क़ुरआन करीम को अपने सीने में महफ़ूज़ करना एक बहुत बड़ी सआदत और रूहानी सफ़र है। यह सिर्फ़ लफ़्ज़ों को याद करने का नाम नहीं है, बल्कि यह अल्लाह तआला की किताब के साथ एक गहरा रिश्ता जोड़ने का अमल है। इस सफ़र में एक तालिब-ए-इल्म (स्टूडेंट) को ज़ेहनी मेहनत के साथ-साथ रूहानी सुकून और सब्र की सख़्त ज़रूरत होती है।
Qur’an Yaad Karna Ek Safar Hai
हिफ़्ज़-ए-क़ुरआन कोई ऐसी चीज़ नहीं है जिसे चंद दिनों में मुकम्मल कर लिया जाए। यह एक लंबा सफ़र है जिसमें वक़्त, मेहनत और मज़बूत इरादे की ज़रूरत होती है। हमें यह समझना चाहिए कि हर इंसान के सीखने की रफ़्तार अलग होती है। कोई बच्चा या बड़ा जल्दी याद कर लेता है, तो किसी को एक ही सबक़ याद करने में ज़्यादा वक़्त लगता है।
हिफ़्ज़ का असल मक़सद सिर्फ़ मंज़िल तक पहुँचना नहीं है, बल्कि उस रास्ते पर अल्लाह की रज़ा के लिए चलना है। जब एक स्टूडेंट इस नीयत से बैठता है कि वह अल्लाह का कलाम याद कर रहा है, तो उसकी हर घड़ी इबादत में शुमार होती है। इसमें जल्दबाज़ी से ज़्यादा इस्तिक़ामत (डटे रहना) अहम है। अल्लाह तआला हमारी कोशिशों को देखता है, न कि सिर्फ़ रफ़्तार को।
Hifz Mein Aksar Kya Mushkil Aati Hai
क़ुरआन याद करने के दौरान कई बार ऐसे मरहले आते हैं जहाँ स्टूडेंट को मुश्किल महसूस होती है। यह एक ज़ेहनी और जज़बाती आज़माइश भी है:
- भूल जाना: नया सबक़ याद करते हुए पिछला भूल जाना एक आम और फ़ितरी बात है। इससे घबराना नहीं चाहिए, क्योंकि इंसान का ज़ेहन इसी तरह काम करता है।
- ज़ेहनी थकान: लगातार पढ़ाई और हिफ़्ज़ के दौरान कई बार ज़ेहन थक जाता है और तवज्जुह (Focus) कम होने लगती है।
- हिम्मत हारना: जब कोई पारा या सूरत मुश्किल लगती है, तो स्टूडेंट को लगता है कि शायद वह यह नहीं कर पाएगा।
ये तमाम चीज़ें इस सफ़र का हिस्सा हैं। इनका हल न तो पढ़ाई छोड़ना है और न ही ख़ुद को कोसना। ऐसे वक़्त में अल्लाह से मदद माँगना और अपने उस्ताद की रहनुमाई लेना ही सही रास्ता है।
Qur’an Yaad Karne Ke Liye Padhi Ja Sakti Hai Yeh Duas
इस्लाम में इल्म हासिल करने और उसमें आसानी के लिए अल्लाह से दुआ माँगने की बहुत ताकीद की गई है। Hifz-e-Qur’an ki dua असल में अल्लाह की मदद हासिल करने का एक ज़रिया है। यहाँ दो निहायत जामे और मुस्तनद दुआएँ दी जा रही हैं:
1. Ilm Mein Izaye Ki Dua
यह दुआ अल्लाह तआला ने ख़ुद नबी करीम ﷺ को सिखाई थी ताकि इल्म में इज़ाफ़ा हो।
Arabic Dua
رَبِّ زِدْنِي عِلْمًا
तलफ़्फ़ुज़
रब्बि ज़िदनी इल्मा
Roman (Hinglish)
Rabbi zidni ‘ilman
तर्जुमा
ऐ मेरे रब! मेरे इल्म में इज़ाफ़ा फ़रमा (मेरे इल्म को बढ़ा दे)।
Masdar
अल-क़ुरआन, सूरह ता-हा, आयत नम्बर: 114
2. Kaam Mein Asaani Aur Zehani Kushadgi Ki Dua
यह दुआ हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ने उस वक़्त माँगी थी जब उन्हें एक बड़ी ज़िम्मेदारी दी गई थी। यह दुआ ज़ेहन को खोलने और काम को आसान करने के लिए बेहतरीन है।
Arabic Dua
رَبِّ اشْرَحْ لِي صَدْرِي وَيَسِّرْ لِي أَمْرِي وَاحْلُلْ عُقْدَةً مِّن لِّسَانِي يَفْقَهُوا قَوْلِي
