Witr Namaz Aur Qunoot Ka Waqt
ईशा की नमाज़ के बाद “वित्र की नमाज़” पढ़ना हर मुसलमान के लिए बहुत ज़रूरी है। हमारे इंडिया (North India) में ज़्यादातर लोग हनफ़ी तरीके से नमाज़ पढ़ते हैं, और इसमें दुआ-ए-क़ुनूत पढ़ने का सही वक़्त वित्र की तीसरी रकात में होता है।
अक्सर लोग कंफ्यूज हो जाते हैं कि दुआ कब पढ़नी है। इसका तरीका बहुत आसान है:
जब आप तीसरी रकात के लिए खड़े हों, तो पहले ‘सूरह फातिहा’ और कोई ‘दूसरी सूरह’ (जैसे सूरह इखलास) पढ़ें। इसके बाद, रुकू में जाने से पहले रुक जाएं। अब “अल्लाहु अकबर” कहते हुए अपने हाथ कानों तक उठाएं और फिर वापस बांध लें (जैसे नमाज़ शुरू करते वक़्त बांधते हैं)। हाथ बांधने के बाद ही यह दुआ पढ़ी जाती है। इसे पढ़ने के बाद “अल्लाहु अकबर” कहकर रुकू में जाएं।
Dua-e-Qunoot Kyun Padhi Jati Hai
“क़ुनूत” का मतलब होता है अल्लाह के सामने पूरी आजिज़ी (humility) से खड़े रहना और ताबेदारी करना। वित्र की नमाज़ में हम इस दुआ के ज़रिए अल्लाह से खास मदद मांगते हैं।
यह दुआ सिर्फ रटने वाले अल्फाज़ नहीं हैं, बल्कि यह अल्लाह से एक ‘अहद’ (Promise) है। इसमें बंदा इक़रार करता है कि “या अल्लाह! हम सिर्फ तेरी ही इबादत करते हैं, तुझसे ही माफी मांगते हैं, और उन लोगों से हमारा कोई रिश्ता नहीं जो तेरी नाफरमानी करते हैं।” इसलिए इसे सिर्फ ज़ुबान से नहीं, बल्कि दिल के ध्यान और समझ के साथ पढ़ना चाहिए।
Masnoon Dua-e-Qunoot (Hindi Samajh Ke Saath)
नीचे दी गई दुआ वही मशहूर दुआ है जो इंडिया, पाकिस्तान और बांग्लादेश में हनफ़ी मदारिस और मस्जिदों में सिखाई जाती है। यह दो हिस्सों में होती है, लेकिन इसे मिलाकर एक साथ ही पढ़ा जाता है।
Arabic Dua
اَللَّهُمَّ إِنَّا نَسْتَعِينُكَ وَنَسْتَغْفِرُكَ وَنُؤْمِنُ بِكَ وَنَتَوَكَّلُ عَلَيْكَ وَنُثْنِي عَلَيْكَ الْخَيْرَ وَنَشْكُرُكَ وَلَا نَكْفُرُكَ وَنَخْلَعُ وَنَتْرُكُ مَنْ يَفْجُرُكَ
اَللَّهُمَّ إِيَّاكَ نَعْبُدُ وَلَكَ نُصَلِّي وَنَسْجُدُ وَإِلَيْكَ نَسْعَى وَنَحْفِدُ وَنَرْجُو رَحْمَتَكَ وَنَخْشَى عَذَابَكَ إِنَّ عَذَابَكَ بِالْكُفَّارِ مُلْحِقٌ
तलफ़्फ़ुज़ (Hindi Pronunciation)
अल्लाहुम्मा इन्ना नस्तईनुका व नस्तग़-फिरुका व नुओमिनु बिका व नतवक्कलु अलैका व नुस्नी अलैकल खैर, व नश्कुरुका वला नकफुरुका व नख्लऊ व नतरुकु मय यफ्जुरुक।
अल्लाहुम्मा इय्याका नअबुदु व लका नुसल्ली व नस्जुद, व इलैका नसआ व नहफिदु, व नरजू रहम-तका व नख्शा अज़ाबक, इन्ना अज़ाबक बिल कुफ्फारि मुल्हिक।
Roman (Hinglish)
Allahumma inna nasta-eenuka wa nastaghfiruka wa nu’minu bika wa natawakkalu ‘alayka wa nuthni ‘alaykal khair, wa nashkuruka wala nakfuruka wa nakhla-u wa natruku man yafjuruk.
Allahumma iyyaka na’budu wa laka nusalli wa nasjudu, wa ilayka nas’a wa nahfidu, wa narju rahmataka wa nakhsha ‘azabaka, inna ‘azabaka bil-kuffari mulhiq.
