सफ़र चाहे ज़मीन का हो या आसमान का, यह इंसान की ज़िंदगी का एक अहम हिस्सा है। आज के दौर में हम hawaai jahaz aur gadi ki dua तलाश करते हैं ताकि हमारा सफ़र रूहानी सुकून के साथ गुज़रे। इस्लाम हमें हर काम की तरह सफ़र शुरू करने का भी एक बेहतरीन तरीक़ा और सलीका सिखाता है, जो न सिर्फ हमारे दिल को इत्मीनान देता है बल्कि हमें अपने ख़ालिक (बनाने वाले) की याद से भी जोड़े रखता है।
Safar Aur Insaan Ka Dil
जब हम किसी सफ़र का इरादा करते हैं, तो दिल में एक अजीब सी हलचल होती है। कभी नए मक़ाम पर पहुँचने की खुशी, तो कभी घर से दूर जाने की थोड़ी सी बेचैनी। चाहे आप पहली बार हवाई जहाज़ पर सवार हो रहे हों या रोज़ाना गाड़ी से अपने दफ़्तर जा रहे हों, इंसान होने के नाते ज़हन में अपनी आफ़ियत (खैरियत) का ख़याल आना फ़ितरी है।
सफ़र के दौरान इंसान को अपनी बेबसी का एहसास ज़्यादा होता है। ऐसे में अल्लाह पर भरोसा (तवक्कुल) वह मज़बूत सहारा है जो हमें घबराहट से बचाता है। दुआ दरअसल उसी भरोसे का इज़हार है। यह हमें यकीन दिलाती है कि हम अकेले नहीं हैं, बल्कि अल्लाह की पनाह हमारे साथ है। यह रूहानी तसल्ली सफ़र की थकान और उलझनों को कम करने में मदद करती है।
Islam Safar Ke Bare Mein Kya Sikhata Hai
इस्लाम एक मुकम्मल दीन है जो हमें ज़िंदगी के हर मोड़ पर रहनुमाई देता है। सफ़र के बारे में नबी-ए-करीम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की सुन्नत हमें सिखाती है कि यह वक़्त सिर्फ मंज़िल तक पहुँचने का नहीं, बल्कि अल्लाह की कुदरत को देखने और उससे जुड़ने का ज़रिया भी है।
सफ़र का असल अदब यह है कि इसे अल्लाह के नाम से शुरू किया जाए। दुआ का मक़ाम इस्लाम में बहुत ऊँचा है; इसे इबादत का मग़ज़ (निचोड़) कहा गया है। जब हम सफ़र की मसनून दुआ पढ़ते हैं, तो हम तवक्कुल का मुज़ाहिरा करते हैं। इसका मतलब यह है कि हम अपनी पूरी कोशिश और एहतियात के बाद अपना मामला अल्लाह के सुपुर्द कर देते हैं। इस्लाम हमें सिखाता है कि हम चाहे कितनी ही जदीद (Modern) मशीनों या सवारियों का इस्तेमाल करें, असल इख्तेयार अल्लाह के पास है।
Hawaai Jahaz Ya Gadi Ke Safar Ke Liye Masnoon Dua
सफ़र की दुआ सवारी के हिसाब से नहीं बदलती। चाहे वह ऊँट हो, गाड़ी हो या हवाई जहाज़, सुन्नत के मुताबिक़ वही दुआ पढ़ी जाती है जो अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने सिखाई है।
Arabic Dua
سُبْحَانَ الَّذِي سَخَّرَ لَنَا هَذَا وَمَا كُنَّا لَهُ مُقْرِنِينَ ، وَإِنَّا إِلَى رَبِّنَا لَمُنْقَلِبُونَ
اللَّهُمَّ إِنَّا نَسْأَلُكَ فِي سَفَرِنَا هَذَا الْبِرَّ وَالتَّقْوَى ، وَمِنَ الْعَمَلِ مَا تَرْضَى
तलफ़्फ़ुज़
सुब्हानल्लज़ी सख्ख-र लना हाज़ा व मा कुन्ना लहू मुक्रिनीन, व इन्ना इला रब्बिना ल-मुन्कल़ि़बून। अल्लाहम्मा इन्ना नस्अलुका फ़ी सफ़रिना हाज़ल बिर्रा वत्तक्वा, व मिनल अमलि मा तरदा।
Roman (Hinglish)
Subhan-alladhi sakhkhara lana hadha wa ma kunna lahu muqrineen, wa inna ila rabbina la-munqaliboon. Allahumma inna nas’aluka fi safarina hadhal-birra wat-taqwa, wa minal-‘amali ma tarda.
