हमारा घर सिर्फ़ ईंट और पत्थरों से बना एक ढांचा नहीं होता, बल्कि यह वह जगह है जहाँ हमें दुनिया की तमाम दौड़-भाग के बाद सुकून मिलता है। घर अल्लाह की दी हुई एक बहुत बड़ी नेमत है। जब हम अपने घर के अंदर क़दम रखते हैं, तो हमारी यही चाहत होती है कि घर का माहौल ख़ुशग़वार रहे, घर के लोगों में मोहब्बत बनी रहे और हर काम में बरकत हो।
इस्लाम हमें ज़िंदगी के हर मोड़ पर बेहतरीन आदाब सिखाता है। इन्हीं में से एक ख़ूबसूरत आदत है घर में दाख़िल होने की सुन्नत दुआ और ज़िक्र। जब हम सुन्नत के मुताबिक़ घर में दाख़िल होते हैं, तो हम सिर्फ़ एक रस्म पूरी नहीं करते, बल्कि अल्लाह को याद करके अपने घर के सुकून की नींव रखते हैं।
घर और इंसान का सुकून
इंसानी ज़िंदगी में घर का मक़ाम बहुत ऊँचा है। दिन भर की मेहनत और मसरूफ़ियत के बाद जब इंसान अपने घर लौटता है, तो वह सुकून और राहत की तलाश में होता है। इस्लाम हमें सिखाता है कि हम अपने घर को सिर्फ़ रहने की जगह न समझें, बल्कि इसे अल्लाह के ज़िक्र से रौशन करें।
जब हम घर में दाख़िल होते वक़्त अल्लाह का नाम लेते हैं, तो हमारे दिल को इत्मीनान मिलता है। यह एक छोटी सी आदत हमारे रोज़ाना के मिज़ाज को बदल सकती है। घर में सुकून तभी आता है जब हम अपनी रोज़ाना की आदतों में सुन्नत को शामिल करते हैं। इससे न केवल घर के बड़ों को ज़हनी राहत मिलती है, बल्कि बच्चों पर भी इसका बहुत अच्छा और गहरा असर पड़ता है।
इस्लाम घर में दाख़िल होने का अदब क्या सिखाता है
अल्लाह के रसूल ﷺ ने हमें घर में दाख़िल होने के बहुत प्यारे और आसान तरीक़े सिखाए हैं। इन आदाब का मक़सद यह है कि इंसान जब घर आए, तो वह एक बेहतर और पुर-सुकून इंसान बनकर अंदर जाए।
- अल्लाह का ज़िक्र: घर में दाख़िल होते वक़्त अल्लाह को याद करना सुन्नत है। इससे घर के माहौल में एक रूहानी ताज़गी आती है।
- नरमी और संजीदगी: घर में दाख़िल होते वक़्त शोर-शराबा करने के बजाय नरमी और संजीदगी इख़्तियार करनी चाहिए।
- सलाम करना: चाहे घर में कोई मौजूद हो या न हो, सुन्नत यह है कि सलाम करके अंदर दाख़िल हुआ जाए। कुरआन में अल्लाह तआला फ़रमाता है कि जब तुम घरों में दाख़िल हो, तो अपने लोगों को सलाम किया करो, यह अल्लाह की तरफ़ से मुबारक और पाकीज़ा दुआ है।
Ghar Mein Dakhil Hote Waqt Padhi Jane Wali Sunnat Dua
घर में दाख़िल होते वक़्त अल्लाह का ज़िक्र करना और सलाम करना सबसे मोतबर (authentic) सुन्नत है। सहीह अहादीस की रौशनी में, घर में दाख़िल होते वक़्त बिस्मिल्लाह कहना और फिर सलाम करना साबित है।
Arabic Dua
بِسْمِ اللهِ وَلَجْنَا، وَبِسْمِ اللهِ خَرَجْنَا، وَعَلَى اللهِ رَبِّنَا تَوَكَّلْنَا
तलफ़्फ़ुज़
बिस्मिल्लाहि वलज्ना, व बिस्मिल्लाहि खरज्ना, व ‘अलल्लाहि रब्बिना तवक्कलना।
Roman (Hinglish)
Bismillahi walajna, wa bismillahi kharajna, wa ‘ala-llahi rabbina tawakkalna.