तर्जुमा (Translation)
पहला हिस्सा: ऐ अल्लाह! हम तुझसे मदद चाहते हैं और तुझसे माफी माँगते हैं, तुझ पर ईमान लाते हैं और तुझ पर भरोसा करते हैं। हम तेरी बहुत अच्छी तारीफ करते हैं और तेरा शुक्र अदा करते हैं, तेरी नाशुक्री (इनकार) नहीं करते। और जो तेरी नाफरमानी करे, हम उससे अलग होते हैं और उसे छोड़ते हैं।
दूसरा हिस्सा: ऐ अल्लाह! हम तेरी ही इबादत करते हैं, तेरे ही लिए नमाज़ पढ़ते हैं और सजदा करते हैं। हम तेरी ही तरफ दौड़ते हैं और खिदमत के लिए हाज़िर होते हैं। हम तेरी रहमत की उम्मीद रखते हैं और तेरे अज़ाब (सज़ा) से डरते हैं। बेशक, तेरा अज़ाब काफिरों को पहुँचने वाला है।
Masdar (Source)
यह दुआ हज़रत उमर फ़ारूक़ (र.अ.) और हज़रत अब्दुल्लाह बिन मसूद (र.अ.) से रिवायत है। इसका ज़िक्र हदीस की किताब “मुसन्नफ इब्न अबी शैबा” और इमाम बैहक़ी की “अस-सुनन अल-कुब्रा” में मिलता है। इंडिया में हनफ़ी मज़हब के मानने वाले इसी दुआ को पढ़ते हैं।
Agar Dua-e-Qunoot Bhool Jayein To
इंसान हैं, तो भूल-चूक हो ही सकती है। अगर आप तीसरी रकात में दुआ पढ़ना भूल गए और सीधे रुकू में चले गए, तो अब घबराएं नहीं और न ही वापस खड़े हों। ऐसा करने से नमाज़ खराब हो सकती है। आप अपनी नमाज़ जारी रखें।
ऐसी हालत में नमाज़ के आखिर में सजदा-ए-सह्व (Sajdah Sahw) करना ज़रूरी है। इसका तरीका यह है:
तशहहुद (अत्तहियात) पढ़ने के बाद सिर्फ सीधी तरफ सलाम फेरें, दो सजदे करें, और फिर दोबारा तशहहुद, दुरूद शरीफ और दुआ पढ़कर नमाज़ मुकम्मल (Complete) करें।
ध्यान दें: हनफ़ी फ़िक़्ह में वित्र में यह दुआ पढ़ना ‘वाजिब’ है, इसलिए अगर जान-बूझकर छोड़ दिया तो नमाज़ दोबारा पढ़नी पड़ेगी। भूलने पर सजदा-ए-सह्व काफी है।
India Mein Aksar Hone Wali Galatfehmiyan
1. सिर्फ रमज़ान में पढ़ना:
बहुत से लोग यह समझते हैं कि दुआ-ए-क़ुनूत सिर्फ रमज़ान की वित्र में पढ़ी जाती है। यह बिल्कुल गलत है। वित्र की नमाज़ और यह दुआ साल के 365 दिन पढ़ना ज़रूरी है, चाहे रमज़ान हो या आम दिन।
2. दुआ के लिए हाथ उठाना:
नॉर्थ इंडिया में हम हनफ़ी तरीके से नमाज़ पढ़ते हैं। यहाँ क़ुनूत के लिए तकबीर कहने के बाद हाथ वापस बांध लिए जाते हैं (जैसे कयाम में बांधते हैं)। हाथ दुआ की तरह खुले नहीं रखे जाते, बल्कि बांधकर ही दुआ पढ़ी जाती है।
3. दुआ याद न होने पर नमाज़ छोड़ देना:
अगर किसी नई उम्र के बच्चे या बड़े को यह दुआ याद नहीं है, तो वह नमाज़ न छोड़े। जब तक यह बड़ी दुआ याद न हो जाए, आप इसकी जगह “रब्बना आतिना फिद्दुनिया हसनतन…” (सूरह बक़रह: 201) पढ़ सकते हैं या तीन बार “अल्लाहुम्मग़-फिरली” (ऐ अल्लाह मुझे माफ़ कर दे) कह लें। लेकिन कोशिश करें कि असल दुआ जल्द से जल्द याद कर लें।
Short Q&A (Real Searches)
Q1: क्या औरत भी यही दुआ-ए-क़ुनूत पढ़ती है?
Ans: जी हाँ, मर्द और औरत दोनों के लिए वित्र की नमाज़ का तरीका और दुआ बिल्कुल एक ही है। ख्वातीन (Ladies) भी तीसरी रकात में यही दुआ पढ़ेंगी।
Q2: क्या वित्र की नमाज़ दुआ-ए-क़ुनूत के बिना हो सकती है?
Ans: हनफ़ी तरीके में दुआ-ए-क़ुनूत पढ़ना ‘वाजिब’ है। अगर आपको दुआ याद है और आपने जान-बूझकर नहीं पढ़ी, तो नमाज़ ना-मुकम्मल होगी और आपको दोहरानी पड़ेगी। अगर भूल गए, तो सजदा-ए-सह्व से नमाज़ हो जाएगी।
समझ के साथ पढ़ी गई दुआ
दुआ-ए-क़ुनूत का मक़सद सिर्फ रस्म पूरी करना नहीं है, बल्कि अल्लाह से अपने ताल्लुक को मज़बूत करना है। जब आप नमाज़ में यह अल्फाज़ बोलें कि “हम तेरी तरफ दौड़ते हैं,” तो अपने दिल में यह नीयत करें कि मैं बुराई छोड़कर अच्छाई की तरफ जाऊँगा।
बिना समझे सिर्फ रट्टा लगाने से बेहतर है कि हम इसके माने (Meaning) पर भी गौर करें। इससे नमाज़ में खुशू (ध्यान) पैदा होता है और दिल को सुकून मिलता है। अल्लाह हम सबकी इबादत क़बूल फरमाए।


