जब हम दुनिया में कदम रखते हैं, तो सबसे पहली चीज़ जो हमारे ज़हन को रोशन करती है, वह ‘इल्म’ है। लेकिन इल्म का मतलब सिर्फ डिग्रियां जमा करना या बहुत सारी मालूमात (information) इकट्ठा करना नहीं है। असल इल्म वह है जो इंसान को खुद की और अपने रब की पहचान कराए। Ilm mein izafa ki dua सिर्फ एक दरख्वास्त नहीं है, बल्कि यह एक इकरार है कि हम अपनी समझ में महदूद (limited) हैं और हमें उस ज़ात की रहमत की ज़रूरत है जिसके पास सारा खज़ाना है।
Ilm Sirf Jaankari Kyun Nahi Hai
अक्सर हम इल्म को सिर्फ याददाश्त या इम्तिहान में कामयाबी से जोड़कर देखते हैं। लेकिन इल्म और समझ में एक बारीक सा फर्क है। कोई शख्स बहुत सारी किताबें पढ़कर भी दूसरों के लिए सख्त हो सकता है, जबकि एक कम पढ़ा-लिखा इंसान अपनी समझ और तवाज़ु (humility) से लोगों के दिलों में जगह बना सकता है।
इल्म हासिल करने के पीछे हमारी निय्यत सबसे अहम है। अगर निय्यत दूसरों को छोटा दिखाने या सिर्फ दुनियावी रुतबा पाने की है, तो वह इल्म रूह को सुकून नहीं देता। इल्म तो एक अमानत है जिसे इस निय्यत से सीखा जाना चाहिए कि हम खुद को बेहतर इंसान बना सकें और दूसरों के काम आ सकें। जब हम ilm mein izafa ki dua करते हैं, तो हम अल्लाह से सिर्फ याददाश्त नहीं मांगते, बल्कि वह समझ मांगते हैं जो हमें सही और गलत का फर्क समझा सके।
Islam Mein Ilm Ka Safar
इस्लाम में इल्म हासिल करना एक इबादत की तरह है। इसकी शुरुआत ही ‘अदब’ से होती है। बड़े-बुजुर्ग कहते हैं कि “इल्म अदब से आता है।” जितना इंसान के अंदर तवाज़ु (humility) आती है, इल्म के दरवाज़े उस पर उतने ही खुलते चले जाते हैं। इल्म जितना बढ़ता है, इंसान को उतना ही अपनी कमी का एहसास होता है। वह जान जाता है कि जितना उसने सीखा है, उससे कहीं ज़्यादा सीखना अभी बाकी है।
इल्म का सीधा रिश्ता हमारे ‘अमल’ से है। अगर हमने कुछ सीखा लेकिन वह हमारे बर्ताव में नज़र नहीं आया, तो वह इल्म सिर्फ एक बोझ की तरह है। इल्म वह रोशनी है जो अंधेरे रास्तों पर हिदायत का काम करती है। इसलिए इल्म की तलब के साथ-साथ यह भी ज़रूरी है कि हम अपने दिल को साफ रखें और तक़ब्बुर (ego) से दूर रहें।
Ilm Mein Izafa Ke Liye Masnoon Dua
अल्लाह तआला ने कुरान करीम में हमें वह अल्फाज़ सिखाए हैं जो इल्म की तलब रखने वाले हर इंसान के लिए सबसे बेहतरीन ज़रिया हैं। यह दुआ सादगी और गहराई का एक खूबसूरत संगम है।
Arabic Dua
رَبِّ زِدْنِي عِلْمًا
तलफ़्फ़ुज़ (Devanagari Hindi)
रब्बि ज़िद्नी इल्मा
Roman (Hinglish)
Rabbi zidni ‘ilman
तर्जुमा
“ऐ मेरे रब! मेरे इल्म में इज़ाफ़ा (बढ़ोतरी) फरमा।”
मस्दर (Source)
सूराह ता-हा, आयत 114 (Surah Taha, 20:114)
यह दुआ हमें सिखाती है कि चाहे इंसान किसी भी मकाम पर पहुँच जाए, उसे हमेशा सीखते रहने की कोशिश करनी चाहिए। यह दुआ हमें याद दिलाती है कि इल्म देने वाला सिर्फ अल्लाह है और हमें उसी से रुजू करना चाहिए।
Dua Aur Koshish Ka Taluq
दुआ मांगना इस बात की गवाही है कि हम अल्लाह के मोहताज हैं, लेकिन दुआ के साथ-साथ ‘कोशिश’ करना हमारी ज़िम्मेदारी है। यह समझना बहुत ज़रूरी है कि दुआ कोई ऐसा शॉर्टकट नहीं है कि हम मेहनत छोड़ दें। इल्म हासिल करना एक सब्र वाला काम है। इसमें वक्त लगता है, ज़हन को थकाना पड़ता है और कई बार चीज़ें मुश्किल भी लगती हैं।
जब हम मेहनत करते हैं और साथ में ilm mein izafa ki dua भी करते हैं, तो अल्लाह हमारे लिए रास्तों को आसान बना देता है। इल्म धीरे-धीरे बढ़ता है, जैसे एक छोटा सा बीज वक्त के साथ एक घना पेड़ बनता है। इस्तकामत (consistency) यानी लगातार सीखते रहना ही इल्म की राह की सबसे बड़ी कामयाबी है। हार न मानना और अल्लाह की रहमत पर भरोसा रखना ही एक तालिब-ए-इल्म (learner) की असल पहचान है।
Do Chhote Sawal
1. क्या इल्म में इज़ाफ़ा सिर्फ किताबों से होता है?
नहीं, किताबें इल्म का एक अहम ज़रिया ज़रूर हैं, लेकिन इल्म कायनात की निशानियों को देखने, तजुर्बों से सीखने और नेक लोगों की सोहबत में बैठने से भी हासिल होता है। अल्लाह की बनाई हुई चीज़ों पर गौर करना और अपनी गलतियों से सबक लेना भी इल्म का हिस्सा है।
2. अगर कोई चीज़ मेहनत के बाद भी समझ न आए, तो क्या दुआ बे-असर होती है?
हरगिज़ नहीं। कभी-कभी अल्लाह हमें आज़माता है ताकि हमारा सब्र और शौक और बढ़े। दुआ कभी बेकार नहीं जाती; हो सकता है कि अभी वह बात समझने का सही वक्त न आया हो या अल्लाह आपको उस चीज़ की गहराई किसी और तरीके से समझाना चाहता हो।
आख़िरी बात
इल्म की तलाश एक ऐसा सफर है जो पालने से लेकर कब्र तक चलता है। इसमें न कोई छोटा है और न कोई बड़ा। असल कामयाबी यह नहीं है कि हमें कितनी बातें याद हैं, बल्कि यह है कि उन बातों ने हमारे दिल को कितना नर्म किया है। जब हम ilm mein izafa ki dua मांगें, तो साथ में यह भी कहें कि “या अल्लाह! इस इल्म को मेरे लिए और दूसरों के लिए नफा देने वाला बना।”
इल्म वही भला है जो इंसान के अंदर आजिज़ी पैदा करे और उसे अपने रब के करीब ले जाए। हिदायत की इस राह पर चलते हुए हमेशा अपनी निय्यत को टटोलते रहें और इल्म के साथ-साथ अदब को अपना साथी बनाए रखें।