तर्जुमा
“अल्लाह के नाम के साथ हम (घर में) दाख़िल हुए, और अल्लाह के नाम के साथ ही हम (घर से) निकले, और हमने अपने रब अल्लाह पर ही भरोसा किया।”
Masdar (Sahih Hadith reference)
यह दुआ सुनन अबी दाऊद (حدیث نمبر: 5096) में ज़िक्र की गई है। इसके अलावा सहीह मुस्लिम (2018) की रिवायत के मुताबिक़, नबी करीम ﷺ ने फ़रमाया कि जब आदमी अपने घर में दाख़िल होते वक़्त और खाना खाते वक़्त अल्लाह का ज़िक्र करता है, तो वह बरकत का ज़रिया बनता है।
इस सुन्नत का मक़सद क्या है
इस छोटी सी दुआ और ज़िक्र का मक़सद बहुत गहरा है। यह हमें हर पल अल्लाह की मौजूदगी का एहसास दिलाता है।
- घर का माहौल: जब हम अल्लाह का नाम लेकर घर में आते हैं, तो हमारे दिल में एक इत्मीनान होता है। यह ज़िक्र घर की फ़िज़ा को बेहतर बनाता है और घर वालों के दरमियान नरमी पैदा करता है।
- अल्लाह की याद: यह दुआ हमें याद दिलाती है कि हमारा हर काम, चाहे वो घर आना हो या बाहर जाना, अल्लाह के फ़ज़ल पर टिका है।
- रोज़ाना की बरकत: जब हम सुन्नत को अपनी आदत बना लेते हैं, तो हमारे छोटे-छोटे कामों में भी बरकत होने लगती है। घर में बरकत का मतलब सिर्फ़ माल व दौलत नहीं, बल्कि आपस की मोहब्बत और सुकून भी है।
मुख़्तसर सवाल-जवाब
क्या हर बार घर में दाख़िल होते वक़्त यह दुआ पढ़ना सुन्नत है?
जी हाँ, जब भी आप अपने घर में वापस आएं, तो बिस्मिल्लाह कहना, दुआ पढ़ना और सलाम करना सुन्नत है। यह एक ऐसी आदत है जिसे आप आसानी से अपनी ज़िंदगी का हिस्सा बना सकते हैं।
क्या किसी और के घर में भी यह दुआ पढ़ सकते हैं?
दूसरे के घर में दाख़िल होने के लिए सबसे पहले इजाज़त लेना और सलाम करना ज़रूरी है। अगर आप वहाँ अंदर जा रहे हैं, तो अल्लाह का ज़िक्र (बिस्मिल्लाह) और सलाम करना वहाँ भी बेहतर और सुन्नत के मुताबिक़ है।
आख़िरी बात
घर वह जगह है जहाँ हम अपनी तमाम फ़िक्रों को बाहर छोड़ कर आते हैं। अगर हम चाहते हैं कि हमारा घर हमारे लिए और हमारे बच्चों के लिए एक ऐसी जगह बने जहाँ सिर्फ़ सुकून और बरकत हो, तो हमें सुन्नतों को ज़िंदा करना होगा।
घर में दाख़िल होते वक़्त की यह दुआ हमें यह सिखाती है कि हम हर हाल में अल्लाह के शुक्रगुज़ार रहें। यह सादगी भरी सुन्नत हमारे घर को सिर्फ़ एक मकान नहीं, बल्कि जन्नत का एक नमूना बना सकती है। आज ही से यह पक्का इरादा करें कि जब भी आप घर की दहलीज़ पर क़दम रखेंगे, तो अल्लाह का ज़िक्र और सलाम आपकी ज़बान पर होगा। इससे न सिर्फ़ आपको सुकून मिलेगा, बल्कि आपके घर में अल्लाह की रहमतों का नुज़ूल होगा।