तलफ़्फ़ुज़
रब्बि-शरह-ली सदरी, व-यस्सिर-ली अमरी, व-हलुल उक़दतम्-मिल-लिसानी, यफ़क़हू क़ौली
Roman (Hinglish)
Rabbi ishrah li sadri, wa yassir li amri, wahlul ‘uqdatam mil lisani, yafqahu qawli
तर्जुमा
ऐ मेरे रब! मेरे लिए मेरा सीना खोल दे, और मेरे काम को मेरे लिए आसान कर दे, और मेरी ज़ुबान की गिरह (गाँठ) खोल दे, ताकि लोग मेरी बात समझ सकें।
Masdar
अल-क़ुरआन, सूरह ता-हा, आयत नम्बर: 25 से 28
Dua Aur Muraja‘ah Ka Rishta
दुआ माँगना मोमिन का हथियार है, लेकिन इसके साथ मेहनत और मुराजअह (दौराव/Revision) भी लाज़मी है। हिफ़्ज़ के सफ़र में दुआ और मेहनत का रिश्ता रूह और जिस्म जैसा है।
- दुआ का किरदार: दुआ हमारे दिल को मज़बूत करती है, याददाश्त में बरकत पैदा करती है और मुश्किल वक़्त में सब्र देती है। यह हमें अल्लाह की मदद का एहसास दिलाती है।
- मुराजअह की अहमियत: क़ुरआन को याद रखना मेहनत माँगता है। बार-बार दोहराना ही वह तरीक़ा है जिससे क़ुरआन सीने में पुख़्ता (मज़बूत) होता है।
सिर्फ़ दुआ करना और दोहराने में सुस्ती करना सुन्नत के ख़िलाफ़ है। इसी तरह, सिर्फ़ अपनी ज़हानत पर भरोसा करना और अल्लाह से मदद न माँगना तक़ब्बुर (घमंड) पैदा कर सकता है। एक कामयाब हाफ़िज़ वही है जो अपना सबक़ पूरी मेहनत से याद करे और फिर अल्लाह से उसे महफ़ूज़ रखने की दुआ माँगे।
Walidain Aur Asatiza Ka Kirdar
बच्चों के हिफ़्ज़ के सफ़र में माँ-बाप और उस्ताद की भूमिका बहुत नाज़ुक होती है।
- हौसला अफ़ज़ाई: अगर बच्चा भूल रहा है या उसे याद करने में वक़्त लग रहा है, तो उसे डाँटने या दूसरों से तुलना (Comparison) करने के बजाय उसकी हिम्मत बढ़ानी चाहिए।
- सुकून का माहौल: घर और मदरसे का माहौल ऐसा हो जहाँ बच्चा बिना किसी दबाव के पढ़ सके। ज़्यादा दबाव बच्चों के ज़ेहन पर बुरा असर डालता है।
- दुआ का एहतिमाम: माँ-बाप को चाहिए कि वे अपने बच्चों के लिए ख़ास तौर पर दुआ करें कि अल्लाह उनके सीने को क़ुरआन के लिए खोल दे।
मुख़्तसर सवाल-जवाब
क्या सिर्फ़ दुआ से क़ुरआन याद हो सकता है?
नहीं, क़ुरआन याद करने के लिए मेहनत, दोहराना और उस्ताद की रहनुमाई ज़रूरी है। दुआ अल्लाह की मदद हासिल करने का ज़रिया है जो हमारी कोशिशों में बरकत डालती है।
क्या हिफ़्ज़ के दौरान भूल जाना फ़ितरी है?
जी हाँ, भूल जाना इंसान की फ़ितरत है। यहाँ तक कि बड़े-बड़े हाफ़िज़ों को भी दोहराना पड़ता है। भूलने से घबराकर हिफ़्ज़ छोड़ना नहीं चाहिए, बल्कि और ज़्यादा सब्र के साथ मुराजअह (Revision) करना चाहिए।
Aakhiri Baat
हिफ़्ज़-ए-क़ुरआन एक मुक़द्दस अमानत है। इस रास्ते में कभी थकान महसूस हो या कभी लगे कि याद नहीं हो रहा, तो याद रखें कि अल्लाह तआला आपकी नीयत और आपके हर हर्फ़ (Letter) को पढ़ने की कोशिश को देख रहा है। Hifz-e-Qur’an ki dua को अपनी रोज़ाना की आदत बनाएँ और पूरे यक़ीन के साथ अल्लाह से मदद माँगें। अल्लाह किसी की मेहनत को ज़ाया नहीं करता। बस सब्र, मेहनत और अल्लाह की रहमत पर भरोसा रखें।


