Dua for the Last 10 Nights | रमज़ान की आख़िरी 10 रातों की दुआ

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मुख़्तसर रहनुमाई

आख़िरी 10 रातों की (शबे क़द्र) दुआ

اللَّهُمَّ إِنَّكَ عَفُوٌّ تُحِبُّ الْعَفْوَ فَاعْفُ عَنِّي
तलफ़्फ़ुज़:
अल्लाहुम्मा इन्नका अफ़ुव्वुन तुहिब्बुल अफ़वा फ़फ़ु अन्नी।
तर्जुमा:
ऐ अल्लाह! तू बहुत माफ़ करने वाला है, माफ़ करना तुझे पसंद है, लिहाजा मुझे माफ़ कर दे।
मसदर: 
जामि अत-तिरमिज़ी: 3513
last 10 nights dua

Table of Content

Last 10 Nights of Ramadan Ka Ehsaas

रमज़ान का महीना अपने आख़िरी मरहले यानी तीसरे अशरे में दाखिल हो चुका है। ये वो दस रातें हैं जो पूरे साल की रातों में सबसे ज़्यादा फज़ीलत वाली हैं। इन रातों की अहमियत का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि खुद नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम इन रातों में इबादत के लिए अपनी कमर कस लेते थे और रातों को जागकर अल्लाह की बंदगी किया करते थे। इन रातों में किया जाने वाला एक-एक नेक अमल और माँगी जाने वाली हर दुआ अल्लाह के यहाँ बहुत क़ीमती है। इन रातों का हर लम्हा हमें जहन्नम की आग से दूर करने और जन्नत के क़रीब ले जाने वाला है।

In Raaton Mein Kya Maangna Behtar Hai

Dua for the Last 10 Nights का असल मक़सद अपनी मग़फ़िरत कराना और जहन्नम की आग से आज़ादी पाना है। नॉर्थ इंडिया में इसे ‘निजात का अशरा’ भी कहा जाता है। इन रातों में हमें दुनियावी फ़ायदे के बजाय अपनी आख़िरत की कामयाबी पर ज़ोर देना चाहिए। जब हम अल्लाह से ‘अफ़्व’ यानी माफ़ी माँगते हैं, तो अल्लाह न सिर्फ़ हमारे गुनाहों को मिटा देता है बल्कि हमसे राज़ी भी हो जाता है। इन रातों में ख़ास तौर पर जहन्नम से पनाह और लैलतुल क़द्र की बरकतें हासिल करने की दुआ करनी चाहिए।

Authentic Duas for the Last 10 Nights of Ramadan

यहाँ दो ऐसी दुआएं दी जा रही हैं जो सहीह अहादीस से साबित हैं और उत्तर भारत के मुसलमानों में कसरत से पढ़ी जाती हैं।

Arabic Dua

اللَّهُمَّ إِنَّكَ عَفُوٌّ تُحِبُّ الْعَفْوَ فَاعْفُ عَنِّي

तलफ़्फ़ुज़

अल्लाहुम्मा इन्नका अफ़ुव्वुन तुहिब्बुल अफ़वा फ़फ़ु अन्नी।

Roman (Hinglish)

Allahumma innaka ‘afuwwun tuhibbul ‘afwa fa’fu ‘anni.

तर्जुमा

ऐ अल्लाह! बेशक तू बहुत माफ़ करने वाला है और दरगुज़र करने (माफ़ करने) को पसंद करता है, पस तू मेरे गुनाहों को माफ़ फ़रमा दे।

Masdar

Jami` at-Tirmidhi: 3513 (हज़रत आयशा रज़ियल्लाहु अन्हा से रिवायत है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने लैलतुल क़द्र के लिए यही दुआ सिखाई)।


Arabic Dua

اللَّهُمَّ أَجِرْنِي مِنَ النَّارِ

तलफ़्फ़ुज़

अल्लाहुम्मा अजिरनी मिनन-नार।

Roman (Hinglish)

Allahumma ajirni minan-naar.

तर्जुमा

ऐ अल्लाह! मुझे जहन्नम के अज़ाब और उसकी आग से महफ़ूज़ रख।

Masdar

Sunan Abi Dawud: 5079 (जहन्नम से निजात की ये दुआ सुन्नत से साबित है और तीसरे अशरे में इसे पढ़ना बहुत मुफ़ीद है)।

Dua Padhne Ka Andaz (Last 10 Nights)

इन मुबारक रातों में दुआ करने का सबसे बेहतरीन तरीक़ा ये है कि इंसान अपने गुनाहों पर शर्मिंदा होकर अल्लाह के सामने बैठे। दुआ के आदाब में ये शामिल है कि पहले अल्लाह की हम्द-ओ-सना (तारीफ़) बयान की जाए और नबी ﷺ पर दरूद भेजा जाए। अपनी आवाज़ को पस्त रखें और दिल में ये यक़ीन पैदा करें कि अल्लाह रहमान और रहीम है। इन रातों में सिर्फ़ रस्मी तौर पर दुआ न करें, बल्कि लफ़्ज़ों के साथ अपने दिल के जज़्बात भी शामिल करें।

Agar Laylatul Qadr Ka Yaqeen Na Ho

अक्सर लोग इस फ़िक्र में रहते हैं कि लैलतुल क़द्र को कैसे पहचानें। सुन्नत का तरीक़ा ये है कि रमज़ान की तमाम ताक़ रातों (21, 23, 25, 27, 29) में इबादत का ख़ास एहतमाम किया जाए। लेकिन कामयाबी का राज़ ये है कि आप तमाम 10 रातों को कीमती समझें और हर रात Dua for the Last 10 Nights का विर्द करें। अगर आप दसों रात पाबंदी से ये दुआएं पढ़ेंगे, तो यक़ीनन आप उस रात को पा लेंगे जो हज़ार महीनों से बेहतर है।

Short Q&A (High-Intent Searches)

क्या हर रात एक ही दुआ पढ़ सकते हैं?
जी हाँ, नबी ﷺ ने लैलतुल क़द्र के लिए एक ही ख़ास दुआ सिखाई है, जिसे आप बार-बार पढ़ सकते हैं। इसके साथ ही जहन्नम से निजात की दुआ भी इन रातों में कसरत से पढ़ना बहुत सवाब का काम है।

क्या अपनी ज़ुबान में भी अल्लाह से माँग सकते हैं?
बिल्कुल, अरबी दुआओं के बाद आप अपनी ज़ुबान (हिंदी, उर्दू या हिंग्लिश) में भी अपनी जायज़ हाजतें अल्लाह के सामने रख सकते हैं। अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त हर ज़ुबान को समझता है और बंदे की आज़ज़ी को पसंद फ़रमाता है।

दस रातें, एक उम्मीद

ये दस रातें गुज़र जाने के बाद साल भर ऐसा मौक़ा दोबारा नहीं मिलता। ये हमारे पास अपनी बिगड़ी हुई तक़दीर को सँवारने का आख़िरी मौक़ा है। इन रातों में की गई तौबा इंसान को गुनाहों से ऐसा पाक कर देती है जैसे वो आज ही पैदा हुआ हो। लिहाज़ा, सुस्ती छोड़कर इन मुबारक रातों की क़द्र करें और दुआओं में पूरी उम्मत-ए-मुस्लिमा को याद रखें।