन्नी ज़लमतु नफ्सी ज़ुल्मन कसीरन, वला यग़्फिरुज़-ज़ुनूबा इल्ला अन्त, फग़्फिरली मग़्फिरतम-मिन ‘इंदिक, वरहमनी इन्नका अन्तल ग़फूरुर रहीम।

Roman (Hinglish)

Allahumma inni zalamtu nafsi zulman kaseeran, wa la yaghfiruz-zunooba illa anta, faghfirli maghfiratan min ‘indika warhamni, innaka antal Ghafoorur Raheem.

तर्जुमा

“ऐ अल्लाह! मैंने अपनी जान पर बहुत ज़्यादा ज़ुल्म किया है, और तेरे सिवा गुनाहों को कोई माफ़ करने वाला नहीं है। पस तू मुझे अपने पास से ख़ास माफ़ी अता कर और मुझ पर रहम फ़रमा, बेशक तू ही बड़ा बख़्शने वाला, निहायत रहम वाला है।”

Masdar (Reference)

सहीह बुख़ारी: 834, सहीह मुस्लिम: 2705

Dua-E-Masura Ka Matlab Aur Maqsad

जब हम इस दुआ के लफ़्ज़ों पर ग़ौर करते हैं, तो हमें अपनी हक़ीक़त समझ आती है।

  1. ख़ता का इक़रार: “मैंने अपनी जान पर ज़ुल्म किया” का मतलब है कि हम मानते हैं कि हमसे गुनाह और गलतियाँ हुई हैं। यह अल्लाह के सामने घमंड तोड़ने का तरीक़ा है।
  2. अल्लाह की वहदानियत: हम गवाही देते हैं कि माफ़ करने का अख़्तियार सिर्फ़ और सिर्फ़ अल्लाह के पास है।
  3. मग़फ़िरत की तलब: हम अल्लाह से ऐसी माफ़ी मांगते हैं जो उसके शान के लायक हो।
  4. रहमत की उम्मीद: आख़िर में हम उसकी सिफ़ात (ग़फ़ूर और रहीम) का वास्ता देकर रहम की भीख मांगते हैं।

Aksar Hone Wali Galtiyan

अक्सर नमाज़ी अनजाने में कुछ ऐसी ग़लतियॉं कर बैठते हैं जिन पर ध्यान देना ज़रूरी है:

  • जल्दी में छोड़ देना: बाज़ लोग समझते हैं कि दुरूद शरीफ़ के बाद नमाज़ पूरी हो गई और दुआ-ए-मसूरा छोड़ देते हैं। हालाँकि यह मसनून है, इसे जानबूझ कर छोड़ने की आदत नहीं बनानी चाहिए।
  • गलत तलफ़्फ़ुज़: ‘ज़ुल्मन’ को ‘ज़ालिमन’ पढ़ना या ‘मग़फ़िरतन’ को सही से अदा न करना। अरबी के लफ़्ज़ों को सही मख़रज से अदा करना नमाज़ की खूबसूरती बढ़ाता है।
  • मतलब से अनजान रहना: बिना मतलब समझे रटे-रटाए अंदाज़ में पढ़ना। जब आप मतलब समझकर पढ़ेंगे, तो नमाज़ में ज़्यादा खुशू (ध्यान) पैदा होगा।

Short Q&A

सवाल: क्या दुआ-ए-मसूरा के बिना नमाज़ नहीं होती?

जवाब: दुआ-ए-मसूरा पढ़ना सुन्नत/मसनून है। अगर कोई इसे भूल जाए या न पढ़े, तो नमाज़ हो जाएगी, लेकिन वह एक बड़ी फ़ज़ीलत से महरूम रह जाएगा।

सवाल: अगर मुझे दुआ-ए-मसूरा याद न हो तो क्या करूँ?

जवाब: जब तक यह दुआ याद न हो, आप कुरान या हदीस से साबित कोई भी दूसरी दुआ पढ़ सकते हैं, जैसे “रब्बना आतिना फिद्दुनिया…” या सिर्फ “अल्लाहुम्मा-ग़फ़िरली”। लेकिन इसे याद करने की कोशिश ज़रूर करें।

सवाल: क्या इसे सज़दे में पढ़ सकते हैं?

जवाब: नफ़िल नमाज़ के सज़दे में दुआ मांगी जा सकती है, लेकिन दुआ-ए-मसूरा की असल जगह तशहहुद और दुरूद के बाद ही है।

नमाज़ में एहसास और दुआ

नमाज़ सिर्फ उठने-बैठने का नाम नहीं है, बल्कि यह बंदे का अपने रब से ताल्लुक जोड़ने का वक़्त है। दुआ-ए-मसूरा हमें नमाज़ के बिल्कुल आख़िर में यह याद दिलाती है कि हम चाहे जितनी भी इबादत कर लें, हम अल्लाह की नेमतों का हक़ अदा नहीं कर सकते। हमें हर हाल में उसकी रहमत की ज़रूरत है।

कोशिश करें कि अगली बार जब आप नमाज़ में बैठें, तो Dua-E-Masura In Hindi के तर्जुमे को अपने ज़हन में रखें और दिल की गहराई से अल्लाह से माफ़ी मांगें। अल्लाह हमें सही तरीक़े से नमाज़ अदा करने की तौफ़ीक़ दे।