Gussa Khatam Karne Ki Dua In Hindi | ग़ुस्सा और ज़िद कम करने का सुन्नत तरीक़ा

By Rokaiya

gussa kam karne ki dua featured

Quick Summary

Dua Name

Gussa Khatam Karne Ki Dua

Arabic Text

أَعُوذُ بِاللَّهِ مِنَ الشَّيْطَانِ الرَّجِيمِ

Hindi Transliteration

अऊज़ु बिल्लाहि मिनश शैतानिर रजीम

English Transliteration

A'uzu Billahi Minash Shaitanir Rajeem

Source

बुखारी शरीफ़

कभी-कभी एक पल का शदीद ग़ुस्सा बरसों के ताल्लुक़ात को राख कर देता है। आपने भी महसूस किया होगा कि जब ग़ुस्सा आता है, तो अक़्ल पर पर्दा पड़ जाता है। हम वह कह जाते हैं जो हमें नहीं कहना चाहिए, और फिर बाद में अकेले में बैठकर नदामत (पछतावा) होती है कि “काश! उस वक़्त मैं ख़ामोश रह जाता।”

चाहे घर में बीवी-बच्चों पर चिल्लाना हो या दफ़्तर में किसी बात पर आपा खो देना, यह ग़ुस्सा सिर्फ़ दूसरों को नहीं, बल्कि हमारे अपने सुकून और ईमान को भी शदीद नुक़सान पहुँचाता है। अगर आप इंटरनेट पर Gussa kam karne ki dua तलाश कर रहे हैं, तो यहाँ हम अहादीस से साबित ग़ुस्सा ख़त्म करने के सुन्नत तरीक़े और दुआएं बता रहे हैं।


ग़ुस्से के बारे में इस्लामी नज़रिया

इस्लाम हमें जज़्बातों को मारने के लिए नहीं, बल्कि उन्हें क़ाबू (Control) करने का सलीक़ा सिखाता है। नबी-ए-करीम (ﷺ) ने फ़रमाया कि असली बहादुर वह नहीं जो पहलवानी में जीत जाए, बल्कि बहादुर वह है जो ग़ुस्से के वक़्त ख़ुद पर क़ाबू रखे।

ग़ुस्सा शैतान की तरफ़ से आता है, और शैतान का मक़सद ही इंसानों के दरमियान फ़साद और नफ़रत पैदा करना है।


ग़ुस्सा कम करने की मसनून दुआ (Gussa Khatam Karne Ki Dua)

जब भी आपको महसूस हो कि पारा चढ़ रहा है और ज़बान से कड़वे अल्फ़ाज़ निकलने वाले हैं, तो फ़ौरन यह दुआ पढ़ें। यह शैतान के शर से बचने और ग़ुस्से की आग को बुझाने का सबसे मज़बूत ज़रिया है:

Arabic:

أَعُوذُ بِاللَّهِ مِنَ الشَّيْطَانِ الرَّجِيمِ

Hindi:

अऊज़ु बिल्लाहि मिनश-शैतानिर-रजीम।

Roman:

A’uzu billahi minash shaitanir rajeem.

तर्जुमा / मफ़हूम:

“मैं अल्लाह की पनाह माँगता हूँ शैतान मरदूद से।” (हवाला: सहीह बुख़ारी: 6115 – जब दो लोग नबी ﷺ के सामने लड़ रहे थे और एक का चेहरा ग़ुस्से से लाल हो गया था, तब आपने यह दुआ पढ़ने की हिदायत दी थी।)


ग़ुस्से की आग बुझाने के 4 सुन्नत तरीक़े

सिर्फ़ दुआ ही नहीं, अल्लाह के रसूल (ﷺ) ने हमें कुछ अमली (Practical) तरीक़े भी बताए हैं जो ग़ुस्से की आग को फ़ौरन ठंडा कर देते हैं:

