Fajr ki namaz ke baad ki dua एक ऐसा अमल है जो मोमिन के दिन की शुरुआत को अल्लाह की रहमत और हिदायत से जोड़ देता है। जब हम नींद से जागकर सबसे पहले अपने रब के सामने झुकते हैं, तो वह वक़्त कुबूलियत और सुकून का होता है।
अक्सर लोग जानना चाहते हैं कि सुन्नत के मुताबिक Fajr ki namaz ke baad कौन-सी दुआएं पढ़नी चाहिए। इस लेख में हम सिर्फ उन मसनून दुआओं (Masnoon Duas) का ज़िक्र करेंगे जो हदीस से साबित हैं और जिन्हें आप अपनी रोज़ाना की नमाज़ के बाद आसानी से पढ़ सकते हैं।
Fajr Ke Baad Ka Waqt Kyun Khaas Hota Hai
फ़ज्र का वक़्त दिन का पहला हिस्सा होता है। हदीस शरीफ में आता है कि सुबह के वक़्त में उम्मत के लिए बरकत रखी गई है। जब इंसान दुनिया के शोर-शराबे से पहले अल्लाह को याद करता है, तो उसका असर पूरे दिन की ज़िंदगी पर पड़ता है।
यह वक़्त सिर्फ दुआ मांगने का ही नहीं, बल्कि अल्लाह के साथ अपने ताल्लुक को मज़बूत करने का है। फ़ज्र की नमाज़ के बाद का थोड़ा सा वक़्त ज़िक्र और दुआ में बिताना सुन्नत है और यह दिल को इत्मीनान (सुकून) देता है।
Fajr Ki Namaz Ke Baad Kaun-Si Duas Padhi Ja Sakti Hain
यूं तो आप फ़ज्र के बाद अल्लाह से अपनी ज़बान में कोई भी जायज़ दुआ मांग सकते हैं, लेकिन हदीस में कुछ ख़ास दुआएं बताई गई हैं जो नबी-ए- करीम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) पढ़ा करते थे।
यहाँ हम 3 सबसे अहम और आसान मसनून दुआएं बता रहे हैं। कोशिश करें कि सलाम फेरने के बाद इन्हें अपनी आदत बना लें।
1. इल्म और रिज़्क़ में बरकत की दुआ
यह दुआ ख़ास तौर पर फ़ज्र की नमाज़ के बाद पढ़ने के लिए हदीस (इब्ने माजा) में आयी है। यह बहुत जामे (comprehensive) दुआ है।
Arabic Dua
اللَّهُمَّ إِنِّي أَسْأَلُكَ عِلْمًا نَافِعًا, وَرِزْقًا طَيِّبًا, وَعَمَلاً مُتَقَبَّلاً
तलफ़्फ़ुज़ (हिन्दी)
“अल्लाहुम्मा इन्नी अस्-अलुका इल्मन नाफ़ि-अन्, व रिज़्कन तय्यिबन, व अमलन मुतक़ब्बलन्”
Roman (Hinglish)
Allahumma inni as’aluka ‘ilman nafi’an, wa rizqan tayyiban, wa ‘amalan mutaqabbalan.
तर्जुमा (Meaning)
“ऐ अल्लाह! मैं तुझसे नफ़ा (फ़ायदा) देने वाले इल्म, पाकीज़ा (हलाल) रिज़्क़ और कुबूल होने वाले अमल का सवाल करता हूँ।”
Masdar (Reference)
सुनन इब्ने माजा: 925 (सहीह)
2. नमाज़ के बाद की मसनून दुआ
यह दुआ हर फ़र्ज़ नमाज़ के बाद पढ़ी जा सकती है, और फ़ज्र के बाद भी इसका एहतमाम करना चाहिए।
Arabic Dua
اللَّهُمَّ أَنْتَ السَّلاَمُ وَمِنْكَ السَّلاَمُ تَبَارَكْتَ يَا ذَا الْجَلاَلِ وَالإِكْرَامِ
तलफ़्फ़ुज़ (हिन्दी)
“अल्लाहुम्मा अन्-तस्-सलाम, व मिन्-कस्-सलाम, तबारकता या ज़ल-जलालि वल-इकराम”
Roman (Hinglish)
Allahumma antas-salam wa minkas-salam tabarakta ya dhal-jalali wal-ikram.
तर्जुमा (Meaning)
“ऐ अल्लाह! तू ही सलामती वाला है और तेरी ही तरफ से सलामती है। तू बड़ी बरकत वाला है, ऐ बुज़ुर्गी और इज़्ज़त वाले।”
Masdar (Reference)
सहीह मुस्लिम: 591
3. फ़ज्र के बाद 10 बार पढ़ने की दुआ
यह दुआ फ़ज्र और मगरिब की नमाज़ के बाद अपनी जगह से उठने या पैर बदलने से पहले 10 बार पढ़ने की फज़ीलत हदीस में आई है।
Arabic Dua
لاَ إِلَهَ إِلاَّ اللَّهُ وَحْدَهُ لاَ شَرِيكَ لَهُ, لَهُ الْمُلْكُ وَلَهُ الْحَمْدُ, يُحْيِي وَيُمِيتُ, وَهُوَ عَلَى كُلِّ شَيْءٍ قَدِيرٌ
तलफ़्फ़ुज़ (हिन्दी)
“ला इलाह इल्लल्लाहु वह्दहू ला शरीक लहू, लहुल मुल्कु व लहुल हम्दु, युह-यी व युमीतु, व हुवा अला कुल्लि शय-इन् क़दीर”
Roman (Hinglish)
La ilaha illallahu wahdahu la sharika lahu, lahul mulku wa lahul hamdu, yuhyi wa yumitu, wa huwa ‘ala kulli shay’in qadir.