तर्जुमा
“पाक है वह ज़ात जिसने हमारे लिए इसे (सवारी को) ताबे कर दिया, हालाँकि हम इसे काबू में करने की ताक़त नहीं रखते थे। और बेशक हमें अपने रब की तरफ़ ही लौट कर जाना है। ऐ अल्लाह! हम आपसे अपने इस सफ़र में नेकी और परहेज़गारी का सवाल करते हैं, और ऐसे अमल का जिसे आप पसंद करें।”
Masdar (Source)
यह दुआ क़ुरआन करीम की सूरह अज़-ज़ुख़रुफ़ (आयत 13-14) और सहीह मुस्लिम (हदीस नंबर 1342) से साबित है।
Dua Ke Saath Safar Ka Aitidal
इस्लाम हमें एतदाल (Balance) की राह दिखाता है। Hawaai jahaz aur gadi ki dua पढ़ना एक अज़ीम रूहानी सहारा है, लेकिन इसके साथ अपनी ज़िम्मेदारी को समझना भी ज़रूरी है। अल्लाह पर भरोसे का मतलब यह नहीं है कि हम दुनियावी असबाब और एहतियात को नज़रअंदाज़ कर दें।
जब आप गाड़ी चला रहे हों, तो ट्रैफिक के नियमों का पालन करना और बेदारी के साथ गाड़ी चलाना आपकी ज़िम्मेदारी है। इसी तरह, हवाई जहाज़ में सफ़र के दौरान अमले (Staff) की हिदायतों को मानना और सीटबेल्ट बाँधना भी ज़रूरी है। दुआ और एहतियात दोनों मिलकर एक मोमिन के सफ़र को मुकम्मल बनाते हैं। दुआ हमें दिल का सुकून देती है और अल्लाह की पनाह में ले आती है, जिससे सफ़र के दौरान होने वाली ग़ैर-ज़रूरी फ़िक्र और घबराहट कम हो जाती है।
मुख़्तसर सवाल-जवाब
क्या सफ़र की दुआ प्लेन और गाड़ी दोनों के लिए है?
जी हाँ, इस्लाम में सवारी की दुआ आम है। चाहे आप हवाई जहाज़ (Hawaai jahaz) में हों, गाड़ी (Gadi) में हों, या किसी भी दूसरी सवारी पर, सुन्नत के मुताबिक़ यही दुआ पढ़ी जाती है क्योंकि हर सवारी अल्लाह ही की दी हुई नेमत है।
क्या हर सफ़र पर यह दुआ पढ़ना सुन्नत है?
हाँ, जब भी आप अपनी बस्ती या शहर की हुदूद (Limits) से बाहर सफ़र के लिए निकलें, तो सवारी पर सवार होते वक़्त यह दुआ पढ़ना नबी-ए-करीम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की प्यारी सुन्नत है।
आख़िरी बात
सफ़र की शुरुआत में ज़बान पर अल्लाह का ज़िक्र और दिल में उसकी पनाह की तलब इंसान को एक अलग ही किस्म का सुकून देती है। hawaai jahaz aur gadi ki dua हमें यह याद दिलाती है कि हमारी हर हरकत और सुकून अल्लाह के हाथ में है। जब हम दुआ पढ़कर अपना सफ़र शुरू करते हैं, तो हम अपनी बेबसी का एतराफ़ करते हैं और अल्लाह की अज़मत को तस्लीम करते हैं। यही तवक्कुल हमें हर मुश्किल में साफ़ ज़हन और मुतमइन दिल अता करता है। अल्लाह हम सबके सफ़र को आसान और बा-बरकत बनाए।