  • ख़ामोशी इख़्तियार करें: अगर ग़ुस्सा आए तो फ़ौरन चुप हो जाएं। अक्सर बहस को लंबा करने से बात बिगड़ती है और शैतान को मौक़ा मिल जाता है।
  • अपनी हालत बदल लें: हदीस के मुताबिक़, अगर आप खड़े हैं तो बैठ जाएं, और अगर बैठे हैं तो लेट जाएं। यह जिस्मानी हरकत आपके जज़्बात को धीमा कर देती है।
  • ताज़ा वुज़ू करें: ग़ुस्सा शैतान की तरफ़ से है और शैतान आग से बना है। आग को पानी बुझाता है, इसलिए ग़ुस्सा आने पर फ़ौरन वुज़ू कर लेने से दिल और दिमाग़ को ठंडक मिलती है।
  • पानी पिएं: ग़ुस्से के वक़्त ठंडा पानी पीने से भी जिस्मानी हरात (गर्मी) कम होती है और दिमाग़ को सुकून मिलता है।

बच्चों का ग़ुस्सा और ज़िद ख़त्म करने का वज़ीफ़ा

अक्सर वालिदैन (Parents) बच्चों के बहुत ज़्यादा ग़ुस्सा करने और ज़िद करने से परेशान रहते हैं। बच्चों को डांटने या मारने के बजाय यह रूहानी इलाज करें:

  1. जब बच्चा शदीद ज़िद कर रहा हो, तो उसके पास जाकर आहिस्ता आवाज़ में ‘अऊज़ु बिल्लाहि मिनश-शैतानिर-रजीम’ पढ़ें।
  2. रोज़ाना सुब्ह और शाम पानी पर 3 मर्तबा सूरह फ़ातिहा और 3 मर्तबा आयतुल कुर्सी पढ़कर दम करें और वह पानी बच्चों को पिलाएं। इन्शाअल्लाह, उनकी ज़िद और ग़ुस्सा ख़त्म हो जाएगा।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)

सवाल 1: क्या ग़ुस्से की हालत में की गई दुआ या बददुआ क़बूल होती है?
जवाब: अल्लाह तआला निहायत रहम करने वाला है, लेकिन ग़ुस्से में इंसान अक्सर होश खो देता है और अपनी ही औलाद या माल को बददुआ दे बैठता है। हदीस में इससे सख़्ती से मना किया गया है। हमेशा कोशिश करें कि पहले ख़ुद को पुर-सुकून करें, फिर पूरी तवज्जो के साथ दुआ मांगें।

सवाल 2: अगर किसी दूसरे शख़्स को बहुत ग़ुस्सा आ रहा हो तो क्या करें?
जवाब: अगर आपके सामने कोई ग़ुस्से में है, तो आप ख़ुद ख़ामोश रहें और दिल ही दिल में ‘अऊज़ु बिल्लाह…’ का विर्द करते रहें। आपकी ख़ामोशी सामने वाले का ग़ुस्सा जल्दी ठंडा कर देगी।


आख़िरी बात: सब्र का फल मीठा होता है

याद रखें, ग़ुस्सा एक ऐसी आग है जो सबसे पहले उसी इंसान को जलाती है जिसके अंदर वह भड़क रही होती है। जब आप अल्लाह की रज़ा के लिए अपना ग़ुस्सा पी जाते हैं, तो अल्लाह ताला आपके दिल को ईमान और क़ल्बी इत्मीनान से भर देता है।

अगली बार जब आपका जी चाहे कि किसी को बुरा-भला कहें, तो बस एक लम्हे के लिए रुकें और सोचें कि अल्लाह ताला हमारे गुनाहों के बावजूद हमारे साथ कितनी नर्मी बरतता है। क्या हम उसके बंदों के साथ थोड़ी नर्मी इख़्तियार नहीं कर सकते? सब्र का घूंट कड़वा ज़रूर महसूस होता है, लेकिन उसका अजर (नतीजा) बहुत मीठा होता है।