तर्जुमा (Meaning)
“अल्लाह के सिवा कोई माबूद (इबादत के लायक) नहीं, वह अकेला है, उसका कोई शरीक नहीं। उसी के लिए बादशाहत है और उसी के लिए तमाम तारीफ़ें हैं। वह ज़िंदा करता है और मारता है, और वह हर चीज़ पर क़ादिर (कुदरत रखने वाला) है।”
Masdar (Reference)
जा-मे तिरमिज़ी: 3534
Kya Fajr Ke Baad Apni Zuban Mein Dua Kar Sakte Hain
जी हाँ, बिल्कुल कर सकते हैं। अरबी में मसनून दुआएं (Masnoon Duas) पढ़ना अफ़ज़ल और सुन्नत है, क्योंकि ये नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के अल्फाज़ हैं। लेकिन इसके बाद आप अपनी मादरी ज़बान (हिन्दी, उर्दू, वग़ैरह) में अल्लाह से अपने दिल की बात कह सकते हैं।
अल्लाह दिलों का हाल जानता है और वह हर ज़बान समझता है।
तरीक़ा:
- पहले अल्लाह की तारीफ़ (हमद) करें।
- फिर दरूद शरीफ़ पढ़ें।
- मसनून दुआएं पढ़ें।
- आख़िर में अपनी हाजत (ज़रूरत) के लिए अपनी ज़बान में दुआ मांगें और फिर दरूद शरीफ़ पढ़कर दुआ ख़त्म करें।
Rozana Zindagi Mein Fajr Ke Baad Dua Ka Asar
जब कोई मुसलमान Fajr ki namaz ke baad ki dua का एहतमाम करता है, तो उसे अपनी ज़िंदगी में वाज़ेह (साफ़) बदलाव महसूस होते हैं। यह कोई जादू नहीं, बल्कि अल्लाह पर भरोसे का नतीजा है।
- नीयत (Intention): दुआ पढ़ने से दिन की शुरुआत अल्लाह की रज़ा की नीयत के साथ होती है।
- इस्तिक़ामत (Consistency): रोज़ाना दुआ मांगना हमें दीन पर जमने की तौफ़ीक़ देता है।
- अल्लाह पर तवक्कुल: जब हम सुबह ही ‘रिज़्क़े तय्यब’ और ‘इल्मे नाफ़े’ मांग लेते हैं, तो दुनिया की फिक्र कम हो जाती है और हम हलाल कमाई की तरफ ज़्यादा मुतवज्जे होते हैं।
मुख़्तसर सवाल-जवाब
Q1: क्या फ़ज्र के बाद हाथ उठाकर दुआ करना ज़रूरी है?
नमाज़ के बाद हाथ उठाकर दुआ करना जाइज़ है और दुआ के आदाब में से है, लेकिन यह ‘फ़र्ज़’ या ‘वाजिब’ नहीं है। अगर आप सिर्फ़ ज़बान से ज़िक्र कर लें और दिल में दुआ मांग लें, तो भी दुआ हो जाती है। अहम बात दिल की हाज़िरी है।
Q2: क्या फ़ज्र के बाद कोई फिक्स तस्बीह (Tasbeeh) लाज़मी है?
कोई भी तस्बीह ‘लाज़मी’ (कम्पलसरी) नहीं है कि अगर न पढ़ी तो गुनाह होगा। अलबत्ता, “सुब्हानअल्लाह” (33 बार), “अल्हम्दुलिल्लाह” (33 बार) और “अल्लाहु अकबर” (34 बार) पढ़ना बहुत सवाब का काम है और इसे ‘तस्बीह-ए-फ़ातिमा’ कहा जाता है। इसे हर नमाज़ के बाद पढ़ना सुन्नत है।
आख़िरी बात (Conclusion)
Fajr ki namaz ke baad ki dua पढ़ना एक ऐसा अमल है जो बहुत आसान है लेकिन इसका वज़न बहुत ज़्यादा है। कोशिश करें कि ऊपर बताई गई मसनून दुआओं में से कम से कम एक दुआ को अपनी रोज़ाना की मामूलात (Routine) में शामिल करें।
ज़रूरी नहीं कि आप बहुत ज़्यादा वज़ीफ़े पढ़ें, बल्कि जो भी पढ़ें, वह सही तरीक़े से (मसनून) हो और पाबंदी के साथ हो। अल्लाह ताला हम सबको सुन्नत के मुताबिक अमल करने और इख़लास के साथ दुआ मांगने की तौफ़ीक़ अता फरमाए।


